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सोमवार, 7 नवंबर 2011

३.दशरथनन्दन का नामकरण एवं श्रीराम की बालछवि-ऋता की कविता में

आज मैं श्रीरामकथा की तीसरी कविता लेकर प्रस्तुत हूँ|
आपकी छोटी से छोटी प्रतिक्रिया भी मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है|
दशरथनन्दन का नामकरण

पाकर चार पुत्ररत्न अवधराज थे बेहद हर्षित
रूप, शील और गुण से चारों ही थे शोभित|

जिन्हें बुलाया रघुकुलमणि ने, नाम था उनका गुरु वशिष्ठ
हाथ जोड़ किए अभिवादन, आग्रह किए एक अति शिष्ट|

इन शिशुओं  में  जैसा जिनका है आचरण
कीजिए उनके अनुसार ही उनका नामकरण|

जगद्‌गुरू ने बहुत सोचा किया हृदय में विचार
वेद प्राण शिव प्राण हैं दशरथ के ये पुत्र चार|

आनन्द के हैं सागर जो, अनुग्रह करना है काम
सुखों के समूह हैं, देते समस्त लोक को विश्राम
नाम उनका विख्यात होगा, कहलाएँगे वे श्रीराम|

भरण-पोषण कार्य है जिनका
नाम भरत ही होगा उनका|

स्मरणमात्र से ही जिनके, होता शत्रु हनन
वेद बताते  एसे  शिशु  का  नाम शत्रुघ्न|

सुलक्षणों से शोभित जो, बसे राम के मन
जगत के आधार हैं, नाम  होगा  लक्ष्मण|


श्रीराम की बालछवि
सर्वव्यापी  सुखसागर  कृपासिन्धु भगवान
गोद में खेल रहे, है मुख पर मृदु मुस्कान|

निहार के रामलला की छवि अति प्यारी
ममतामयी कौशल्या हो जातीं वारी वारी|

कोटि कामदेव की शोभा से भी भारी
श्रीराम की सुंदरता थी न्यारी मनोहारी|

नीलकमल सा मनभावन नीलमेघ सा वर्ण
श्याम शरीर पर भाए लाल कमल से चरण|

लाल चरण पर नखों की  ऐसी  थी  ज्योति
कमल पँखुड़ी पर बिखरे हो जैसे सफ़ेद मोती|

चरणतल पर शोभायमान वज्र ध्वजा अंकुश की रेखा
नाभि की गहराई वही समझे, जिसने  इसे  है देखा|

कमर में है करधनी तीन रेखाएँ उभरी हैं उदर पर
मुनियों का मन मोहित है ध्वनि नुपुर की सुनकर|

ग्रीवा चिबुक लगती भली जैसे सुन्दर शंख
शोभा फैल रही ऐसे जैसे कामदेव असंख्य|

होंठ लाल-लाल, मुख से झाँके मोती से दो दंत
नासिका ऊपर तिलक ऐसे सोहे जैसे कोई संत|

कर्ण कपोल अति सुन्दर, नेत्र नील वृहद गोल
वक्र  भौं, लटकती  अलक, तोतली  है  बोल|

हुलस-हुलस  माता  सँवारे  काले  घुँघराले  बाल
पीत वस्त्र में घुटनों पर भागें, भली लगे वह चाल|

रघुनाथ की शोभा मनोहर, रूप  है वर्णनातीत
स्वप्न में भी दिख जाए, हो बाल रूप से प्रीत|
ऋता शेखर 'मधु'