बुधवार, 10 अगस्त 2022

डेढ़ इंच मुस्कान - क्षणिका संग्रह-समीक्षा

 



डेढ़ इंच मुस्कान- क्षणिका संग्रह
क्षणिकाकारः श्रीराम साहू

समीक्षक ; ऋता शेखर ‘मधु’

क्षणिकाओं की शान- डेढ़ इंच मुस्कान

मुझे मेरी सद्य प्रकाशित पुस्तक , मृणाल का बदला, के साथ श्वेतांशु प्रकाशन की ओर से उपहारस्वरूप डेढ़ इंच मुस्कान मिली है। अब आप सोच रहे होंगे यह मुस्कान कैसे मिली। मैं बात कर रही हूं श्री राम साहू जी की क्षणिका संग्रह 'डेढ़ इंच मुस्कान' की। आज जबकि मुस्कान भी मिलीमीटर में मिलती है तो डेढ़ इंच तो बहुत बड़ी बात है। पुस्तक का शीर्षक बहुत ही अच्छा है।आवरण पृष्ठ पर मुस्कुराती हुई स्माइली का प्रयोग आकर्षक है|

क्षणिका एक मारक विधा है जो चिंतन की ओर अग्रसर करती है। किसी विशेष क्षण में हुए अनुभव को चंद पंक्तियों में उतार देना क्षणिकाकार की खासियत होती है। क्षणिकाएं लघु कविता नहीं होती। क्षणिका के क्षेत्र में लिख रहे रचनाकारों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए तब वे लघु कविता एवं क्षणिका के अंतर को समझ सकेंगे।। लेखक श्री राम साहू जी अपनी बात क्षणिका के माध्यम से रखते हुए कहते हैं कि जिंदगी/ हादसों व विडंबनाओं का/ शिकार है…शेष कुशल मंगल है/ बाकी तो आप सभी पाठक /अधिक समझदार हैं… यहीं से लेखनी ने कमाल दिखाना आरम्भ कर दिया है ।।

भूमिका प्रसिद्ध व्यंग्यकार गिरीश पंकज जी ने लिखी है।पंकज जी का कहना है कि लेखन के क्षेत्र में नन्हीं विधाए, जैसे हाइकु, तांका, लघुकथा, क्षणिकाएँ आदि फास्ट फुड की तरह हैं| जिस तरह लोग अधिक देर तक भोजन करना पसंद नहीं करते, उसी तरह समयाभाव के कारण लम्बी रचनाएँ भी पढ़ना पसंद नहीं करते|

नन्हीं रचनाओं का सृजन चुनौतीपूर्ण होता है| बहुत कुछ कहने के लिए चंद शब्द मिलते है| यह लेखक की काबिलियत होती है कि गागर में कितना सागर भर पाए| विषय चयन भी सोच समझकर करना होता है| उस हिसाब से लेखक ने समयानुसार विधा का चयन करके अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है| सामाजिक सरोकार से लेकर राजनीति, पर्यावरण को विषय बनाते हुए उन्होंने गंभीर सृजन किया है|

कथ्य एवम शिल्प आकर्षित करते हैं।राजनीति और सत्ता को विषय बनाया जाए तो सर्वप्रथम रामराज्य को ही सबसे आदर्श राज्य माना जाता है। किन्तु आदर्श होने के बावजूद आलोचना से कोई भी राज्य अछूता नहीं रह पाता। राज्य को स्वार्थी होने के दृष्टिकोण से मन्त्रणा देने वाले मंथरा सरीखे लोग हैं, तो राजा के हर कृत्य पर अँगुली उठाने वाले धोबी सरीखे भी हैं। जब- जब रामराज्य की चर्चा होगी, ये दोनों स्वयमेव शामिल माने जाएँगे।

* हम /रामराज्य/ स्थापित/ करने में/ सफल हुए हैं /धोबी-मंथरा/ गली-गली/ पल रहे हैं।

चंद शब्दों वाली इस विधा में तुकांत का भी निर्वहन किया जाए तो क्षणिकाओं का स्वरूप अलग ही दिखता है। आदी और अवसरवादी का प्रयोग नितांत खूबसूरत बन पड़ा है। राजनीति पर निशाना साधने वाली यह रचना विपक्ष की भूमिका पर व्यंग्य करता हुआ थोड़ा स्मित भी दे जाता है। जब से सत्ता है तब से महंगाई एक मुद्दा है। चीजों के दाम हर किसी के राज्य में बढ़ते रहे हैं और सत्तापक्ष को निशाना बनाने का हथियार भी बनते रहे हैं। यह विरोध जोरशोर से इसलिए होता है कि विपक्ष का पक्ष मजबूत हो। लोकतंत्र जब भ्रष्टाचार का पर्याय बन जाये तो इस तरह की क्षणिकाएँ जन्म लेती हैं। बेईमानी में ईमानदारी, विरोधाभास का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत कर रहा। विरोधाभास लिए कई क्षणिकाएँ ध्यानाकर्षण करती हैं|

*महंगाई के खिलाफ/उनका/ विरोध अभियान/ युद्धस्तर पर/ जारी है। 'उल्लू' सीधा करने की /पूरी तैयारी है।।

आंदोलन करवाकर तहलका मचाना और स्वयं बच निकलने वाले नेताओं पर मारक सृजन है। बेचारी जनता उन नेताओं के प्रभाव में आकर अपना समय, जोश और समर्पण दाँव पर लगाने के लिए तैयार रहती है| जेल तक चली जाती है और आंदोलन का सृजनकर्ता चैन की वंशी बचाता सुख की नींद सोता है|

* उनके/ आंदोलन से/ तहलके मच गए। सब ने जेल की/ राह ली, वे अकेले बच गए।।

सत्ताधारी नेताओं के बदलते व्यवहार को चंद शब्दों में दर्शाना बड़ी कला है| उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ अपने पद और गरिमा को ईमानदारी से निभाने के लिए लेना होता है|किन्तु शपथ ग्रहण के बाद वे कुर्सी बचाने के चक्कर में ईमानदारी कहीं खो जाती है|

विरोधाभास से रची गयी क्षणिका अच्छी बनी है| मनुष्य का नैतिक पतन उसके उत्थान में सहायक है, इससे और कितना अधिक गिरेगा आदमी|

* सचमुच/ आज आदमी/ काफी तरक्की/ कर चुका है। नीचे गिरने की/ हद तक, ऊपर/ उठ चुका है।।

श्रीराम साहू जी ने क्षणिकाओं में बहुत बारीकी से हर उस कथ्य को उभारा है जो आम मनुष्य सोचता है|एक तरफ प्रगति के नाम पर पारिवारिक विखंडन पर रचना है तो दूसरी तरफ कार्य प्रणाली में कागजी घोड़े दौड़ा कर कार्य की संपूर्णता दिखाने की बात कही गई है| जिनके बड़े बड़े बोल होते हैं उनके काम कम होते हैं| हर समस्या पर सिर्फ वार्ता होती है|

*उन्होंने/ प्रगति के/ नए आयाम/ गढ़ लिए हैं/ पहले चारदीवारी में/ रहते थे/ अब केवल दीवार/ खड़ी कर लिए हैं||

* उन्हें/ काम से कम/ बात से अधिक/ वास्ता है| उनकी मान्यता है/ हर समस्या का हल/ केवल वार्ता है ||

क्षणिकाओं में कभी तुकांत का प्रयोग मनभावन है तो कभी अतुकांत में सधी लेखनी चली है| रचनाओं को पढ़ते समय मुस्कान भी सहज रूप से आती है| आपने सत्ता और सत्ताधारियों पर चुटीले तंज किए हैं जो हर आदमी मुस्कुराते हुए स्वीकार कर ले| कथ्य और शिल्प का निर्वहन है और भाव भी भरपूर है|

कहीं- कहीं रचना सपाट बयानी भी लगी , किंतु कथ्य प्रभावशाली होने के कारण प्रभाव छोड़ने में सफल रही|

प्रायः पुस्तक का समर्पण लिखते समय उसी विधा का चयन किया जाता है जिस विधा में पुस्तक बननी है| क्षणिका की पुस्तक का समर्पण पृष्ठ हाइकु में होने के कारण आरम्भ में थोड़े भ्रम की स्थिती बन रही| ऐसा प्रतीत होता है जैसे हाइकु संग्रह हो|

लेखक श्रीराम साहू जी 1984 से लेखन में सक्रिय हैं। उनकी रचनाओं का पत्रिकाओं में प्रकाशन 1987 से जारी है। आप फेसबुक में विभिन्न संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान प्राप्त कर चुके हैं।

श्रीराम साहू जी की लेखनी सतत क्रियाशील रहे, इसके लिए हार्दिक शुभकामनाएँ।

पुस्तक की साजसज्जा, पन्नों की स्तरीयता एवं छपाई…सभी सुन्दर हैं।

पुस्तक परिचय

पुस्तकः डेढ़ इंच मुस्कान

लेखकः श्रीराम साहू

पृष्ठः ११२

मूल्यः २५०/-

प्रकाशकः श्वेतांशु प्रकाशन, नई दिल्ली

प्रकाशन का मोबाइल नम्बरः 8178326758, 9971193488

दोहा में नटराज


विषय- नटराज
============
शिव  ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में
चित्र गूगल से साभार



















1

चोल वंश ने कांस्य से, सृजित किया नवरूप।
तांडव मुद्रा में ढले, शिवजी लगे अनूप।।

2

शिव नर्तक के रूप में, कहलाये नटराज।
बस एक बार प्रेम से, दें उनको आवाज।

3

नृत्य करें नटराज जब, स्पंदित हो आकाश।
महायोगी महेश वह, उनसे है कैलाश।।

4

नटराजन के नृत्य से, कण कण भरे प्रमोद।
जग सारा गतिशील है, डमरू करे विनोद ।।

5

घूम रहे ब्रह्मांड में, नीलकंठ नटराज।
अंतरिक्ष की ओम ध्वनि, खोल रही यह राज।।

6

शर्व: हरो मृडो शिवः, या कह लें नटराज।
एक नाम है तारकः, डमरू जिनका साज़।।

7

शिव वेदांगों शाश्वतः, उनकी कृपा अपार ।
करने जग-कल्याण वह, आते बारम्बार ।।

8

चार भुजाओं से सजे, कदम उठे ज्यों ताल |
हर मुद्रा को सीखकर, नर्तक हैं मालामाल||

9

प्रीत भरा संसार हो, सद्भावी हो ठाँव |
बौनारूपी द्वेष पर, थिरके शिव के पाँव ||

10

एक हाथ में दिख रहा, डमरू जैसा साज| 
दूजे से जग को अभय, देते हैं नटराज ||

11

अनल घेर में हैं घिरे, लेकर ऊर्जा स्रोत |
आभामंडित शिव धरे,नृत्य पक्ष प्रद्योत||( नृत्य की एक मुद्रा)

@ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 13 जून 2022

पाठकीय में कमल कपूर जी की पुस्तक

पाठकीय प्रतिक्रिया-ऋता शेखर ‘मधु’

रंग भरे दिन-रैन- दोहा संग्रह
लेखिका- कमल कपूर
प्रकाशन- अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- 260/-
पृष्ठ- १०५













छंद विधान के अनुसार लेखन का अपना सौन्दर्य होता है| मात्र ४८ मात्राओं में कोई धारदार बात कह देना दोहा छंद की विशेषता है| इसी ध्र को महसूस करते हुए हम यह पुस्तक पढ़ेगे|

पुस्तक लेखन की दुनिया के सहृदय लेखक रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी को समर्पित की गई है| उसके आगे लेखिला का गुरु के प्रति समर्पित दोहै है जो गुरु के प्रति लेखिका का सम्मान प्रदर्शित करता है|

पहले गुरु की वंदना करूं हाथ में जोड़। जिसने चमकाया सदा जीवन का हर मोड़।।

कमल जी ने कुछ दोहे कलम को समर्पित किए हैं। लिखते कथा कहानियां मीठे मोहक गीत। लिखे खत मनुहार के कलम मनाती मित्र।

अनुक्रम में चार विषयों के अंतर्गत उप विषय रखे गए हैं|

लेखिका ने अपनी बात में लिखा है की उनके 480 दोहे पूजा के वे दीप हैं जो उन्होंने कृतज्ञ भाव से देवी प्रकृति की उपासना करते हुए प्रज्वलित किए हैं।

अनुक्रम में चार विषयों के अंतर्गत उप विषय भी रखे गए हैं। प्रथम विषय रंग भरे दिन रैन के अंतर्गत पहला उप विषय रंग भरे दिन रैन ही है।

बरसों से मौसम सभी, देख रहे भर नैन।
रूप बदलते हर घड़ी, रंग भरे दिन- रैन।।

यहाँ पर दोहाकार ने मौसम की आवाजाही और उस के बदलते स्वरूप को अपने अनुभव से जोड़कर लिखा है। यह मौसम कभी खुशियों के भाव भरते हैं और कभी उदास कर जाते हैं। सभी भाव के अपने रंग होते हैं जिसमें जीते हुए मनुष्य अपने दिन और समय को व्यतीत करता जाता है। प्रकृति के सानिध्य में दिन का सबसे उर्जात्मक समय सुबह का समय होता है। जिसने भोर को देखा और आनंद उठाया वही सुबह के खुशनुमा रंग को आत्मसात कर सकता है।

माखन से उजली सुबह ,पाखी दल के गीत।
हँसी खुशी है घूमती, बनके जुड़वा मीत।।

सुबह के लिए माखन का बिंब लेना आकर्षित करता है।

एक और दोहा देखिए…

रजनीगंधा रेन थे,दिन थे शोख़ गुलाब।
दिन में हाथ किताब तो, रातों को थे ख्वाब।।

एक दोहा देखिए जिसमें कवयित्री का हल्का सा चुहल नजर आता है।

जाड़े में रविराज जी, करते नखरे खूब।
बादल से नाराज हो, गए नदी में डूब।।

मौसम में जेठ सबसे गर्म महीना माना जाता है। यह गर्मी जहाँ पशु पक्षी समुदाय को त्रस्त करती है, परेशान करती है वहीं यह गुलमोहर में नई रंगत पैदा करती है।

धूप जेठ की सींचती, गुलमोहर में जान।
सूरज से ले लालिमा, बढ़ती अद्भुत शान।।

जब दिवस का अवसान होता है तो भोर में जितने स्वर्ण रश्मियाँ बिखरी थीं उन्हें समेटने का काम भी शुरू होता है। और यह काम सांझ के जिम्मे आता है।

किरण-गठरिया लाद के, चली केसरी शाम।
पहुँचेगी यह रात तक, अँधियारे के गाम।

अंधियारे के गाँव में क्या होता है इसका दर्शन करते हैं।

नीरवता में गूंजता, मलयानिल संगीत।
चाँद फलक पर आ गया, हुई रात की जीत।।

एक अन्य सुंदर दोहा देखिए…

कुमुद कुमुदिनी से सजे, नदी सरोवर ताल।
लहरों पर तेरा करें, उजले बाल-मराल।।

ऋतुओं में सबसे मनमोहक ऋतु बसंत का होता है। यह बहारों का मौसम है| ये बहार फूलों और तितलियों से आती है| चारो ओर उनका साम्राज्य दिखता है| यह बात दोहा के माधयम से कवयित्री ने इस प्रकार लिखी है|

बासंती ऋतु ने किया, अजब अनोखा काम।
सारा गुलशन लिख दिया, अलि-तितली के नाम।।

चारों ओर बढ़ते प्रदूषण और अरशद हवा की कमी की ओर कवित्री ने बहुत ही सरल और सरस भाव से इशारा किया है। जहां वह मंदाकिनी हो कदंब की छांव। खोजें चलकर आज ही ऐसा कोई गांव।।

ऋतुओं का उल्लेख करते हुए महाकवि निराला के अवतरण दिवस को लेखिका ने मनभावन तरीके से लिखा है।

मधुरिम तिथि थी पंचमी, ऋतु बसंत अभिराम।
जब भारत के पटल ने, लिखा ‘निराला’ नाम।।

लेखक जब कभी कलम उठाता है तो उसकी कोशिश रहती है की वह मानव मन को भी परिभाषित करें और प्रेरणा की पतवार पकड़कर मनुष्य को निराशा के दलदल से पार कराने का प्रयास करें| लेखिका ने भी मानव मन पर और रिश्तो पर अच्छे दोहे सृजित किए हैं| मन को धैर्य बंधाने का प्रयास देखिए…

झड़ गई सारी पत्तियां, पर ना पेड़ उदास|
सांस सांस में पल रहे, नव जीवन की आस।।

कवयित्री ने सबके लिए मंगल कामना करते हुए लिखा है-

दीपक रोज जलाइये, एक सुबह इक शाम|
महारोग से जूझते, सब लोगों के नाम।।

लेखिका ने खिड़की को विषय बनाते हुए लिखा है…

खिड़की के आगे कभी, ना चिनना दीवार।
सिसक रही बाहर खड़ी, ताजा मधुर बयार।।

इस दोहे में मकानों के बीच में दूरी ना होने का जिक्र हुआ है। शहरों में सटे-सटे मकान बनते हैं जिनसे खिड़की का फायदा खत्म हो जाता है। जिस खिड़की को हवा और धूप के लिए बनाया जाता है सामने दीवार उठ जाने से, वह घर वंचित रह जाता है।

कमल जी की लेखनी माँ के लिए बहुत भावपूर्ण चली है और खूब चली है।

माँ की महिमा का करें, कवि कोई गुणगान।
भरनी होगी और भी, उसे कलम में जान।।

सचमुच माँ को शब्दों में बाँध पाना बहुत कठिन है। इसी संदर्भ में दूसरा दोहा भी बहुत सुंदर है।

माँ बनकर ही जानती, बिटिया मां का मोल।
कानों में तब गूँजते, माँ के मीठे बोल।।

जब रिश्तो की बात चले तो भाई बहन का जिक्र ना हो, ऐसा नहीं हो सकता।

डोर कलाई बाँध के, तिलक लगाकर भाल।
भाई का सुख माँगती, बहना हुई निहाल।।

शेष अशेष के अंतर्गत एक दोहा जो आकर्षित कर रहा…

दीवारें कब तक सहे, तस्वीरों का भार|
मन में उन्हें सजाइए, चले गए जो पार।|

अक्सर घर में उनके फोटो रखे जाते हैं जो दुनिया छोड़ कर चले जाते हैं। कवयित्री का कहना है कि दीवारों पर सजाने के बजाय उन्हें मन में स्थान देना चाहिए ताकि वह हर जगह साथ रहे| उनकी तस्वीरें मन के दीवार पर होनी चाहिए , घर की दीवारों पर नहीं।

एक दोहा और है जो सीधे मन तक पहुंच रहा…

राहें तो सीधी सभी, टेढ़े मन के मोड़।
कभी हमें जो तोड़ दें, और कभी दे जोड़।|

कमल जी ने बहुत सार्थक तरीके से या बात समझाई है कि रास्ते हमेशा सीधे ही रहते हैं| यह मनुष्य का मन होता है जो राहों को सरल या कठिन बनाता है|

कवयित्री कमल कपूर जी की लेखनी सतत चलती रहे, इसके लिए दिल से शुभकामनाएँ !!

मंगलवार, 7 जून 2022

छंद विजात में परमपिता

छंद - विजात
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मात्रा विधान - १२२२ १२२२ , १४ मात्रिक सम छंद
चरण-४, चरणारंभ-१ लघु
चरणान्त-२२२(तीन गुरु)
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जिसे संसार ने जाना | 
जिसे संसार ने माना ||
सभी में जो समाया है | 
न नश्वर है न काया है ||१


उसी से आस मिलती है | 
उसी से श्वास खिलती है ||
जहाँ कण -कण लुभाया है| 
समझ लो ईश आया है||२

जहाँ विश्वास मिलते हैं |
वहाँ पर फूल खिलते हैं ||
लगाकर आस का चंदन| 
करें हम ईश का वंदन ||३

नदी की धार में बहते | 
किनारे दूर ही रहते ||
मिले उनका सहारा जब | 
जहां में कौन हारा कब ||४

धरा की हर फसल कहती | 
कृपा उनकी बनी रहती ||
तभी पावस बरसते हैं | 
तभी तो पेट भरते हैं ||५

दिवस भर सूर्य चलता है| 
निशा में चाँद ढलता है ||
इशारों पर हिलीं पातें| 
कहें सब ईश की बातें ||६

अमन को ध्यान में धरती | 
खुदा से कामना करती ||
दिलों में हों मुहब्बत भी | 
रक़ीबों पर मुरव्वत भी ||७

रहें सब साथ मिलजुल कर | 
चमन में गुल हँसें खुलकर ||
पवन जब चले बहारों में| 
नयन रीझे नजारों में ||८

– ऋता शेखर ‘मधु’

पाठकीय में ऋता शेखर 'मधु' की पुस्तक

पाठकः सीमा वर्मा जी
पुस्तक- धूप के गुलमोहर-लघुकथा संग्रह
लेखिका- ऋता शेखर 'मधु'

लेखकीय प्रतिक्रिया
'ऋता शेखर मधु' जी साहित्य जगत का एक जाना पहचाना नाम है। उनकी कलम लघुकथा से लेकर हाइकु, हाइगा, कविता, ग़ज़ल, आलेख एवम् छंदों पर भी खूब चलती है। सबसे अच्छी बात है कि आप विधा के प्रति बहुत गंभीर एवं समर्पित है। हाल ही में आपकी नवीनतम कृति 'धूप के गुलमोहर' प्रकाशित हुई है। आपने यह संग्रह लघुकथा विधा को समर्पित किया है। कवर पृष्ठ बहुत ही शानदार है, पेपर भी उम्दा क्वालिटी का है। जिसके लिए 'श्वेतांशु प्रकाशन'
बधाई
के पात्र हैं।
संग्रह में सबसे अच्छी बात यह है कि अनुक्रमांक में सभी लघुकथाओं को विषयों के आधार पर वर्गीकृत किया है। 41 लघुकथाएं सामाजिक सरोकार से जुड़ी हुई हैं तो 45 लघुकथाएं रिश्तों के आधार पर बुनी गईं हैं। 4 लघुकथाएं कारोना काल पर और 43 अन्य विविध लघुकथाएं हैं।
संग्रह का शीर्षक 'धूप के गुलमोहर' अपने आप में गहन अर्थ समेटे हुए है। आखिर यह नाम ही क्यों? 'मन की बात' में लेखिका बताती हैं:
"जिंदगी की कड़ी धूप में चलते हुए मिल जाए गुलमोहर का घना साया...
समझ लो थके कदमों को मिल गया कोमल रूई का फाहा।"
गज़ब बात कही लेखिका ने:
"जिसने सही धूप, उसने पा लिया गुलमोहर सा रूप।"
जिसने आदत ही बना ली हो चुनौतियों को टक्कर देने की, उसे गुलमोहर की लालिमा पाने से कौन रोक सकता है भला। इसे कहते हैं कविता का हो जाना।
लेखिका ने पुस्तक की शुरुआत 'मेरी बात' से की है जिसमें रचना प्रक्रिया के बारे में भी बताया है कि जीवन जीते हुए, आसपास के लोगों से मिलते हुए कई पल ऐसे आतें हैं जो मन मस्तिष्क पर अपनी जगह बना लेते हैं। यही विशेष पल चिंतन के लिए मजबूर करते हैं। इन्हें हूबहू पेश नहीं किया जा सकता इसलिए उपयुक्त शब्दों का चयन कर रचना में ढालना पड़ता है। उन्होंने लघुकथा विधा को अपने शब्दों में परिभाषित किया है जो एक अनूठी पहल है।
इस संग्रह की भूमिका लघुकथाकारा 'आदरणीया प्रेरणा गुप्ता' जी द्वारा लिखी गई है जिसमें उन्होंने लघुकथाओं की समीक्षा भी की है। भूमिका पढ़ते ही पाठकों का मन अपने आप लघुकथाओं को पढ़ने के लिए लालायित हो उठेगा।
आइए अब बात करते है लघुकथाओं पर:
सामाजिक सरोकार से जुड़ी पहली ही लघुकथा 'माँ' ने दिल जीत लिया। जिसमें लेखिका का पैनी दृष्टिकोण नज़र आया और आगे की लघुकथाएं पढ़ने को मन आतुर हो उठा।
'मासूम अपराध' एक बेहद मार्मिक लघुकथा है जिसमें एक गरीब बच्चे की व्यथा को बखूबी बयां किया गया है।
'नया दरवाज़ा' संवादात्मक शैली में लिखी रचना है। जिसमें संदेश दिया गया है कि औरत होने का मतलब यह नहीं कि वह कमज़ोर है।
'नैतिकता' : उन लोगों पर अच्छा कटाक्ष किया है जो कहते कुछ और है और करते कुछ और है।
'अपनी- अपनी उम्मीदें' यह लघुकथा बहुत ही सार्थक लगी क्योंकि अक्सर लोग जो खुद कामचोर होतें हैं वही मेहनतकश लोगों पर छींटाकशी करते नजर आतें हैं।
'बेतार संदेश' जिंदगी आगे बढ़ने का नाम है। ज़माने के साथ तो चलना ही पड़ेगा। इस लघुकथा में लेखिका ने यही संदेश देने की कोशिश की है कि कभी-कभी जो हम सोच भी नहीं पाते वह हो जाता है।
'भूख का पलड़ा' एक बेहद मार्मिक लघुकथा है। भूख पर किसी का ज़ोर नहीं चलता। राजा हो या रंक, पेट की आग बुझानी ही पड़ती है। खाना किन हाथों से मिल रहा है यह भूखा पेट नहीं सोचता।
'गठबंधन' एक बढ़िया व्यंग्य रचना है क्योंकि कुर्सी के लिए तो लोग गधे को भी बाप बना लेते हैं।
'आदर्श घर' लिंगभेद की जड़ें अभी भी जीवित है। कौन कहता है कि बेटा बेटी में फर्क मिट गया है। अक्सर उभरती पीड़ा भीतर ही भीतर दबे घाव को पुनः हरा कर देती है।
'रिटायर्ड' इस कथा के माध्यम से यह बताया गया है कि जब इंसान के पास कुर्सी होती है तब सभी उसे पूछते हैं, उसका मान सम्मान भी करते हैं, कुर्सी से हटते ही वह इंसान सबके लिए बेगाना हो जाता है। चंद शब्दों में ही कथ्य को बड़ी खूबसूरती के साथ उभारा है।
'चिपको' बहुत बढ़िया लघुकथा है, चिपको आंदोलन का वह समय आंँखों के सामने सजीव हो उठा जिसे भले ही सब ने ना देखा हो मगर वह पीड़ा महसूस जरूर की है। शानदार शब्दों में इस रचना को पिरोया है लेखिका ने जिसके लिए वह
बधाई
की पात्र है।
'नेग'- प्रेम और सद्भावना भरा व्यवहार पत्थर दिल इंसान को भी बदलने पर मजबूर कर देता है।
'ठनी लड़ाई' चुलबुली सी मगर बेहद रोचक कथा है। आंँखों के सामने चलचित्र सी चलती, बिंबों का बेहद खूबसूरती से प्रयोग किया गया है।
रिश्तों की लघुकथाएं:
'अंतर्देशीय' आज के समय में रिश्तों में आती दूरियों का एहसास करवाती लघुकथा है।
'पुनर्गठित' इस लघुकथा में मांँ ने बेटी का साथ देकर सही किया ताकि जो उसके साथ घटा, वह बेटी के साथ ना घटे। आज की नारी कमज़ोर नहीं है। सार्थक दिशा की ओर अग्रसर करती लघुकथा के लिए साधुवाद है लेखिका को।
'समस्या' परिवार में आपसी प्रेम का उदाहरण देती मन को छू लेने वाली रचना है।
'सागर की आत्महत्या' एक बेहद गंभीर विषय उठाया है लेखिका ने अपनी इस लघुकथा के माध्यम से। अक्सर पूरे घर की जिम्मेदारियां निभाते पिता के मन की बात को कोई समझ नहीं पाता, उन्हें भी जरूरत है समझने की।
'आप अच्छे हो' प्रतियोगिता के युग में माता-पिता बच्चों को मशीन बना रहे हैं। उन्हें एक दूसरे से आगे बढ़ते देखना चाहते हैं। इसी बीच अगर वह ऐसा ना कर पाएं तो जीवन की एहलीला खत्म करने की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसलिए बेहतर है उन्हें सही समय पर संभाल लिया जाए। आज के युग के लिए संदेश देती एक सार्थक कथा।
विविध लघुकथाओं में:
'तुसी ग्रेट हो' एक बेहद हल्की फुल्की खूबसूरत रचना है।
'कॉपी पेस्ट' इस रचना को पढ़ने के बाद तो बस मन में एक ही पंक्ति बार-बार आ रही है "नानक दुखिया सब संसार।"
'एहसासों की दीपावली' रिश्तो का अहसास करवाती बेहद मार्मिक रचना है। समय बहुत तेजी से बीत रहा है और सब अपने आप में व्यस्त हैं, अकेलेपन से निपटने के लिए अपने मन को खुद ही समझाना पड़ता है।
'शपथ' इंटरनेट के इस दौर में हम रिश्तों को तरजीह देना भूल गए हैं और आभासी दुनिया में कहीं खो गये है।
अन्य और भी लघुकथाएं हैं जिन पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है किंतु आगे मैं पाठकों के लिए छोड़ती हूँ।
मुझे उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आपके विचार पाठकों के मन मस्तिष्क में उतरकर उनके जीवन को सही दिशा की ओर दृष्टिगोचर कर देंगे। लेखिका को इस खूबसूरत संग्रह के लिए हार्दिक
बधाई
एवं शुभकामनाएंँ प्रेषित करती हूँ। उनकी कलम यूंँ ही नित नये आयाम स्थापित करती रहे।
सीमा वर्मा
लुधियाना (पंजाब)
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बहुत बहुत आभार आदरणीया सीमा वर्मा जी

रविवार, 5 जून 2022

पाठकीय में गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की पुस्तक

 पाठकः ऋता शेखर 'मधु'

पुस्तकः  कुछ ठहर ले और मेरी ज़िन्दगी- गीत संग्रह

लेखिकाः गिरिजा कुलश्रेष्ठ


जीवन के अनेक रंग समेटता गीत संग्रह

“कुछ ठहर ले और मेरी ज़िन्दगी” गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की यह पुस्तक मुझे उन्ही के कर कमलों द्वारा ३ जून २०१७ में मिली थी| यह गीत संग्रह है जिसे पढकर मैं अचंभित होती रही| गिरिजा दी की लेखन शैली, प्रस्तुति, शब्द- चुनाव, भाषा सौन्दर्य बिल्कुल साहित्य अनुरूप लगता है| 

गीतकार ने अपनी बात में लिखा है,
“काँटों को मैं अपना लूँ, या मृदु कलियों को प्यार करूँ
ये दोनों जीवन के पहलू किसको मैं स्वीकार करूँ|
जीवन में चलने वाले उथल- पुथल की यह अभिव्यक्ति प्रभावशाली है|
कुल ६९ गीतों को १११ पृष्ठों में संजोया गया है| पुस्तक का शीर्षक , उनकी प्रथम कविता है| जीवन में आए झंझावातों से थकी ज़िन्दगी को सांत्वना देकर, बहला फुसलाकर कुछ दिन और रुकने का आग्रह करती लेखिका की सकारात्मक लेखनी मन भाई| काँटो की चुभन से अधिक पुष्प का खिलना भाया|

पुस्तक का प्रकाशन वर्ष २०१४ है| गीत समेटे गये हैं १९७५ से| एक गीत १९८७ का है जिसका शीर्षक है ‘सूर्य गीत’| दिनकर का आगमन होता है तो जग अपनी गति पकड़ता है|
तुम उगे तो
जग हुआ लयमान
तुम भले दिनमान

कवयित्री का गीत “गीत बनकर गूँज” मार्मिक है| यहाँ दर्द का आह्वान किया है | जीवन की व्यस्तता दिखाई गयी है|
आह भरने सिसकने की
है मुझे फुरसत कहाँ
बोझ इतना बाँटने को
कौन आता है यहाँ

गजलनुमा गीत ‘क्या करें' में बहुत बेबसी है| एक बंद देखिए|
वोटों की भीख माँगी, कितने करार करके
भूले जो जीतकर वो, आवाम क्या करे

बच्चे जब बड़े होने लगते हैं तो क्या क्या बदलाव आता है इसका रोचक वर्णन है|
अब उसके अपने दिन हैं
अपनी ही राते हैं|
अपने तर्क विरोध बहस
अपनी ही बातें हैं|
माँ की उँगली छोड़
पाँव खुद खड़ा हो रहा है
बेटा बड़ा हो रहा है|

अपने गीत ‘आग’ में गिरिजा जी ने किसी वस्तु के सदुपयोग या दुरुपयोग पर सार्थक प्रकाश डाला है|
आग तेरे पास भी है
आग मेरे पास भी है
करना क्या उपयोग आग का
बात यही है खास|

गिरिजा जी के सभी गीतों को पढ़ते हुए जीवन की पीड़ाओं से गुजरना, जीवन की नकारात्मकताओं के बीच सकारात्मक बने रहने की सार्थकता, और किसी के द्वारा छले जाने की स्वीकारोक्ति होने पर भी विश्वास न कर पाने की व्यथा अंदर तक झकझोरती है|
गिरिजा दी, आपकी लेखनी सतत चलती रहे और साहित्य जगत समृद्ध होता रहे, इन्हीं शुभेच्छाओं के साथ पाठकों से भी विनम्र निवेदन है कि वे इस संग्रह को अवश्य पढ़ें|

पुस्तक का नामः कुछ ठहर ले और मेरी ज़िन्दगी ( गीत संग्रह)
रचनाकारः गिरिजा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशकः ज्योतिपर्व प्रकाशन, ९९ ज्ञानखंड-३, इंदिरापुरम, गाजियाबाद, फोन-९८११७२११४७
प्रथम संस्करणः २०१४
मूल्यः १९९/-
समीक्षा- ऋता शेखर 'मधु'