मेरी आज की कविता बारहवीं क्लास में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए है जिनके सामने साल बदलते ही परीक्षा ओर प्रतियोगिता-परीक्षाओं की लम्बी कतार लगने वाली है|
निराशा की घटा हटा के रखो
धैर्य का दामन पकड़ के रखो,
सब्र की मुट्ठी जकड़ के रखो,
उम्मीदों के चिराग जला के रखो,
खुशियों के दीप जगमग करेंगे|
निराशा की घटा हटा के रखो,
प्यार की ज्योत जला के रखो,
इच्छा की रंगोली सजा के रखो,
आनंद के सागर छलक उठेंगे|
क्रोध की अग्नि बुझा के रखो,
वैर के बीज सुखा के रखो,
बातों के तीर छुपा के रखो,
हर्ष के पौधे लहक उठेंगे|
प्रेम की धारा बहा के रखो,
विश्वास की नींव जमा के रखो,
आशा की किरण जगा के रखो,
जीत के झंडे लहर उठेंगे|
श्रम के मोती चमका के रखो,
लगन की लौ बचा के रखो,
प्रयास की सीढ़ी लगा के रखो,
शौर्य के सूरज दमक उठेंगे||
ऋता शेखर ‘मधु’