शनिवार, 6 जून 2020

कोरोना पर कविता

गीतिका ...समसामयिक
Corona Viral Test Negative - राहत देने वाली खबर ...
मोह बढ़े जब-जब धन से तब, ईश्वर ही सिखलायेगा |
अपना घर अपना रिश्ता ही, काम हमेशा आयेगा ||१||

जन्मभूमि से अपनापन ही, गाँव सभी को ले आया |
‘कोविड के कारण लौटे थे’, इतिहास यही बतलायेगा||२||

अपनी छत अपनी होती है, चाहे होते छेद कई|
यही बात समझाने को तो, नभ में नीरद छायेगा ||३||

मजदूरों को भूख लगी तब, मालिक ने ठुकराया है | 
प्रेम भरा आँचल जननी का, आँगन यह समझायेगा ||४||

जो लौटें उनका स्वागत हो, रीत पुरानी यही रही |
नवयुग में क्या करना होगा, कोरोना कह जायेगा ||५||

सारा दिन सारी ही रातें, चल चल कर बेहाल हुआ |
क्वारंटीन बना घर में क्या, कटकर वह रह पायेगा |६||

छेड़छाड़ की अति होती जब, सृष्टि स्वयं रक्षित होती |
कभी बाढ़ भूकंप कभी ये, कोरोना कहलायेगा ||७|| 

सामाजिक दूरी का पालन, मुँह ढककर करना है|
जो चूके यह सब करने में, कोरोना फैलायेगा ||८||

@ऋता शेखर ‘मधु’


छंद विधान.....
आधार छंद- लावणी (मापनीमुक्त मात्रिक)
विधान- 30 मात्रा, 16,14 पर यति, अंत वाचिक गा
अपदान्त , समान्त – आयेगा

शुक्रवार, 5 जून 2020

रागिनी में राग की झंकार को देखो - गीतिका

दुनिया के 7 अनोखे फूल जो आपको हैरान ...
गीतिका
आधार छन्द - रजनी (मापनीयुक्त मात्रिक)
मापनी - गालगागा गालगागा गालगागा गा
2122   2122   2122 2
समान्त - आर, पदान्त - को देखो

लिख रहे जो गीतिका उस सार को देखो
लेखनी से उठ रहे उद्गार को देखो

हो रहे हैं शब्द हर्षित भाव बहने लगे
हर्ष में छुपते हुए अंगार को देखो

झूमते हैं फूल पत्ते ज्यों पवन झूमी
छंद का सौन्दर्य मात्रा भार को देखो

जब लिखे हों मापनी में गीत के मुखड़े
रागिनी में राग की झंकार को देखो

राम जी की हो कथा या हो महाभारत
सोरठे के वर्ण में संसार को देखो

@ऋता शेख ‘मधु’

वेद में ही है छुपी पहचान भारत की - गीतिका

How to tie-dye roses (With images) | Most beautiful flowers ...
विधा:-गीतिका
आधार छंद-रजनी
मापनी- २१२२ २१२२ २१२२ २
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फूल है अपनी जगह खुशबू रुहानी है |
झूमती गाती हवा लाती रवानी है |१|

मौत के डर से न जीना छोड़ना साथी
प्राण का तन से मिलन जीवन कहानी है|२|

बोलते हैं जब पपीहे प्रीत के सुर में
वह मिलन की रागिनी लगती सुहानी है|३|

जब सुनी धुन बाँसुरी की गोपियाँ दौड़ीं
प्रीत राधा- कृष्ण की सदियों पुरानी है|४|

वेद में ही है छुपी पहचान भारत की
याद रखना श्लोक को इसकी निशानी है|५|

@ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 2 जून 2020

महँगा कचरा - लघुकथा

This burger account is such a situation, the terrible reality that ...
महँगा कचरा

“दादी, सब कहते हैं कि हम मनुष्यों ने पर्यावरण का बहुत नुकसान किया है| पर मुझे तो ऐसा कुछ नहीं दिखता, आपको दिखता है क्या? ,” रेस्तरां में बैठे दस वर्षीय पीयूष ने बर्गर खाते हुए सवाल किया|

“बिल्कुल दिखता है पीयूष, मैं तो अभी ही गिना सकती हूँ कि बर्गर खाते हुए हमने कितना नुकसान कर दिया,” दादी ने थोड़ी गंभीरता से कहा|

“हमने अभी नुकसान कर दिया, ये क्या कह रहे हो दादी! यहाँ बैठ कर खा लिया इसमें नुकसान कैसा,” पलकें झपकाते हुए पीयूष ने कहा|

“देखो बेटा, बर्गर खाने से कोई नुकसान न हुआ किन्तु बर्गर गत्ता के बड़े से डब्बा में पैक होकर मिला जो सीधे प्लेट में भी आ सकता था| हमने जो चम्मच प्रयोग मे लाए वह लकड़ी की है, और सॉस प्लास्टिक कवर को काटकर निकाला हमने| डिस्पोज़ेबल ग्लास में हमने कॉफी पी| हमने खाया-पीया कम और कचरा ज्यादा इकट्ठा किया| ये कचरा हमने कहाँ से लेकर फैलाया यह बताओ? ”, दादी ने पीयूष की ओर देखते हुए कहा|

“दादी , ये डब्बे,ये ग्लास, ये चम्मच सभी पेड़ के पार्टस से बनाए गये हैं |मतलब हमने पेड़ों का नुकसान किया”, माथे पर हाथ रखकर सोचने की मुद्रा में पीयूष बैठ गया|

सबके बर्गर खत्म हो चुके थे|

“मम्मा, पापा, आपलोग टिशू पेपर रख दीजिए,”पीयूष अचानक बोल पड़ा|

“क्यों बेटा, हाथ साफ करने हैं न तो...”, पापा ने कहा|

“तो नल में हाथ धोकर रुमाल से हाथ पोछिये, टिशू का प्रयोग करके हम फिर से पेड़ों को ही नुकसान पहुँचाएँगे,”कहकर पीयूष वाश बेसिन की ओर बढ़ गया|

@ऋता शेखर ‘मधु’

शुक्रवार, 29 मई 2020

ताटंक छंद में दिनकर

ताटंक छंद में दिनकर

Rising sun and sunflowers - Fields & Nature Background Wallpapers ...

पूर्व दिशा से लाल चुनरिया, ओढ़ धरा पर आते हैं |
ज्योति-पुँज हाथों में लेकर, शनै-शनै बिखराते हैं ||
सफर हमारा चले निरंतर, घूम-घूम बतलाते हैं |
अग्नि-कलश माथे पर धरकर, हम दिनकर कहलाते हैं ||



स्वर्ण रश्मियों की आहट से, खेतों ने अँगड़ाई ली |
हाथ उठे जब सूर्य अर्ध्य को, जीभर जल तुलसी ने पी ||
उषा संगिनी साथ चली है, पंछी राग सुनाते हैं |
भ्रमर निकलते पुष्प दलों से, सूर्यमुखी खिल जाते हैं |


भोर-साँझ की बात निराली, नभ लगते नारंगी हैं |
हर्ष रागिनी और उमंगें, ये सब मेरे संगी हैं ||
श्वेत रंग की किरण हमारी, सबको यह समझाते हैं |
पहनें जब सतरंगी कुर्ता , इंद्रधनुष बन जाते हैं ||


सहती जाती ताप धरा जब, हम भी तो घबराते हैं |
बाँध पोटली में सागर तब, अम्बर को दे आते हैं ||
मेघों के पीछे से छुपकर, मोर देख हरसाते हैं|
बूँदों में भर प्रेम सुधा रस, छम छम नाच दिखाते हैं||


तम चाहे जितना काला हो, उज्ज्वलता से हारा है |
क्षणिक धुंध से निपट बढ़ेंगे, यह संकल्प हमारा है ||
साँझ ढले हम गए झील में, जग को यह दिखलाते हैं |
सच तो यह है जीवन देने, दूर देश को जाते हैं ||

@ऋता शेखर ‘मधु’
29/05/2020