मेरी माँ एक सक्रिय ,सहृदय और कर्मठ शिक्षिका थीं| अपने स्नेहशील स्वभाव के कारण वह छात्राओं के बीच बहुत लोकप्रिय थीं|संयुक्त परिवार में रहकर घर और बाहर में सामंजस्य बैठाते हुए जिस सक्रियता और सहनशीलता का परिचय वे देती रहीं वह बहुत प्रसंशनीय था| अब उनके वृद्धाजनित अशक्त हो रहे शरीर को देखकर हमें बहुत तकलीफ़ होती है|उनकी स्थिति मेरे दिल की आवाज़ बनकर कलमबद्ध हो गई|
दिल की आवाज़
अशक्त शरीर
कमज़ोर नजर
जीवन से हारी
वृद्धा माँ हमारी|
जीवन-संघर्ष से थकी
इस जहाँ को त्याग
उस जहाँ में
जाने को बेताब
वृद्धा माँ हमारी|
कभी व्यक्त करती उद्गार
मैं अब हो गई बेकार
आत्मा को मुक्त करना है
चोला मुझे बदलना है,
हो गई है निर्विकार
वृद्धा माँ हमारी|
हम उनकी सन्तान
सब समझ कर भी
बन जाते अनजान
दिल से निकलती रुआँसी आवाज़
माँ सा प्यारा कोई नहीं
वृद्ध हो तो क्या हुआ
तुम अभी भी नही हो बेकार
अनुभवों का हो खज़ाना
जीवन के इस मोड़ पर भी
तुम्हें हमें है सजाना|
जीवन रथ
मंजिल पर आकर
ठहर चुकाहै|
सिर्फ़ प्रस्थान शेष है|
जाना न माँ
इतनी जल्दी भी क्या है|
ऋता शेखर ‘मधु’