आज गगन से उतरी
शरद की धूप सुनहरी
कुदक फुदक कर भाग रही
जैसे थी कोई गिलहरी
कभी मुंडेर पर चढ़ती
कभी पेड़ों पर छुपती
लुका-छिपी के खेल में
बीत गई थी दुपहरी
ढोल की ढम-ढम लेकर
आई अनाथों की टोली
गूँज उठी थी कायनात में
व्याकुल सी स्वर-लहरी
निर्दोष-से मासूम मुख पर
छाई थी वेदना गहरी
कहाँ फरियाद करें अपनी
नहीं थी कोई कचहरी|
चलो
इक मुठ्ठी धूप चुराकर
उनपर हम बिखराएँ
हँसी के कुछ बीज को
उनके खेतों में बो आएँ
ममता का आँचल फैला
उनके सिर पर लहराएँ
कुछ मिश्री-सी लोरियाँ
गुनगुनाकर उन्हें सुनाएँ
कुछ रिमझिम-सी चाँदनी
उनके सपनों में बरसाएँ
कुछ फूलों की खुश्बू ले
उनकी गलियाँ महकाएँ
खिली-खिली मुस्कान पर फिर
हम भी निहाल हो जाएँ|
ऋता शेखर ‘मधु’