नारी,
तू अति सुन्दर है;
अति कोमल है;
सृष्टि की जननी है तू|
उम्र के हर पड़ाव पर किन्तु
तेरे नयन हैं गीले क्यों?
ओ गर्भस्थ शिशु बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘माता दिखाना ना चाहे दुनिया
दोष यह है, में हूँ एक कन्या ’’
ओ नवजात कन्या बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘पा सकी न स्नेह आलिंगन
समझते हैं सब मुझको बंधन’’
ओ नन्ही सी गुड़िया बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘भइया खाता है दूध और मेवा
मैं खाती हूँ सूखा कलेवा’’
ओ छोटी सी बालिका बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘पढ़ना चाहती हूँ पुस्तक मोटी
सेंकवाते हैं सब मुझसे रोटी’’
ओ चंचल किशोरी बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘मन है छोटा सा छोटी सी आशा
अनुशासन से होती है निराशा’’
ओ कमनीय तरुणी बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘ख्वाबों की दुनिया रंग रंगीली
कहते हैं सब मुझको हठीली’’
ओ प्यारी सी पुत्री बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘मैं भी तो हूँ उनकी जाई
फिर क्यूँ वो समझें मुझे पराई’’
ओ सजीली बन्नो बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘लागे है प्यारा मेरा साजन
पर छूटेगा घर और आँगन’’
ओ जीवन की संगिनी बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘मैं चाहूँ सबको खुश रखना
कोई मुझको समझ पाए ना’’
ओ घर की बहुरानी बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘दिन भर करती मैं सारे काम
ताने सुन सुन जीना है हराम’’
ओ आज्ञाकारिणी पत्नी बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘सुख दुख को लेती मैं बाँट
फिर भी सुननी पड़ती है डाँट’’
ओ ममतामयी जननी बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘सारे दर्द तो मैंने सहे
नाम पिता का ही क्यों चले’’
ओ बच्चौं की अम्मा बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘उनके लिए मैं सोचूँ दिन रात
मन की करें चलाते अपनी बात’’
ओ रोबीली सासू बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘बड़े प्यार से परपुत्री अपनाई
करती है सारे जहाँ में बुराई’’
ओ अशक्त वृद्धा बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘मेरी बोली मन को न भाए
सबका निरादर सहा नहीं जाए’’
ऋता शेखर मधु