मंगलवार, 24 जनवरी 2023

बेटियाँ वरदान हैं

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस













संसार के सुन्दर सृजन में, बेटियाँ वरदान हैं।

माता पिता की लाडली अब बन रही अभिमान हैं।।

बेटी पढ़े आगे बढ़े यह कह रही सरकार है।

उसकी खुशी सबसे जरूरी जो बनी आधार है||1


बगिया सुवासित देखकर के, गुनगुनाती बेटियाँ|

नभ में पतंगों को उड़ाकर, मुस्कुराती बेटियाँ||

अम्बर सितारे टिमटिमाए, जगमगाई बेटियाँ|

कलकल नदी की धार बनकर, खिलखिलाई बेटियाँ||2


जब बूँद बनकर बारिशों में, नाचता सावन कभी|

रुनझुन हुई है पायलों की, हँस दिए आँगन सभी||

शृंगार बालों का हुआ है, झूलती है चोटियाँ|

चकले थिरक जाते खुशी से, बेलती जब बेटियाँ||3


लगती कमलदल सी सुकोमल, धैर्य में है झील सी|

जगमगाती दीप बनकर, रोशनी कंदील सी||

प्राची हँसी पूरब दिशा में भोर की लाली बनी|

धरती सुहानी बेटियों सी खेत की बाली बनी||4


वह चाहते हैं बेटियों को, सरस्वती बसती जहाँ |

जो पूजते हैं बेटियों को, लक्ष्मी रहती वहाँ||

कुछ पर्व भारत में बने जो, बेटियों से हैं खिले|

होंगी नहीं जब बेटियाँ तब, राखियाँ कैसे मिले||5


कुछ शील्ड भारत को मिले हैं, बेटियों के काम पर।

वह हों बछेन्द्री पाल या फिर, कल्पना के नाम पर।।

वैमानिकी तकनीक हो या, हो पहाड़ी चोटियाँ।

बढ़ती गईं आगे हमेशा, हिन्द की ये बेटियाँ।।6


भारत बहादुर बेटियों से, पा रहा गौरव कई।

वह पाँच महिला हैं खिलाड़ी, जो भरें सौरभ कई।।

झूलन क्रिकेटी टीम में रह, जब बनी कप्तान थीं।

तब गेंदबाजी में रमी वह, देश में वरदान थीं।।7


जमुना मुक्केबाज ने तो, रच दिया इतिहास है।

चौवन किलो की वर्ग श्रेणी, वह उन्हीं से खास है।।

तसनीम सोलह वर्ष में ही, रैंक नम्बर वन बनी।

गुजरात की महिला खिलाड़ी, बैडमिंटन बन तनी।।8


जब खेल लंबी कूद अंजू, चैंपियन बनती रहीं|

अनगिन पदक वह नाम अपने, देश के करती रहीं||

आसाम में जनमी हिमा ने,रेस को करियर बनाया|

वह गोल्ड मेडल पाँच जीती, देश का गौरव बढ़ाया|९


माता पिता का साथ पाकर खिल उठी हैं बेटियाँ।

चाहे पढ़ाई नौकरी हो, चल पड़ी हैं बेटियाँ।।

जूडो कराटे भी सिखाएँ, आत्मविश्वासी बनाएँ।

अपनी सुरक्षा कर सकें वे, आत्मबल साहस बढायें।।10


सौन्दर्य का प्रतिमान बनकर वह बनी अभिकल्पना|

माधुर्य का अभिदान पाकर, सृष्टि की अनुरूपना||

जिसने सजाए भाव सारे, क्यों वही अनजान है?

दो-दो घरों से मान पाना, क्यों महाअभियान है??11


जो पूजते नौ देवियाँ पर, बेटियाँ भाती नहीं|

समझे पराया धन हमेशा, वंश की थाती नहीं||

बहुएँ सभी को चाहिए पर, बेटियाँ लाते नहीं|

जब हों मुखौटे इस तरह के, मान वे पाते नहीं||12

--- ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

फिल्म पर दोहे












लाइट ऐक्शन कैमरा, तीन शब्द है फ़िल्म।

संप्रेषण संवाद का, बहुत बड़ा है इल्म।।1


सुन्दर सज्जा नृत्य की, आकर्षक तस्वीर|

देशभक्ति या प्रेम की, सुन्दर सी तहरीर||2


तेरह सन उन्नीस में,प्रथम फिल्म थी मूक|

मिली साल इकतीस में, मौन रील को कूक||3


राजा हरिश्चंद्र रहा, मूक फ़िल्म के पास|

आलम आरा स्वर सहित, रचे फ़िल्म इतिहास||4


सोलह नौवें माह का, फ़िल्म दिवस श्रीमान|

सस्ती मिलती है टिकट, यही मान पहचान||5


फ़िल्म जगत के नाम कुछ, भारत में हैं ज्ञात।

टॉलीवुड तेलुगु-तमिल,बॉलीवुड विख्यात।।6


मिले सिनेमा में हमें, चलते फिरते दृश्य।

कुछ हैं बालक के लिए,रहते कुछ अस्पृश्य।।7


फाल्के जी के नाम पर, बने हैं पुरस्कार।

अभिनय निर्देशन बने, उत्कृष्ट फिल्मकार।।8


पार्श्व गायकी के लिए, लता रहीं उत्कृष्ट।

पुरुष वर्ग में थे रफी, रहे जो अति विशिष्ट।।9


शोमैन जो कहे गए, वह थे राज कपूर।

सुन्दर मधुबाला हुईं, दुनिया में मशहूर।।10


कवि प्रदीप ने रच दिया, देशभक्ति का सार।

मन वीणा के तार पर, मधुरिम है झंकार।।11


फिल्में मन पर डालती, अपना बहुत प्रभाव।

उनमें कुछ सन्देश हों, संग रहे कुछ चाव।।12

रविवार, 25 दिसंबर 2022

यात्रा

यात्रा-

यात्रा के हैं अनगिन रूप
कभी छाँव मिले कभी धूप
प्रथम यात्रा परलोक से
इहलोक की
नौ महीने की विकट यात्रा
बन्द कूप में सिमटी हुई यात्रा
जग से जुड़ता जब नाता
भोर से सायं तक
पृथ्वी की यात्रा
गंगोत्री से खाड़ी तक
गंगा की यात्रा
बचपन से बुढ़ापा तक
देह की यात्रा
कभी पैदल यात्रा
कभी पटरी पर चलती
रेल की यात्रा
नभ में बादलों के बीच
यान की यात्रा
सागर में
डूबती उतराती यात्रा
कभी दैनिक यात्रा
या फिर साप्ताहिक
मासिक या वार्षिक
समय की पाबंदी पर
बस यात्रा ही यात्रा
क्योंकि करनी है
मुख से पेट तक
भोजन को यात्रा
हर यात्रा में करनी होती तैयारी
बस चूक हो जाती है
अंतिम यात्रा की तैयारी में
जाने कितना कुछ
छोड़ जाते हैं ऐसा
जिसे स्वयं ठिकाने लगाना था
पर अपनी देह को ठिकाने
कोई न लगा सकता
हर आत्मनिर्भर होकर भी
बेबस है
परावलम्बन होना ही है
फिर घमंड किस बात का
इस यात्रा का टिकट तो है
बस तिथि का नहीं पता।
कैसे किस विधि जाना है
रीति का पता नहीं
– ऋता शेखर मधु

सोमवार, 5 सितंबर 2022

लघुकथा- भविष्यतकाल

 

भविष्यतकाल


'वाह ममा, आज तो आपने कमाल की पेंटिंग बनाई है,' अपनी चित्रकार माँ की प्रशंसा करते हुए तुलिका बोल पड़ी|
'अच्छा बेटा, इसमे कमाल की बात क्या लगी तुम्हें यह भी तो बताओ,' 

ममा ने बिटिया की आँखों में देखते हुए पूछा|
'देखिए ममा, ये जो प्यारी सी लड़की बनाई है न आपने, वह तो मैं ही हूँ| उसके सामने इतनी सारी सीढ़ियाँ जो हैं वे हमारे सपने हैं जो हम दोनों को मिलकर तय करने हैं, ठीक कहा न ममा' तुलिका ने मुस्कुराते हुए कहा|
'बिल्कुल ठीक कहा बेटे, अब इन सीढ़ियों की अंतिम पायदान को देख पा रही हो क्या'ममा ने पूछा|
'नहीं ममा, क्या है वहाँ?'
'वहाँ पर तुम्हारे सपनों का राजकुमार है जो तभी नजर आएगा जब तुम पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जाओगी' ममा ने हल्के अ़दाज़ में कह दिया|
' ममा, जब मैं घोड़े पर चली जाऊँगी तब भी तुम ये सीढ़ियाँ मत हटाना,' एकाएक थोड़े उदास स्वर में तुलिका कह उठी|
'ऐसा क्यों कह रही बेटा,' ममा भी थोड़ी मायूस हो गई|
' यदि मैं खुद गिर गई, या उस राजकुमार ने धक्का देकर गिरा दिया तो मैं इन्हीं सीढ़ियों से वापस लौट सकूँगी, इन्हें हटाओगी तो नहीं न ममा', तुलिका सुबक उठी|
'नहीं बेटा, नहीं हटाऊँगी,' ममा ने तुलिका को गले लगाते हुए कहा|
ऋता शेखर 'मधु'