रविवार, 5 जुलाई 2026

सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना



विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा ।

सबके हृदय में प्रवेश करना

आखर की माला तुमने सजाई

पन्नों पर उसको लेकर उतरना

विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा


मिले ज्ञान-मोती सबको ही जग में

कदमों के नीचे हों फूल मग में

बुद्धि सरल और निश्छल हो वाणी

गुरुओं का आदर करें बन के ध्यानी 

अन्तस् में ज्योति खुशियों की धरना

विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा।


शब्दों में गरिमा की है जरूरत

यही इस जगत को संज्ञान देना

व्यवहार प्रेमिल हो सारे जगत से

मुख पर सभी के मुस्कान देना

वीणा से अपनी मधुर गान गढ़ना

विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा।

  ऋता शेखर


गुरुवार, 11 जून 2026

जिस धरती ने पाला पोसा

 🌱पर्यावरण दिवस पर🌱


जिस धरती ने पाला पोसा

उसका हम सम्मान करें

फसलों की उर्वर माटी पर

खड़ा न कोई मकान करें।


जल से है पृथ्वी पर जीवन

हरदम इसका ध्यान धरें

डिटर्जेंट डाल डाल सरि को

कभी न लहूलुहान करें।


प्राणवायु देता है पीपल

बरगद से मिलती है छाया 

मेट्रो के खम्भे ने छीना

उनसे उनकी विस्तृत काया


माटी नीर पादप पवन

हैं पूजा के शुद्ध हवन

वे जब होंगे जग में रक्षित

जीवन भी होगा संरक्षित।


ऋता शेखर


गुरुवार, 4 जून 2026

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे




सोलह चंद्र-कला को धारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।


भाद्र कृष्ण का था अँधियारा

किलकारी से गूँजा  कारा।

वासुदेव तन्द्रा से जागे

पल में वह मथुरा को त्यागे।

चपल दामिनी चमक रही थी

यमुना की धारा तेज बही थी।

शेषनाग ने ताना छाता

वही बने थे बलभ्रद भ्राता।


कौतुक करते थे वह सारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।


मात यशोदा के घर आये

वहाँ नंद के लाल कहाये।

मोरपंख से सजता कुंतल

कानों में झूला था कुंडल।

जब जब मुख पर दधि लपटाए

नटखट बन अँखियाँ मटकाए।

खूब चराते हो तुम गैया

किये सर्प पर ता ता थैया।


बाल रूप में लगते न्यारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।


जिसने तुमपर आस लगाया

तुमने उनका दर्द मिटाया।

धर्म ध्वजा तुम जब फहराते

आहत अर्जुन भी सुख पाते।

जग का पालन करने वाले

दीनों के तुम हो रखवाले।

गहरा है यह भव का सागर

आओ अब हे नटवर नागर।


तुम्हीं लगाओ हमें किनारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे


ऋता शेखर


बुधवार, 22 अप्रैल 2026

इच्छा मृत्यु

 



उधेड़बुन

"जब से न्यायालय का निर्णय आया है

मन पर उधेड़बुन का गहरा साया है

यह उधेड़बुन निर्णय पर नहीं,

नाम पर है क्योंकि नाम है 'इच्छा मृत्यु'"


"मगर नाम पर  उधेड़बुन कैसा है? "


"मरने वाला अपनी इच्छा व्यक्त नहीं कर पाया।

उसकी इच्छा का कहीं जिक्र न आया।

अस्पताल में जीवन मिलता है

परिजनों का चेहरा खिलता है।

उसे  मृत्यु देने के लिए

जीवनदायिनी यंत्र हटाये गए

भोजन पानी घटाए गए।

वह बेबस बोल नहीं पाया

उसकी तंत्रिकाओं पर था

शिथिलता का साया।

पर उसे महसूस तो होता होगा

मन ही मन वह भी रोता होगा।"


"यह निर्णय तो परिवार का है

उनके थके हुए संसार का है।"


" इसलिए सब कुछ सहज लिया गया।

वेद मंत्रों द्वारा उसको विदा किया गया।"


" मगर बंधु

आज भी मन में एक प्रश्न समाया है।

क्या वृद्धों के लिए भी

इच्छा मृत्यु का समय आया है?"


" यह उधेड़बुन बेमानी है। 

जीवन की ये अवस्थाएँ

आनी हैं तो आनी हैं।"


" बंधु ! समझो मेरी बात

धूप छुपे तो आती रात।

वृद्ध बेबस मजबूर हुए

उनके सपोर्ट सिस्टम 

उनके बच्चे

 घर से कितनी दूर हुए।

रसोई वक्त बेवक्त जगती है

वह भी सगी न लगती है।

तन मन पर भारी असर हुआ है

लगता है जैसे कहर हुआ है।

बदले समय का निर्णय

क्या पारिवारिक विघटन है?

क्या इच्छा मृत्यु के लिए विवश

ये सामाजिक अकेलापन है ?"


प्रश्न तो समय के साथ-साथ

समाधान पा जायेंगे

मगर अभी तो हम

उधेड़बुन में ही जिये जायेंगे।


ऋता शेखर 'मधु'