ताँका लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ताँका लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 21 सितंबर 2020

हिन्दी पखवारा की रचना -3-ताँका


तांका
1
भोर का रूप
निखरी हुई धूप
माँ सी छुअन
चिड़ियों की चहक
गुलाबों की महक।
2
दीये की जिद
आँधियों से सामना
मद्धिम ज्योति
प्रकाश की कामना
लौ को सहेज रही
3
हरसिंगार
समर्पण की चाह
झरी पँखुरी
भर कर अँजुरी
शिव पूजन चली।
4
चली लेखनी
तलवार से तेज
शब्दों की धार
मोहक अनुस्वार
अनुनासिक चाँद|

कृष्ण बिछोह
प्रेम की परिभाषा
मौन राधिका
युग युग बदले
प्रीत नहीं बदली|
--ऋता शेखर 'म
धु'

रविवार, 20 अप्रैल 2014

मन वैरागी

दस तांका --- ऋता शेखर 'मधु'
१.
हृदय गंगोत्री
प्रेम की गंगा बही
धारा पावन 
समेट रही छल
जीत रही है बल|
२.
मन वैरागी
स्मृतियों का कानन
करे मगन
चुनो सुहाने पल
महकेगा आँचल|
३.
लेखनी हंस
मन मानसरोवर
शब्दों के मोती
चुगता निरंतर
खोल रहा अंतस|
४.
सूरज हँसा
धरा गई निखर
जागा जीवन
खुशी गई बिखर
दिन लागे प्रखर|
५.
धरा की नमी
नभ दृग में बसी
छेड़ो न उसे
वो बरस जो जाए
भीगे दिल सभी का|
६.
जागे अम्बर
चाँद चाँदनी संग
पल शीतल
सूरज से छुपाये
राग मधुर गाए|
७.
तेज आँधी थी
बुझा पाई न दिया
ऐसा लगा है
दुआ सच्चे दिल की
रब ने कुबूल की|
८.
चमकी लाली
प्राची ने माँग भरी
ले अँगड़ाई 
अरुण वर उठा
कौंधा नव जीवन|
९.
क्या करे कोई
एक ओर हो खाई
दूजी में कुआँ
बढ़ाना पग-नाप
पार हो जाना भाई|
१०.
जीवन रेल
भागती सरपट
कई पड़ाव
साथ हैं मुसाफिर
अलग हैं मंजिलें|

...........ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 11 जून 2013

कोमल हाथ चुभ गए थे काँच


ताँका........विश्व बाल श्रम दिवस पर-१२ जून

बालक रोया
बस्ता चाहिए उसे
है मजबूर
दिल किया पत्थर
बनाया मजदूर|१|

कोमल हाथ
चुभ गए थे काँच
बहना रोई
भइया आँसू पोंछे
दोनो कचरे बिनें|२|

दिल के धनी
राजा औ' रंक बच्चे
देख लो फ़र्क
एक खरीदे जूता
पोलिश करे दूजा|३|

गार्गी की बार्बी
कमली ललचाई
माँ ने पुकारा
बिटिया, इधर आ
बर्तन मांज जरा|४|

कठोर दिल
कैसी माता है वह
काम की भूखी
बेटी को देती मैगी
कम्मो को रोटी सूखी|५|

........ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 10 मार्च 2013

महाशिवरात्रि...





पावन पर्व
हर हर महादेव
गूँजी दिशाएँ
आओ, चलो हम भी
कर दें अभिषेक|

विष को पिया
कंठ में धार लिया
हम भी सीखें
हर बुराई सहें
आत्मसात न करें|

तेरा ही नाम
जिसने भजा सदा
वह क्यूँ डरे
भव सागर का तू
जो खेवनहार है|

ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 12 नवंबर 2012

फुलझड़ियों ने पटाखों से कहा...


दिवाली......ताँका कविताएँ!!!



1
निष्कंप थी लौ
दृढ़ विश्वास संग
कुछ यूँ जली
आँधियों की कोशिश
नाकाम कर गई।


2.
सृष्टि-नियम
दिन के संग-संग
रात भी आती
दिए जलाके रखो
लौ को बचाके रखो।


3
फुलझड़ियाँ
पटाखों से यूँ बोलीं-
'करो न बोर
मैं तो राह दिखाती
तू करता है शोर।'
4
धरा-बाला ने
पहनी दीप-माला
इठला गई
मन्द समीर संग
हौले-हौले वो डोली।


5.
खुशी के फूल
हर बाग में खिलें
द्भाव की लौ
हर दिए में जले
देश रौशन रहे।



ऋता शेखर  मधु


शनिवार, 23 जून 2012

यही काल-चक्र है...



समेट लेती
टिक टिक ये घड़ी
कई लम्हों को
कुछ खुशी के पल
कुछ दर्दे-दास्ताँ
यही काल-चक्र है|

संजो के रखा
किस्से रामायण के
पति की प्यारी
पतिव्रता नारी ही
अग्नि-परीक्षा देती
यही काल-चक्र है|

महाभारत
लगा दिया दाँव पे
नारी-वस्तु को
पाँच पतियों वाली
नहीं थी सुरक्षित
यही काल-चक्र है|

अजातशत्रु
निन्यान्वे भाइयों को
मौत दे दिया
बौद्ध-धर्म के पीछे
अहिंसा अपनाया
यही काल-चक्र है|

 गाँधी हैं गौण
अहिंसा के देश में
हिंसा है हावी
आतंक के शिकार
बिलख रहे घर
यही काल-चक्र है|

धन-अर्जन
धर्म-गुरु ने किया
सिखाया धर्म
खुद किए अधर्म
कहीं नहीं विश्वास
यही काल-चक्र है|

कहते रहे
बेटियाँ होतीं लक्ष्मी
दुर्गा सावित्री
पूजते हैं उनको
पर आने न देते
यही काल-चक्र है|

ऋता शेखर मधु

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

क्यूँ कभी-कभी...उलझनों की दास्ताँ




क्यूँ कभी-कभी
उमड़ आते भाव
भिगोते जाते
हृदय की परतों को
कई भूली यादों को|१|

क्यूँ कभी-कभी
छलक उठते हैं
धैर्यहीन से
अँखियों के गागर
दिखलाते सागर|२|

क्यूँ कभी-कभी
मन भटकता है
किसी खोज में
करूँ कुछ तो ऐसा
यादगार जो बने||३|

क्यूँ कभी-कभी
हथेली मसलते
बेबस बन
छूट रहा हो जैसे
किसी निज का साथ|४|

क्यूँ कभी-कभी
होकर भी न होते
सबके साथ
पथराई सी आँखें
देखती हैं सन्नाटे|५|

क्यूँ कभी-कभी
सँभल नहीं पाते
रिश्तों की डोर
न अहं अहंकार
फिर भी टूट जाते|६|

क्यूँ कभी-कभी
निर्दोष होकर भी
खुद को पाते
कटघरे में स्तब्ध
बन जाते निःशब्द|७|

क्यूँ कभी-कभी
होता है एहसास
वक्त जा रहा
कर न पाए वह
जो दिल ने चाहा था|८|

क्यूँ कभी-कभी
सुँदर सा सपना
लगे जीवन
कभी डरावना सा
विकट अँधेरा सा|९|

क्यूँ कभी-कभी
हमें कैद करते
प्रश्नों के घेरे
बहुत सारे ऐसे
जो हैं अनुत्तरित|१०|

क्यूँ कभी-कभी
दुनियादारी नहीं
आ जाते भाव
दार्शनिकता भरे
जग बेमानी लगे|११|

क्यूँ कभी-कभी
मन बनता जाता
अँधरी गुफ़ा
उलझनों की दास्ताँ
हो नहीं पाता बयाँ|१२|

ऋता शेखर मधु

रविवार, 18 मार्च 2012

कुछ ताँका कविताएँ




१.
कोयल काली
तुम कितनी प्यारी
रूप से नहीं
गुण से जग जीता
स्वर दे मनोहारी|
२.
ओस की बूँद
सिमटी है पँखुड़ी
ज्यूँ मीठा स्वर
बस जाता बाँसुरी
सीपी में मंजरी|
३.
शरद ऋतु
रोम-रोम सिहरा
जिस धूप को
ग्रीष्म में बिसराया
अभी गले लगाया|
४.
लाल गुलाब
कहे काँटों के साथ
जीवन कथा
चुभन को झेल लो
खिलना तो न छोड़ो|
 ५.
झूमती कली
हँसी, कहने लगी
मैं तो खिली
भँवरों का गुँजन
सुन भई बावली|
६.
काला बादल
ढँके सूर्य किरण
छुप न पाती
ढकेल आवरण
वो चमक ही जाती|
७.
बरखा लाए
रिमझिम फुहार
सुर सजाए
तेज धार बौछार
गाए राग मल्हार|
८.
पावस ऋतु
हौले-हौले हवाएँ
सजे राग हैं
विरहा औ कजरा
भीगे कानन फूल|
९.
ग्रीष्म तपती
नभ में उड़ जाती
बन बदरा
झूमती फुहराती
ठंढक पहुँचाती|
 १०.
मेघ का थाल
बूँद-बूँद नीर के
ग्रीष्म सजाती
टकटक चातक
गिरा, प्यास बुझाती|

ऋता शेखर 'मधु'
यह कविता की जापानी विधा है|
इसमें वर्णों का क्रम 5+7+5+7+7=31 है|

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

रोटी








 रोटी (ताँका)

फूली थी रोटी
सहसा फट पड़ी
भाप का ताप
अग्नि ताप से ज्यादा
विद्रोह या आक्रोश?

यह कविता की जापानी विधा है|
इसमें वर्णों का क्रम 5+7+5+7+7=31 है|