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रविवार, 20 अक्टूबर 2013

191. पंछी गीत सुनाएँ...(माहिया)


1
कोयलिया जब बोली
हिय में हूक उठी
उर  ने परतें खोलीं।
2
उसकी शीतल बानी
पीर चुरा भागी
सूखा दृग से पानी।
3
पंछी गीत सुनाएँ
चार पहर दिन के
साज़ बजाते जाएँ ।
4
टिमटिम चमके तारे
रात सुहानी है
किलके बच्चे सारे ।
5
प्राची की अठखेली
नभ में रंग भरे
कूँची ये  अलबेली।
6
सूरज पाँव पसारे
जाग गई धरती
खग बोले भिनसारे।
7
जीवन सफ़र सुहाना
गम या खुशियाँ हों
गाता जाय तराना।
8
जागो  रे सब जागो
नव निर्माण करो
आलस को अब त्यागो।

शनिवार, 16 जून 2012

आखर-मोती बिखरें - माहिया




आखर-मोती बिखरें
मधुरिम भाव सजे
मन अम्बर-सा निखरे|१|

है जग की रीत यही
मीठी वाणी से
दिल में है प्रीत बही|२|

कुछ खर्च नहीं होता
मीठा बोल सदा
स्नेहिल रिश्ते बोता|३|

ओ बादल मतवाले
प्यासी है धरती
आ, उसको अपना ले|४|

किरणें रवि की आईं
खिलखिल करता दिन
कलियाँ भी मुसकाईं|५|

दो हाथ जुड़े रहते
बल और विनय का
हैं भाव सदा कहते|६|

अंक बराबर पाते
कर्म-गणित में तो
ना होते हैं नाते|७|

तितली उड़ती जाती
फूल भरी चुनरी
धरती की लहराती|८|

चाह रखो चलने की
हारेगी बाधा
राह मिले खिलने की|९|

ऋता शेखर मधु