बुधवार, 19 अगस्त 2026

नमामि मातृभूमि हे !




 नमामि मातृ भूमि हे! नमामि भारतीयता।

नमामि सैन्य शक्ति हे ! नमामि वीर वीरता।।


वसुंधरा निहाल है, हवा सुगंध दे रही।

अनाज की बहार है, नदी प्रबंध दे रही।

विभावरी खिली रही, शशांक भी रहा खिला।

स्वतंत्रता मना सकें, वही दिनांक है मिला।

नमामि मातृभूमि हे! नमामि भारतीयता।

नमामि सैन्य शक्ति हे ! नमामि वीर वीरता।।1


सुहासिनी सुभाषिणी, तुम्हें प्रणाम माँ सदा।

प्रसन्न स्वाभिमान में, करोड़ कंठ संपदा।

समस्त सृष्टि के लिए, अनेक शस्त्र धारती।

विराजमान हो सदा, भरो मिठास भारती।

नमामि मातृ भूमि हे! नमामि भारतीयता।

नमामि सैन्य शक्ति हे ! नमामि वीर वीरता।।2


प्रबुद्ध चेतना रहे, कदम कभी रुके नहीं।

विराट आसमान में, ध्वजा कभी झुके नहीं।

नवीन शब्द हो न हो, सृजन कभी न रिक्त हो।

प्रबल विचार हों सदा, शरीर प्राण सिक्त हो।

नमामि मातृ भूमि हे, नमामि भारतीयता।

नमामि सैन्य शक्ति हे, नमामि वीर वीरता।3

रविवार, 5 जुलाई 2026

सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना



विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा ।

सबके हृदय में प्रवेश करना

आखर की माला तुमने सजाई

पन्नों पर उसको लेकर उतरना

विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा


मिले ज्ञान-मोती सबको ही जग में

कदमों के नीचे हों फूल मग में

बुद्धि सरल और निश्छल हो वाणी

गुरुओं का आदर करें बन के ध्यानी 

अन्तस् में ज्योति खुशियों की धरना

विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा।


शब्दों में गरिमा की है जरूरत

यही इस जगत को संज्ञान देना

व्यवहार प्रेमिल हो सारे जगत से

मुख पर सभी के मुस्कान देना

वीणा से अपनी मधुर गान गढ़ना

विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा।

  ऋता शेखर


गुरुवार, 11 जून 2026

जिस धरती ने पाला पोसा

 🌱पर्यावरण दिवस पर🌱


जिस धरती ने पाला पोसा

उसका हम सम्मान करें

फसलों की उर्वर माटी पर

खड़ा न कोई मकान करें।


जल से है पृथ्वी पर जीवन

हरदम इसका ध्यान धरें

डिटर्जेंट डाल डाल सरि को

कभी न लहूलुहान करें।


प्राणवायु देता है पीपल

बरगद से मिलती है छाया 

मेट्रो के खम्भे ने छीना

उनसे उनकी विस्तृत काया


माटी नीर पादप पवन

हैं पूजा के शुद्ध हवन

वे जब होंगे जग में रक्षित

जीवन भी होगा संरक्षित।


ऋता शेखर


गुरुवार, 4 जून 2026

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे




सोलह चंद्र-कला को धारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।


भाद्र कृष्ण का था अँधियारा

किलकारी से गूँजा  कारा।

वासुदेव तन्द्रा से जागे

पल में वह मथुरा को त्यागे।

चपल दामिनी चमक रही थी

यमुना की धारा तेज बही थी।

शेषनाग ने ताना छाता

वही बने थे बलभ्रद भ्राता।


कौतुक करते थे वह सारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।


मात यशोदा के घर आये

वहाँ नंद के लाल कहाये।

मोरपंख से सजता कुंतल

कानों में झूला था कुंडल।

जब जब मुख पर दधि लपटाए

नटखट बन अँखियाँ मटकाए।

खूब चराते हो तुम गैया

किये सर्प पर ता ता थैया।


बाल रूप में लगते न्यारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।


जिसने तुमपर आस लगाया

तुमने उनका दर्द मिटाया।

धर्म ध्वजा तुम जब फहराते

आहत अर्जुन भी सुख पाते।

जग का पालन करने वाले

दीनों के तुम हो रखवाले।

गहरा है यह भव का सागर

आओ अब हे नटवर नागर।


तुम्हीं लगाओ हमें किनारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे


ऋता शेखर