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बुधवार, 10 अगस्त 2022

डेढ़ इंच मुस्कान - क्षणिका संग्रह-समीक्षा

 



डेढ़ इंच मुस्कान- क्षणिका संग्रह
क्षणिकाकारः श्रीराम साहू

समीक्षक ; ऋता शेखर ‘मधु’

क्षणिकाओं की शान- डेढ़ इंच मुस्कान

मुझे मेरी सद्य प्रकाशित पुस्तक , मृणाल का बदला, के साथ श्वेतांशु प्रकाशन की ओर से उपहारस्वरूप डेढ़ इंच मुस्कान मिली है। अब आप सोच रहे होंगे यह मुस्कान कैसे मिली। मैं बात कर रही हूं श्री राम साहू जी की क्षणिका संग्रह 'डेढ़ इंच मुस्कान' की। आज जबकि मुस्कान भी मिलीमीटर में मिलती है तो डेढ़ इंच तो बहुत बड़ी बात है। पुस्तक का शीर्षक बहुत ही अच्छा है।आवरण पृष्ठ पर मुस्कुराती हुई स्माइली का प्रयोग आकर्षक है|

क्षणिका एक मारक विधा है जो चिंतन की ओर अग्रसर करती है। किसी विशेष क्षण में हुए अनुभव को चंद पंक्तियों में उतार देना क्षणिकाकार की खासियत होती है। क्षणिकाएं लघु कविता नहीं होती। क्षणिका के क्षेत्र में लिख रहे रचनाकारों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए तब वे लघु कविता एवं क्षणिका के अंतर को समझ सकेंगे।। लेखक श्री राम साहू जी अपनी बात क्षणिका के माध्यम से रखते हुए कहते हैं कि जिंदगी/ हादसों व विडंबनाओं का/ शिकार है…शेष कुशल मंगल है/ बाकी तो आप सभी पाठक /अधिक समझदार हैं… यहीं से लेखनी ने कमाल दिखाना आरम्भ कर दिया है ।।

भूमिका प्रसिद्ध व्यंग्यकार गिरीश पंकज जी ने लिखी है।पंकज जी का कहना है कि लेखन के क्षेत्र में नन्हीं विधाए, जैसे हाइकु, तांका, लघुकथा, क्षणिकाएँ आदि फास्ट फुड की तरह हैं| जिस तरह लोग अधिक देर तक भोजन करना पसंद नहीं करते, उसी तरह समयाभाव के कारण लम्बी रचनाएँ भी पढ़ना पसंद नहीं करते|

नन्हीं रचनाओं का सृजन चुनौतीपूर्ण होता है| बहुत कुछ कहने के लिए चंद शब्द मिलते है| यह लेखक की काबिलियत होती है कि गागर में कितना सागर भर पाए| विषय चयन भी सोच समझकर करना होता है| उस हिसाब से लेखक ने समयानुसार विधा का चयन करके अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है| सामाजिक सरोकार से लेकर राजनीति, पर्यावरण को विषय बनाते हुए उन्होंने गंभीर सृजन किया है|

कथ्य एवम शिल्प आकर्षित करते हैं।राजनीति और सत्ता को विषय बनाया जाए तो सर्वप्रथम रामराज्य को ही सबसे आदर्श राज्य माना जाता है। किन्तु आदर्श होने के बावजूद आलोचना से कोई भी राज्य अछूता नहीं रह पाता। राज्य को स्वार्थी होने के दृष्टिकोण से मन्त्रणा देने वाले मंथरा सरीखे लोग हैं, तो राजा के हर कृत्य पर अँगुली उठाने वाले धोबी सरीखे भी हैं। जब- जब रामराज्य की चर्चा होगी, ये दोनों स्वयमेव शामिल माने जाएँगे।

* हम /रामराज्य/ स्थापित/ करने में/ सफल हुए हैं /धोबी-मंथरा/ गली-गली/ पल रहे हैं।

चंद शब्दों वाली इस विधा में तुकांत का भी निर्वहन किया जाए तो क्षणिकाओं का स्वरूप अलग ही दिखता है। आदी और अवसरवादी का प्रयोग नितांत खूबसूरत बन पड़ा है। राजनीति पर निशाना साधने वाली यह रचना विपक्ष की भूमिका पर व्यंग्य करता हुआ थोड़ा स्मित भी दे जाता है। जब से सत्ता है तब से महंगाई एक मुद्दा है। चीजों के दाम हर किसी के राज्य में बढ़ते रहे हैं और सत्तापक्ष को निशाना बनाने का हथियार भी बनते रहे हैं। यह विरोध जोरशोर से इसलिए होता है कि विपक्ष का पक्ष मजबूत हो। लोकतंत्र जब भ्रष्टाचार का पर्याय बन जाये तो इस तरह की क्षणिकाएँ जन्म लेती हैं। बेईमानी में ईमानदारी, विरोधाभास का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत कर रहा। विरोधाभास लिए कई क्षणिकाएँ ध्यानाकर्षण करती हैं|

*महंगाई के खिलाफ/उनका/ विरोध अभियान/ युद्धस्तर पर/ जारी है। 'उल्लू' सीधा करने की /पूरी तैयारी है।।

आंदोलन करवाकर तहलका मचाना और स्वयं बच निकलने वाले नेताओं पर मारक सृजन है। बेचारी जनता उन नेताओं के प्रभाव में आकर अपना समय, जोश और समर्पण दाँव पर लगाने के लिए तैयार रहती है| जेल तक चली जाती है और आंदोलन का सृजनकर्ता चैन की वंशी बचाता सुख की नींद सोता है|

* उनके/ आंदोलन से/ तहलके मच गए। सब ने जेल की/ राह ली, वे अकेले बच गए।।

सत्ताधारी नेताओं के बदलते व्यवहार को चंद शब्दों में दर्शाना बड़ी कला है| उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ अपने पद और गरिमा को ईमानदारी से निभाने के लिए लेना होता है|किन्तु शपथ ग्रहण के बाद वे कुर्सी बचाने के चक्कर में ईमानदारी कहीं खो जाती है|

विरोधाभास से रची गयी क्षणिका अच्छी बनी है| मनुष्य का नैतिक पतन उसके उत्थान में सहायक है, इससे और कितना अधिक गिरेगा आदमी|

* सचमुच/ आज आदमी/ काफी तरक्की/ कर चुका है। नीचे गिरने की/ हद तक, ऊपर/ उठ चुका है।।

श्रीराम साहू जी ने क्षणिकाओं में बहुत बारीकी से हर उस कथ्य को उभारा है जो आम मनुष्य सोचता है|एक तरफ प्रगति के नाम पर पारिवारिक विखंडन पर रचना है तो दूसरी तरफ कार्य प्रणाली में कागजी घोड़े दौड़ा कर कार्य की संपूर्णता दिखाने की बात कही गई है| जिनके बड़े बड़े बोल होते हैं उनके काम कम होते हैं| हर समस्या पर सिर्फ वार्ता होती है|

*उन्होंने/ प्रगति के/ नए आयाम/ गढ़ लिए हैं/ पहले चारदीवारी में/ रहते थे/ अब केवल दीवार/ खड़ी कर लिए हैं||

* उन्हें/ काम से कम/ बात से अधिक/ वास्ता है| उनकी मान्यता है/ हर समस्या का हल/ केवल वार्ता है ||

क्षणिकाओं में कभी तुकांत का प्रयोग मनभावन है तो कभी अतुकांत में सधी लेखनी चली है| रचनाओं को पढ़ते समय मुस्कान भी सहज रूप से आती है| आपने सत्ता और सत्ताधारियों पर चुटीले तंज किए हैं जो हर आदमी मुस्कुराते हुए स्वीकार कर ले| कथ्य और शिल्प का निर्वहन है और भाव भी भरपूर है|

कहीं- कहीं रचना सपाट बयानी भी लगी , किंतु कथ्य प्रभावशाली होने के कारण प्रभाव छोड़ने में सफल रही|

प्रायः पुस्तक का समर्पण लिखते समय उसी विधा का चयन किया जाता है जिस विधा में पुस्तक बननी है| क्षणिका की पुस्तक का समर्पण पृष्ठ हाइकु में होने के कारण आरम्भ में थोड़े भ्रम की स्थिती बन रही| ऐसा प्रतीत होता है जैसे हाइकु संग्रह हो|

लेखक श्रीराम साहू जी 1984 से लेखन में सक्रिय हैं। उनकी रचनाओं का पत्रिकाओं में प्रकाशन 1987 से जारी है। आप फेसबुक में विभिन्न संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान प्राप्त कर चुके हैं।

श्रीराम साहू जी की लेखनी सतत क्रियाशील रहे, इसके लिए हार्दिक शुभकामनाएँ।

पुस्तक की साजसज्जा, पन्नों की स्तरीयता एवं छपाई…सभी सुन्दर हैं।

पुस्तक परिचय

पुस्तकः डेढ़ इंच मुस्कान

लेखकः श्रीराम साहू

पृष्ठः ११२

मूल्यः २५०/-

प्रकाशकः श्वेतांशु प्रकाशन, नई दिल्ली

प्रकाशन का मोबाइल नम्बरः 8178326758, 9971193488

रविवार, 24 जनवरी 2016

सामर्थ्यवान लोगों की बेशर्म चुप्पी को समर्पित दिलबाग विर्क जी की पुस्तक — महाभारत जारी है


सामर्थ्यवान लोगों की बेशर्म चुप्पी को समर्पित दिलबाग विर्क जी की पुस्तक ---—                               महाभारत जारी है
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उपहार के रूप में मुझे आदरणीय दिलबाग विर्क जी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ’महाभारत जारी है’ मिली| इसके लिए आभार आपका|
साहित्य की हर विधा पर समान रूप से पकड़ रखने वाले दिलबाग जी की यह पुस्तक छंदमुक्त है जहाँ बिना किसी बहर में बँधे उनकी सोच ने उन्मुक्त उड़ान भरी है| समाज की जिस किसी भी विसंगति ने उन्हें आहत किया वहाँ उनकी धारदार कलम चली जो पाठकों को भी सोचने पर निश्चय ही मजबूर करेगी|
पुस्तक अपने नाम के अनुरूप ही महाभारत का कारक वाले आकर्षक कलेवर में है| अंजुमन प्रकाशन ,इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित पुस्तक के पन्नों की क्वालिटी अच्छी है| पुस्तक की कीमत १२०/- रुपए है|
पुस्तक किसे समर्पित किया गया है यह भी आकर्षण की बात होती है| दिलबाग जी ने पुस्तक समर्पित किया हे,
‘’सामर्थ्यवान लोगों की बेशर्म चुप्पी के नाम’’ और यह गहरी सोच वाले बेबाक कवि की ही हो सकती है| माँ शारदे से भी लेखक ने यही माँगा है कि वे सदा सत्य की राह पर निडर होकर चलें|
पुस्तक की 58 कविताएँ दो खंडों मे विभाजित हैं|
खंड एक में जो 50 कविताएँ हैं जिनमें लेखक ने भावनाओं के ज्वार को सरल सुबोध भाषा में इस तरह से बाँधा है जैसे कि वह हर मनुष्य के दिल की बात हो|
हौआ एक ऐसा शब्द है जो हम न जाने कितनी बार बात बात में प्रयोग में लाते हैं| यही शब्द कविता में बँध जाए तो स्वभाविक है मन को भाएगा ही| हौआ के लिए बिम्ब भी लाजवाब है|पृ-१५
हौआ कौआ नहीं होता/ जिसे उड़ा दिया जाए/ हुर्र कहकर
हौआ तो वामन है/ जो कद बढ़ा लेता है अपना/ हर कदम के साथ
हौआ तो अमीबा है/ जितना तोड़ा इसे/ गिनती बढ़ी उतनी ही
वक्त की सीढ़ी(पृ-१७) प्रेरणादायी कविता है|
पृ-१८ पर ‘मन और पत्ते’ बहुत अच्छी कविता है|जिस तरह पत्ते डोलते हैं उसी तरह मन भी डोलता है मगर बहुत फर्क है दोनो के डोलने में| इसे कवि की लेखनी से जानते हैं|
पत्तों का डोलना/ हार नहीं होती पेड़ की/
लेकिन मन का डोलना/ हार होती है आदमी की
रिश्तों की फ़सल/ यूँ ही नहीं लहलहाती/ तप करना पड़ता है/ किसान की तरह (पृ-१९)
घर घर ही होता है/ और लौट आना होता है वापस/ परिंदों की तरह (पृ-२०)
जिंदगी पर कवि का नजरिया बहुत सकारात्मक है|
जिंदगी/ कोरी सैद्धांतिक/ और नीरस नहीं होती
जिंदगी/ एक गीत है/जिसमें सुर ताल की बंदिशें तो हैं/ मधुरता भी है/ सरसता भी है/ रोचकता भी है (पृ-२१)
एक कड़वा सच जो कवि ने इस तरह से उजागर किया है|
मैं वाकिफ़ हूँ तेरी सच्चाई से/तू वाकिफ़ है मेरी सच्चाई से/मगर अफ़सोस/स्वयं के सच से/न तू वाकिफ़ है/ न मैं वाकिफ़ हूँ|(पृ-२८)
कवि ने समझदार की समझदारी को बखूबी उतारा है अपनी कविता मे, देखिए किस तरह|
हर अच्छा कार्य/ संभव हो सका है/ मेरे कारण/हर बुरे परिणाम के लिए उत्तरदायी हैं दूसरे लोग/ और जो सफल हो जाते हैं/वही कहलाते हैं समझदार लोग|
इस तरह कई कविताएँ मिलेंगी जो हर व्यक्ति को अपनी सोच लगेगी| यही विशेषता होती है सफल कवि की जो जनमानस के आंतरिक सोच को व्यक्त कर सके जिसमें दिलबाग जी पूरी तरह सफल रहे हैं| अपाहिज, जिंदादिली, आवरण, दोषी हम भी हैं आदि कई कविताएँ समाज पर कुठारघात है और कवि की बेबाक लेखनी का परिचय भी देती है|
पतंग के माद्यम से कवि ने जो बात कही है वह गहन ,सूक्ष्म और बारीक अध्ययन है|दूसरों की पतंग काट कर बड़े बच्चों को सिखा देते हैं दूसरों की वस्तुएँ छीनकर खुश होना| इस कविता के लिए मैं दिलबाग जी को बधाई देती हूँ|
समाज में बढ़ रही ‘लिवींग टू-गेदर’ की परम्परा परिवारों में विखंडन का प्रतिफल है जहाँ कवि ने परमाणु विस्फोट की कल्पना की है जहाँ सब कुछ खत्म हो जाएगा| ऐसी ही कितनी कविताएँ हैं जो पाठक पढ़ना चाहेंगे और अनुभव करेंगे कि समाज की तत्कालीन स्थितियों को कवि ने कितनी बारीकी से उकेरा है|
पुस्तक के खंड २ में महाभारत के पात्रों के माध्यम से कई सवाल प्रस्तुत किए हैं कवि ने जो अंदर तक उद्वेलित करते हैं| इस खंड की प्रथम कविता ‘आत्ममंथन’ भीष्म पितामह का आत्ममंथन है| उन्होंने जो प्रतिज्ञा अपने पिता की इच्छापूर्ति के लिए लिया आज उसका प्रतिफल उन्हें शर शय्या पर यह सोचने को मजबूर कर रहा है कि गल्ती कहाँ हुई जो सभी अपने आमने सामने खड़े हैं युद्ध के लिए| कवि ने कई विचारणीय तथ्य पाठकों के सामने रखा है जो पुस्तक में पढेँ जाएँ तो अधिक सही रूप में उभर कर सामने आएगा|
गुरु दक्षिणा के रूप में अपना अँगूठा देने वाला एकलव्य पाठकों के समक्ष कई सवालों के साथ प्रस्तुत है |
गाँधारी का अपने आँखों पर पट्टी बाँध लेना पति का समर्थन था या कर्तव्य से पलायन, यह पढ़कर ही सुनिश्चित करें पाठक तो अधिक न्याय हो पाएगा|
माननीय सभासदों से भरे दरबार में द्रौपदी का चीरहरण स्वार्थपरता की निशानी ही रही होगी तभी तो अपने पदों को बचाने के लिए सभी खामोश रहे| इसे आज के समाज से भी जोड़कर देखा जा सकता है|
इस तरह महाभारत के पात्र आज भी जीवित हैं और पुस्तक के नाम ‘’महाभारत जारी है’’ को सार्थकता मिल रही है|
मैं दिलबाग विर्क जी को बधाई देती हूँ कि समाज में फैली कुरीतियों को कविता के माध्यम से व्यक्त करके उन्होंने कलम की ताकत का उत्कृष्ट परिचय दिया है| साथ ही पुस्तक के बारे में विचार प्रस्तुत करने में मुझे जो विलम्ब हुआ उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ|
दिलबाग जी से भविष्य में भी इस तरह की सार्थक रचनाओं की आशा के साथ शुभकामनाएँ|

---ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 6 नवंबर 2013

प्रतिक्रियाएँ....

http://thalebaithe.blogspot.in/2013/07/sp229.html#comment-form

ठाले बैठे ब्लाग पर मेरे कुछ दोहे प्रकाशित हुए थे जिन्हें ऊपर ले लिंक पर देखा जा सकता है...
वहा़ पर आदरणीय अरुण निगम सर ने मेरे प्रत्एक दोहे के लिए प्रतिक्रियास्वरूप एक दोहा लिखा...उन्हे इस ब्लौग पर साभार सहेज रही हूँ...साथ में सौरभ पाण्डेय सर की प्रतिक्रिया भी प्राप्त हुई थी ...उसे भी साभार दे रही हूँ...




ऋता- सद्गुणियों के संग से, मनुआ बने मयंक
ज्यों नीरज का संग पा, शोभित होते पंक

@कमल मलिन कब है सुना, निर्मल बसता ताल
पंक स्वयम् ही बोलता, यह गुदड़ी का लाल




ऋता- चंदा चंचल चाँदनी, तारे गाएँ गीत
पावस की हर बूँद पर, नर्तन करती प्रीत

@बूँद समुच्चय जब झरे,झर-झर झरता प्यार
बूँद समुच्चय जो फटे, मचता हाहाकार




ऋता- शुभ्र नील आकाश में, नीरद के दो रंग
श्वेत करें अठखेलियाँ, श्याम भिगावे अंग

@श्वेत साँवरे घन घिरे,लेकिन अपना कौन
गरजे वह बरसे नहीं, जो बरसे वह मौन




ऋता- हिल जाना भू-खंड का, नहीं महज संजोग
पर्वत भी कितना सहे, कटन-छँटन का रोग

@पकड़-जकड़ रखते मृदा,जड़ से सारे झाड़
ज्यों-ज्यों वन कटते गये, निर्बलहुये पहाड़




ऋता- महँगाई के राज में, बढ़े इस तरह दाम
लँगड़ा हो या मालदा, रहे नहीं अब आम

@आम खड़ा मन मार कर, दूर पहुँच से दाम
लँगड़ा खीसा हो गया,दौड़े लँगड़ा आम



नवीन भाईजी के सौजन्य से ही ऋता शेखर मधु के बारे में सुना-जाना.
आभार नवीन भाईजी.

मन का आकाश सुभावनाओं के घने मेघों से अच्छादित हुआ संतृप्त हो जाय तो सरस अनुभूतियों की झींसियाँ अनवरत झहरती रहतीं हैं ! रस-विभोर हृदय मनसायन हुआ मद्धिम तरंगों से झंकृत होता रहता है.. अनवरत !
ऐसे में सहजता विस्फारित आँखों मनोरम रंगों को अनायास आकार लेता देखती है. उन्हें छूती है और बूझने का निर्दोष प्रयास करती है. इसी सहजता को वर्तमान ने ऋतु शेखर मधु का नाम दिया है.

आज के दिन इस प्रकृतिप्रिया को अग्रज की ओर से जन्मदिन की अनेकानेक शुभकामनाएँ--

शब्द-भाव कोमल मृदुल मधुरस ऋतुपग छंद
विह्वलता अन्वेषमय, आवेशित मकरंद

छंद-रचना पर ढेर सारी बधाइयाँ.
शुभ-शुभ

  1. ठेस-टीस
    धिया, जँवाई ले गये, वह, उन की सौगात
    बेटे, बहुओं के हुये, चुप देखें पित-मात-ऋता
    *********************************
    सास यही कल थी बहू,यही पिता था पूत
    बोये पेड़ बबूल के , चाह रहे शहतूत |
    Reply
  2. उम्मीद
    बूढ़ी आँखें है विकल, कब आएगा लाल
    रात कटे उम्मीद में, अब पूछेगा हाल - ऋता
    *****************************
    मरने भी देती नहीं ,उम्मीदों की डोर
    रातें ढाढस बाँधती , धीर बँधाते भोर |

    सौन्दर्य 
    "गर्भवती मुख-रूप" का, कैसे करूँ बखान
    रविकर जैसा तेज, पर, शीतल चंद्र समान- ऋता
    *******************************
    "गर्भवती मुख-रूप" की, सुंदरतम तस्वीर
    संग-संग खिलते दिखें,मुखपर अरुण सुमीर|
  3. आश्चर्य
    अजब अजूबों से भरा, ब्रह्मा का संसार
    कोमल जिह्वा क्रोध में, उगल पड़े अंगार - ऋता
    ****************************
    लपट नहीं दिखती कभी,और न उठता धूम्र
    सुनने वाला आग में , जलता सारी उम्र |

रविवार, 13 जनवरी 2013

उस दीपक सी हो पावन तुम




इन मेघों की हो सावन तुम
इस बगिया की मनभावन तुम
जले रात्रि-मध्य देवालय में
उस दीपक सी हो पावन तुम

चंचल हवा सुहावन तुम
मीरा की वृंदावन तुम
इस रस्ते जो पतित हुए
हो करती उनको पावन तुम

प्राची किरण लुभावन तुम
प्रात: की सजावन तुम
मन जो मेरा डूब गया
उस सोच की हो प्लावन तुम...

...
..
1Unlike ·  · 

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

लयबद्ध कविता लिखना हुआ आसान



आजकल हिन्दी में दोनों तरह की कविताएँ लोकप्रिय हैं| लयबद्ध और बिना लय वाली|  लय वाले काव्य की अपनी खूबसूरती होती है| कभी- कभी हम चाह कर भी लयबद्ध कविताओं की रचना नहीं कर पाते क्योंकि राइमिंग शब्द नहीं मिल पाते हैं| अभी हाल में ही मेरे बेटे शिशिर शेखर ने एक कविता लिखी थी-ये तुम कौन(यहाँ क्लिक करें)- जिसे मैंने पोस्ट पर लगाया था और आपकी सराहना भी मिली थी|
वह ज्यादातर अंग्रेजी पोयम ही लिखता है|
हिन्दी में वह उसका प्रथम प्रयास था| राइमिंग कविताएँ उसे ज्यादा पसन्द हैं|
यह तो सर्वविदित है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है| उस वक्त उसे राइमिंग शब्दों की कमी महसूस हुई और राइमिंग शब्दों को पाने के लिए उसने नया वेबसाइट बनाया है| अंग्रेजी में राइमिंग शब्द देने वाले कई साइट हैं| हिन्दी में सम्भवतः यह प्रथम साइट होगा जो अर्थ के साथ राइमिंग शब्द देगा| यहाँ पर एक लाख दस हजार के लगभग शब्द हैं|  कुछ कमियाँ भी होंगी जो आपके सुझाव पर दूर होती चली जाएँगी| साहित्य को टेक्नोलॉजी का साथ मिला है|
आपसे आग्रह है ,साइट को अवश्य देखें| कुछ पूछना चाहें तो यहाँ के कमेन्ट बॉक्स में पूछें अथवा साइट पर ही पूछें| जहाँ तक हो सकेगा हम आपकी शंकाओं का समाधान करेंगे| आज  इसे लोकार्पित करते हुए मुझे बहुत हर्ष हो रहा है|
यह रहा उस वेबसाइट का लिंक---http://shabdvyuh.com/

यहाँ शुरु वाले, बीच वाले और अन्त वाले...तीनों तरह के राइमिंग मिलेंगे
कुछ पैटर्न साइट पर हैं
उदाहरण के रूप में नीचे कुछ पैटर्न दे रही हूँ...कॉपी पेस्ट करके देख लीजिए
सार*
सा*न
?ज?


ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

ये तुम कौन




ये तुम कौन
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इस संध्या की बेला में,

जब निपट अकेला बैठा मैं
पर भगदड़ के बीचों इस मौन 
में अठ्ठहासी ये तुम कौन?


पल ये कितने चले गए
अनंत अर्णव में बिखर गए
बीत गया जो पहर ये पौन
फिर भी जाने मन क्यों गौण...

ध्यान से परे कैसा ये खेल
विषाद भी है और है अठखेल
चहुँ ओर तो सिर्फ हैं रौन
फिर मन में सन्यासी कौन?

कट कट कर बहता है चित्त
मृत नहीं - अत्यंत विचित्र
लथपथ पड़ा बिचारा जौन
उसी के कारण मन ये मौन...



शिशिर शेखर......मेरे सुपुत्र






मेरी नकल कर रहा हैः)

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

होठों पे हँसी बनी रहे...

मेरी दीदी
                                      प्यारी बहन ऋता को सप्रेम भेंट     

बरसों पहले मुझे मिली थी
प्यारी सी इक छोटी बहन
फूलों सी वह कोमल थी
हर लेती थी सारी थकन|

रवि की ऊर्जा से भरी हुई
शीतल यूँ जैसे हो चाँदनी
मीठे बोल बिखराती हुई
धीर गंभीर जैसे मन्दाकिनी|

कहने को तो बहन है मेरी
है राज़दार जैसे हो सहेली
छोटी है पर अडिग ढाल सी
सुलझाती जाती जीवन की पहेली|

एक रीत बनाई ऋता ने
दिया जन्मदिन पर कविता उपहार
मैं भी शायद कुछ लिख पाऊँ
होगा यह तुम्हारा उपकार|

जिस चमन से तुम गुजरोगी
वहाँ बहार आ जाएगी
जिस राह पे पाँव रखोगी
खुशहाली छा जाएगी|

सितारों की झिलमिल किरणों से
सम्मान सौगात पाओगी
सोंच सागर से मोती चुन-चुन
ज्ञान जल से चमकाओगी|

ईश्वर से कामना यही है
सपने पूरे करें तुम्हारे
खुशहाल ज़िन्दगी पाओ तुम
होठों पे हँसी बनी रहे|
          तुम्हारी दीदी

मेरी दीदी लेखिका नहीं ...मेरे लिए उन्होंने लिखा है...जन्मदिन का अनमोल तोहफा है यह मेरे लिए...
Thank You Didi
Thanks Bhai & Bhabhi
ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 30 मई 2012

एक कहानी यह भी...




एक कहानी यह भी...
हिन्दी दैनिकआजके शिक्षानामा से साभार(२८ मई-१२)
लेखक- डॉ लक्ष्मीकांत सजल
वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षा प्रतिनिधि
हिन्दी दैनिकआज,पटना |

उस दिन कम्पीटीशन था मेढकों के बीच.सो बड़ी संख्या में मेढक पहुँचे थे.पास- पड़ोस के गढ्ढे तालाब से.और दूर दराज के गढ्ढे- तालाबों से भी. फुदक फुदक कर चलते हुए.उनमें भाँति- भाँति के मेढक थे.छोटे- छोटे मेढक, मद्धम कद के मेढक और ढाबुस भी.सभी मेढक जमा हुए पहाड़ी के नीचे तलहटी में.कुछ तो कम्पीटीशन में हिस्सा लेने पहुँचे थे, बाकी दर्शक बन तमाशा देखने. कम्पीटीशन शुरू होने में देरी थी इसलिए सभी उछल-कूद कर रहे थे.बच्चे उधम मचा रहे थे टर्र-टर्र कर. टर्र-टर्र तो बुजुर्ग भी कर रहे थे लेकिन बच्चों को शांत करने के लिए.कम्पीटीशन में हिस्सा लेने वालों की टरटराहट अलग किस्म की थी इसलिए कि वे काफी जोश में थे.मेढकों की टरटराहट से ऐसा लग रहा था जैसे वे बारिश के इन्तेज़ार में हों.लेकिन उन्हें बारिश का इन्तेज़ार थोड़े ही था.उन्हें तो कम्पीटीशन शुरु होने का इन्तेज़ार था.मेढकों के पहाड़ पर चढ़ने का कम्पीटीशन, पहाड़ की चोटी पर पहुँचने का कम्पीटीशन .
खैर,नियत समय पर कम्पीटीशन शुरु हुआ.कम्पीटीशन में हिस्सा लेने वाले मेढक पहाड़ पर चढ़ने लगे फुदकते हुए.अब बाकी मेढक साँस रोकर कर उन्हे देख रहे थे,फुदक-फुदक कर पहाड़ की ऊँचाइयाँ तय करते हुए.कुछ तो चढ़ने के साथ ही लुढ़क कर नीचे आ गिरे.जो चढ़ते जा रहे थे, उन्हें नीचे से शाबाशियाँ मिल रही थीं.प्रशंसा के स्वर मिल रहे थे.जहाँ किसी और गढ्ढे या तालाब का मेढक आगे निकलता, नीचे जमा दूसरे गढ्ढे या तालाब के मेढक उदास हो जाते.समय गुजरता गया और मेढक नीचे गिरते गए.धीरे-धीरे तमाम मेढक नीचे आ गिरे.अब सिर्फ एक मेढक बचा था.वह फुदक-फुदक कर आगे बढ़ा जा रहा था,ऊँचाइयाँ तय करते हुए.उसके सामने उसका लक्ष्य था.नीचे जमा तमाम मेढक टकटकी लगाए उसे ही देख रहे थे, यह देखने के लिए कि वह कि वह अपने लक्ष्य तक पहुँचता है या नहीं.नीचे से सभी उसका उत्साह बढ़ा रहे थे.आखिरकार उसने अपने लक्ष्य को छू ही लिया.पहाड़ की चोटी पर पहुँचते ही उसने दोनों हाथ हिलाए, विजेता की मुद्रा में.नीचे जमा सभी मेढक खुशी के मारे उछल पड़े.
वह नीचे उतरा तो उसे फूलमालाओं से लाद दिया गया.हर गढ्ढे तालाब के मेढक उसे बधाई देने लगे.जो छोटी नदियों से आए थे वे भी बधाई देने लगे.लेकिन वह तो निर्विकार था.इस तरह कि जैसे सुन ही नहीं रहा हो.बाद में पता चला कि वह मेढक बहरा था.
यह कहानी संपादक जी ने तब सुनाई जब उनकी पुस्तक रिलीज हो रही थी.सो कहानी का सार यह है कि अगर वह मेढक बहरा नहीं होता तो अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाता.बाकी मेढकों की तरह वह भी नीचे आ गिरा होता, अपने साथियों से आलोचना या प्रशंसा के स्वर सुनकर.लक्ष्य को वही हासिल कर सकता है जिसे आलोचना या प्रशंसा की चिंता न हो. उसे चिन्ता हो तो सिर्फ अपने लक्ष्य की.  


प्रस्तुति- ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 9 मई 2012

रश्मि प्रभा -- हिन्दी साहित्य जगत में सशक्त हस्ताक्षर

rashmi prabha's profile photo
रश्मि प्रभा
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पुस्तक का नामः महाभिनिष्क्रमण से निर्वाण तक
विधाः कविता
कवयित्री- रश्मि प्रभा
पृष्ठः 96
मूल्यः रु 150
प्रकाशकः हिंद युग्म, नई दिल्ली

रश्मि प्रभा का नाम इंटरनेट की दुनिया के लेखकों-पाठकों के लिए नया नहीं है। रश्मि उन बहुत थोड़े लोगों में से हैं, जिन्होंने इस आभासी दुनिया का बहुत रचनात्मक इस्तेमाल किया है। ये थोड़े लोग ही किसी माध्यम विशेष की प्रासंगिकता को चिन्हित करते हैं। हर कवि लिखते-लिखते एक समय अपनी एक खास शैली विकसित कर लेता है। प्रस्तुत संग्रह में रश्मि अपने पूर्णतया मौलिक स्वर एवं शैली के साथ मौजूद हैं। इनकी कविताओं का झुकाव कुछ हद तक आध्यात्मिक है और इस संग्रह की लगभग हर कविता में यह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान है।
सिद्धार्थ के महाभिनिष्क्रमण की कहानी का मुख्य पात्र यधोधरा है। रश्मि ने 'सिद्धार्थ ही होता' कविता के माध्यम से किसी सिद्धार्थ के बुद्ध होने की प्रक्रिया में उसकी यशोधरा की भूमिका को रेखांकित किया है। रश्मि की यह नवीन दृष्टि ही इनके लेखन को नई ऊँचाइयाँ प्रदान करती है। असल में रश्मि के काव्य-साहित्य की एक बहुत खास बात यह भी है कि इसमें पौराणिक एवं ऐतिहासिक चरित्र नये अर्थों के निकस पर कसे जाते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस कारण ही रश्मि की कविताएँ प्राचीन मान्यताओं, परंपराओं एवं प्रवृत्तियों पर नये तरह से विमर्श करने का सामर्थ्य रखती हैं।
रश्मि अपनी कुछ कविताओं में पुरुषवादी प्रवृत्तियों से मध्यमवर्गीय स्त्री की भाँति सवाल करती नजर आती हैं। 'महिला दिवस' के नाम पर पुरुषवादी मानसिकता द्वारा किए जाने वाले छल को उजागर करती हैं। 'पुरुष और स्त्री' कविता में एक दार्शनिक की तरह इन दो मानसिकताओं का फर्क समझाती हैं। कुल मिलाकर रश्मि की कविताओं में बहुत सारे विमर्श हैं, बहुत से सवाल हैं, कुछ समाधान भी हैं और इनसे भी अधिक लगातार असंवेदनशील होते जा रहे मनुष्य को सचेत करने के प्रयास हैं। मैं समझता हूँ कि पाठक इन्हें हृदय से स्वीकारेंगे।
शैलेश भारतवासी
संपादक, हिंद युग्म