दिवाली......ताँका कविताएँ!!!

1
निष्कंप थी लौ
दृढ़ विश्वास संग
कुछ यूँ जली
आँधियों की कोशिश
नाकाम कर गई।

2.
सृष्टि-नियम
दिन के संग-संग
रात भी आती
दिए जलाके रखो
लौ को बचाके रखो।

3
फुलझड़ियाँ
पटाखों से यूँ बोलीं-
'करो न बोर
मैं तो राह दिखाती
तू करता है शोर।'

4
धरा-बाला ने
पहनी दीप-माला
इठला गई
मन्द समीर संग
हौले-हौले वो डोली।

5.
खुशी के फूल
हर बाग में खिलें
सद्भाव की लौ
हर दिए में जले
देश रौशन रहे।

ऋता शेखर मधु
ऋता शेखर मधु