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बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

सुनहरे ख्वाबों ने पकड़ बनाई है...

आज डालियाँ फिर झूम के लहराई हैं
खुश्बू-ए- उल्फत फिजा में छाई है

रब ने कुबूल कर ली दुआ उसकी
सुनहरे ख्वाबों ने पकड़ बनाई है

बरगद की छाया मिलती नहीं है अब
क्या करें यह भी बना बोनसाई है

धूप की तपन को क्यूँ हम दोष दें
बिन उसके ऊर्जा भी तो नहीं समाई है

यह उनकी मुस्कुराहटों का ही कमाल था
हजार जुगनुओं की चमक मुख पे छाई है

.........ऋता