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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

शुक्ल नवमी चैत्र की, जनम लिए श्रीराम|



दोहे...........ऋता शेखर ‘मधु’

दूर-ध्वनि आभास से, दशरथ साधे तीर|
तड़पे श्रवणकुमार जब, रघुपति हुए अधीर||

मात-पिता के पास जब, दशरथ लाए नीर|
आत्मग्लानि के भाव से, रख नहिं पाए धीर||

पाए पुत्र-वियोग से, श्रवण-पिता संताप|
अवधराज को भी मिले, पुत्र-विरह का ताप||

शुक्ल नवमी चैत्र की, जनम लिए श्रीराम|
गूँज उठी किलकारियाँ, हरषा रघुकुल धाम||

स्वागत में लहरा गए, फूले हुए पलाश|
खग के मंगलगान से, मुदित हुआ आकाश||

हुलसी धारा गंग की, सुरभित हैं ऋतुराज|
चहक रही है वाटिका, प्रभु आए हैं आज||

श्यामल छवि श्रीराम की, कुंतल सोहे भाल|
गाकर मीठी लोरियाँ, माता हुईं निहाल||

जनक के दरबार में, बैठे बली महान|
शिव-चाप को तोड़ दिए, सहज भाव से राम||

ब्रह्मा के संसार में, सत्य एक ही नाम|
देते हैं विश्राम जो, कहते उनको राम||

हृदय बसाए प्रेम से, रघुनन्दन के चित्र|
मिलें हमें संसार में, महावीर सम मित्र||

.....ऋता शेखर ‘मधु’................