चित्र गूगल से साभार |
ओ बटोही रोज सवेरे
तुम मेरे घर आना
खोल अपनी लाल पोटली
जग में रश्मि बिखराना
नव मुकुलित पुष्पों से छनकर
स्वर्ण प्रभा बिखराते
पाकर उजास जग जग जाता
पंछी गीत सुनाते
जलते चुल्हे धुआँ उड़ाते
पंछी शोर मचाते
उषाकाल से सँझा तक तुम
अथक निरंतर जाना
करने को विश्राम पथिक
सिंधु में जा समाना
प्रभात से रजनी बेला तक
नव उमंग मिल जाती
साँझ ढले जब घर जाते हो
चंद्रप्रभा मुसकाती
निशा साँवरी हुई सलोनी
तारों से खिल जाती
दिनकर से पाकर आलोक
चाँद बना मस्ताना
अच्छा लगता है सूरज का
दानवीर कहलाना
मकर संक्रा़तिकाल कथा में
गंगा सागर मिलते
सूर्यदेव उत्तरायण होकर
धरती का तम हरते
सेहत वाली किरणें लेकर
पादप सुन्दर खिलते
आदित्यराज से लें हम सीख
जगमग जग कर जाना
जेठ दोपहरी में हँसकर
अमलतास सा छाना
*ऋता शेखर 'मधु'*