प्रकाश
वृत
भोर
की
आहट
पा
दृग
कपाट
खुलते
ही
दिख
जाती
है
झरोखे
की
झिर्री
से
झाँकती
रवि
की
प्यारी
सी
किरण
असंख्य
धूल-कणों
को
समेटे
झिलमिल
करती
रहती
वह
किरण
नन्हें
बालकों
की
चेष्टा
प्रकाश
को
मुट्ठी
में
कैद
करने
की
देख,
दीप्त
हो
हँसती
वह
किरण
रवि
की
चमकीली
किरण
धरा
पर
छोटा
सा
प्यारा
सा
प्रकाश
वृत
बनाती
किरण
पथ
का
अवरोध
मैं
हाथों
को
बनाती
धरा
का
छोटा
सा
वृत
बिना
मिटाए
मिट
जाता
बिना
उठाए
ही
वह
वृत
हाथों
पर
आ
जाता
दृग
कपाट
की
भाँति
मन
के
द्वार
तुम
खोलो
दिख
जाएगी
भक्ति
के
झरोखे
से
झाँकती
आशा
की
सघन
किरण
खुद
में
समेटे
निराशा
के
असंख्य
धूल-कण
यूं
ही
छोड़
दो
धूलकणों
को
मत
कैद
करो
मुट्ठी
में
तुम्हे
दिखेगा
वृत
सफलता
का
किरण-पथ
का
अवरोध
करो
प्रयास
के
हाथों
से,
बिना
उठाए
सफलता
वृत
आ
जाएगा
तुम्हारे
हाथों
में
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ऋता
शेखर
‘मधु’