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सोमवार, 19 दिसंबर 2016

रोला छंद

रोला छंद
1
देखो आई रात, चाँद भी नभ में आया
झरते हरसिंगार, भ्रमर ने राग सुनाया
फूले सरसो खेत, पंक ने कमल खिलाये
दे बासंती भाव, फूल गेंदा हरषाये
2
हरे हुए हर पात, दूब की बात निराली
झूल रही है ओस, पवन बनती मतवाली
हौले हौले सूर्य, गरम होता जाता है
शिशिर शरद के बाद, ग्रीष्म ही मन भाता है
3
चाह रहे बदलाव, तनिक धीरज से रहना
यह तो है संग्राम, जिसे मिलकर के सहना
मन में रखकर आस, जहाँ में सूरज भरना
गम को पीछे छोड़, कालिमा हर क्षण हरना
--ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 13 मई 2012

थाम लिया जब सूर्य, हँसा था खूब सवेरा


''माँ'' - रोला छंद में

माँ, जब छूटी आस, सामने तुझको पाया
आँचल सर पे डाल,मुझे दी शीतल छाया
आई घनेरी रात, बनी  तू सम्बल  मेरा
थाम लिया जब सूर्य, हँसा था खूब सवेरा|

सुमधुर तेरा हास, सरल थीं तेरी बातें
सोती तेरी गोद,  चैन से कटती रातें
पाकर तुझसे धीर, हिमालय मैं बन जाती
काश कि तुझसे सीख,हलाहल मैं पी पाती|

माँ, आती तू याद, जाग मैं लोरी गाती
छूए मंद बयार, लगे तू ही  सहलाती
पाया जो संस्कार, वही डाला झोली में
बस इतनी सी चाह,टपके प्यार बोली में|

ऋता शेखर 'मधु'

''माँ'' - हाइकु में


माँ, तेरी सीख,
मेरी मुट्ठी में बंद,
खोने न देती|


तपती धूप,
हाथ थे पाँव तले,
आँचल- छाया|


सुख-दुख में,
जब जी घबराया,
तुम्हें ही पाया|


ऋता शेखर 'मधु'