दोहे...........ऋता शेखर ‘मधु’
दूर-ध्वनि आभास से, दशरथ साधे तीर|
तड़पे श्रवणकुमार जब, रघुपति हुए अधीर||
मात-पिता के पास जब, दशरथ लाए नीर|
आत्मग्लानि के भाव से, रख नहिं पाए धीर||
पाए पुत्र-वियोग से, श्रवण-पिता संताप|
अवधराज को भी मिले, पुत्र-विरह का ताप||
शुक्ल नवमी चैत्र की, जनम लिए श्रीराम|
गूँज उठी किलकारियाँ, हरषा रघुकुल धाम||
स्वागत में लहरा गए, फूले हुए पलाश|
खग के मंगलगान से, मुदित हुआ आकाश||
हुलसी धारा गंग की, सुरभित हैं ऋतुराज|
चहक रही है वाटिका, प्रभु आए हैं आज||
श्यामल छवि श्रीराम की, कुंतल सोहे भाल|
गाकर मीठी लोरियाँ, माता हुईं निहाल||
जनक के दरबार में, बैठे बली महान|
शिव-चाप को तोड़ दिए, सहज भाव से राम||
ब्रह्मा के संसार में, सत्य एक ही नाम|
देते हैं विश्राम जो, कहते उनको राम||
हृदय बसाए प्रेम से, रघुनन्दन के चित्र|
मिलें हमें संसार में, महावीर सम मित्र||
.....ऋता शेखर ‘मधु’................