हमने आपको देखा नहीं
पर जानती हूँ आपको
आपकी रचनाओं के माध्यम से
समझ पाती हूँ
आपकी खुशियाँ, आपके दर्द
समझती हूँ आपके एहसास
यूँ लगता है जैसे
घूम रही हैं आप
हमारे ही आसपास
हमारे बालों को सहलाती
हमारे हताश मन को
सांत्वना की थपकियाँ देती
हमारे सपनों को पंख देती
हमें यूँ लगता है
बहुत मिलते हैं हमारे ख़यालात
लेखनी आपकी है
पर लिख जाती है हमारे जज़्बात
आपकी हर रचना लगती है
जैसे हो हमारे दिल की बात
हम मिलें न मिलें
पर हर दिन मिलते हैं
एक नई कविता के साथ
कभी खिलखिलाती
कभी गुनगुनाती
कभी सिसकती हुई
कभी बादलों पर
पंख लगाकर उड़ती
कभी हरसिंगार सी महकती
कभी अंगारों सी दहकती
कभी चिड़ियों सी चहकती
कभी नदियों सी मचलती
सूर्य-रश्मि की प्रभा बनीं
आप कितनों का
पथ आलोकित करती हैं
शायद आप भी नहीं जानतीं
दिल से दिल का कनेक्शन जोड़ती
चमकीले बिखरे मोतियों को समेट
उन्हें अभिव्यंजित करती
फूलों द्वारा दिए ज़ख्मों पर
मलहम रखती
आप न मिलकर भी
हमारा संबल बन जाती हैं
फिर कैसे कहूँ
मैं आपको नहीं जानती !!!
ऋता शेखर ‘मधु’