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सोमवार, 12 नवंबर 2012

फुलझड़ियों ने पटाखों से कहा...


दिवाली......ताँका कविताएँ!!!



1
निष्कंप थी लौ
दृढ़ विश्वास संग
कुछ यूँ जली
आँधियों की कोशिश
नाकाम कर गई।


2.
सृष्टि-नियम
दिन के संग-संग
रात भी आती
दिए जलाके रखो
लौ को बचाके रखो।


3
फुलझड़ियाँ
पटाखों से यूँ बोलीं-
'करो न बोर
मैं तो राह दिखाती
तू करता है शोर।'
4
धरा-बाला ने
पहनी दीप-माला
इठला गई
मन्द समीर संग
हौले-हौले वो डोली।


5.
खुशी के फूल
हर बाग में खिलें
द्भाव की लौ
हर दिए में जले
देश रौशन रहे।



ऋता शेखर  मधु