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शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

ये तुम कौन




ये तुम कौन
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इस संध्या की बेला में,

जब निपट अकेला बैठा मैं
पर भगदड़ के बीचों इस मौन 
में अठ्ठहासी ये तुम कौन?


पल ये कितने चले गए
अनंत अर्णव में बिखर गए
बीत गया जो पहर ये पौन
फिर भी जाने मन क्यों गौण...

ध्यान से परे कैसा ये खेल
विषाद भी है और है अठखेल
चहुँ ओर तो सिर्फ हैं रौन
फिर मन में सन्यासी कौन?

कट कट कर बहता है चित्त
मृत नहीं - अत्यंत विचित्र
लथपथ पड़ा बिचारा जौन
उसी के कारण मन ये मौन...



शिशिर शेखर......मेरे सुपुत्र






मेरी नकल कर रहा हैः)