पथ के पाहनों का स्वागत तो कीजिए
ठोकरों के डर से चलना न छोड़िए
हाँजी, हाँजी करके आज दिख रहे जो दोस्त
क्या पता, उनके नक़ाब ही उतर जाएँ
उगी हुई नागफनी का स्वागत तो कीजिए
चुभन के डर से न दामन समेटिए
तलवों से निकलेंगे जो लहू की धार
क्या पता, वह मखमली कालीन बन जाएँ
जीवन की हर लहर का स्वागत तो कीजिए
गहराई देखकर के तैरना न छोड़िए
लहरों के साथ कभी डूब भी गए अगर
क्या पता, गहरे पर मोतियाँ ही मिल जाएँ
व्यंग्य-बेधी बेरुखी का स्वागत तो कीजिए
नमी आँखों में सज भी जाए, हँसना न छोड़िए
मन-ज़मीं पर गिरेंगे असंख्य भाव-बीज
क्या पता, कविताओं में पारिजात खिल जाएँ
ऋता शेखर ‘मधु’