2122 2122 2122 212
जो मिला वरदान में वह जन्म मालामाल कर|
मान रख ले तू समय का जिन्दगी संभाल कर ||१
ध्यान हो निज काम पर ही यह नियम रख ले सदा |
बात यह अच्छी नहीं तू बेवजह हड़ताल कर ||२
कर कहीं उपहास तो मनु जाँच ले अपना हृदय |
सामने उस ईश के तू क्यों खड़ा भ्रम पाल कर ||३
त्याग के ही भाव में संतोष का धन है छुपा |
सार गीता का समझकर मन मदन-गोपाल कर ||४
बाँध लेता प्राण को जब मोह का संसार यह |
शुद्ध पावन सद्-विचारी उच्च अपना भाल कर ||५
इस जगत में मान ले तू प्रेम है सबसे बड़ा |
हो न ममता साथ तो कब कौन होगा ढाल पर||६
काट कर वन, घर बसाया खग बिना घर के हुए |
पा गया तू क्या मनुज जब हैं न पंछी डाल पर ||७
@ ऋता शेखर ‘मधु’
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बुधवार, 24 अगस्त 2022
गुरुवार, 15 मार्च 2018
करना अगर है कुछ तुझे तो इन्क़िलाब कर
करना अगर है कुछ तुझे तो इन्क़िलाब कर
छोड़े जो छाप, उम्र को ऐसी किताब कर
कीमत बहुत है वक़्त की जेहन में तू बिठा
बेकार बात में न समय को ख़राब कर
ये ज़िंदगी तेरी है तेरी ही रहे सदा
शिद्दत से तू निग़ाह को अपनी रुआब कर
शब भर रहेगा चाँद सितारे भी जाएँगे
लम्हे बिताए जो यहाँ उनका हिसाब कर
मुस्कान से सजा रहे मुखड़ा तेरा सदा
कुछ देर के लिए तू ग़मों से हिजाब कर
-ऋता शेखर 'मधु'
छोड़े जो छाप, उम्र को ऐसी किताब कर
कीमत बहुत है वक़्त की जेहन में तू बिठा
बेकार बात में न समय को ख़राब कर
ये ज़िंदगी तेरी है तेरी ही रहे सदा
शिद्दत से तू निग़ाह को अपनी रुआब कर
शब भर रहेगा चाँद सितारे भी जाएँगे
लम्हे बिताए जो यहाँ उनका हिसाब कर
मुस्कान से सजा रहे मुखड़ा तेरा सदा
कुछ देर के लिए तू ग़मों से हिजाब कर
-ऋता शेखर 'मधु'
बुधवार, 13 दिसंबर 2017
करामात होती नहीं ज़िन्दगी में
निग़ाहों की बातें छुपाने से पहले
नज़र को झुकाए थे आने से पहले
नदी के किनारे जो नौका लगी थी
बहुत डगमगाई बिठाने से पहले
जो आज़ाद रहने के आदी हुए थे
बहुत फड़फड़ाए निभाने से पहले
करामात होती नहीं ज़िन्दगी में
पकड़ना समय बीत जाने से पहले
बहन की दुआ आँक पाते न भाई
कलाई पे राखी सजाने से पहले
दफ़ा हो न जाए सुकूँ ज़िन्दगी का
ऋता सोचना आजमाने से पहले
ऋता शेखर 'मधु'
122*4
गुरुवार, 30 नवंबर 2017
जिंदगी में हर किसी को है किसी का इन्तिज़ार
इन्तिज़ार
सर्वशक्तिमान को है बंदगी का इन्तिज़ार
जिंदगी में हर किसी को है किसी का इन्तिज़ार
लाद कर किताब पीठ पर थके हैं नौनिहाल
'वो प्रथम आए', विकल है अंजनी का इन्तिज़ार
पढ़ लिए हैं लिख लिए हैं ज्ञान भी वे पा लिए हैं
अब उन्हें है व्यग्रता से नौकरी का इन्तिज़ार
बूँद स्वाति की मिले, समुद्र को लगी ये आस
तलछटी के सीप को है मंजरी का इन्तिज़ार
ब़ाग़वाँ को त्याग कर विदेश को जो चल दिये हैं
निर्दयी वो भूल जाते भारती का इन्तिज़ार
--ऋता शेखर 'मधु'
सर्वशक्तिमान को है बंदगी का इन्तिज़ार
जिंदगी में हर किसी को है किसी का इन्तिज़ार
लाद कर किताब पीठ पर थके हैं नौनिहाल
'वो प्रथम आए', विकल है अंजनी का इन्तिज़ार
पढ़ लिए हैं लिख लिए हैं ज्ञान भी वे पा लिए हैं
अब उन्हें है व्यग्रता से नौकरी का इन्तिज़ार
बूँद स्वाति की मिले, समुद्र को लगी ये आस
तलछटी के सीप को है मंजरी का इन्तिज़ार
ब़ाग़वाँ को त्याग कर विदेश को जो चल दिये हैं
निर्दयी वो भूल जाते भारती का इन्तिज़ार
--ऋता शेखर 'मधु'
बुधवार, 22 नवंबर 2017
रास्तों को ग़र्द से पहचान लेती मुफ़लिसी
ग़ज़ल
बेबसी की ज़िन्दगी से ज्ञान लेती मुफ़लिसी
मुश्किलों से जीतने की ठान लेती मुफ़लिसी
आसमाँ के धुंध में अनजान सारे पथ हुए
रास्तों को ग़र्द से पहचान लेती मुफ़लिसी
बारिशों में भीगते वो सर्दियों में काँपते
माहताबी उल्फ़तों का दान लेती मुफ़लिसी
भूख की ज्वाला बढ़ी तब पेट पकड़े सो गए
घ्राण से ही रोटियों का पान लेती मुफ़लिसी
धूप को सिर पर लिए जो ईंट गारा ढो रहे
वो ख़ुदा के हैं क़रीबी मान लेती मुफ़लिसी
ठोकरों से भी बिखर कर धूल जो बनते नहीं
पर्वतों से स्वाभिमानी शान लेती मुफ़लिसी
यह ख़ला है ख़ूबसूरत बरक़तें होती जहाँ
गुलशनों में शोख़ सी मुस्कान लेती मुफ़लिसी
-ऋता शेखर ‘मधु’
बेबसी की ज़िन्दगी से ज्ञान लेती मुफ़लिसी
मुश्किलों से जीतने की ठान लेती मुफ़लिसी
आसमाँ के धुंध में अनजान सारे पथ हुए
रास्तों को ग़र्द से पहचान लेती मुफ़लिसी
बारिशों में भीगते वो सर्दियों में काँपते
माहताबी उल्फ़तों का दान लेती मुफ़लिसी
भूख की ज्वाला बढ़ी तब पेट पकड़े सो गए
घ्राण से ही रोटियों का पान लेती मुफ़लिसी
धूप को सिर पर लिए जो ईंट गारा ढो रहे
वो ख़ुदा के हैं क़रीबी मान लेती मुफ़लिसी
ठोकरों से भी बिखर कर धूल जो बनते नहीं
पर्वतों से स्वाभिमानी शान लेती मुफ़लिसी
यह ख़ला है ख़ूबसूरत बरक़तें होती जहाँ
गुलशनों में शोख़ सी मुस्कान लेती मुफ़लिसी
-ऋता शेखर ‘मधु’
बुधवार, 15 नवंबर 2017
मन में जले जो दीप अक़ीदत का दोस्तो
नभ अब्र से भरा हो निहाँ चाँदनी रहे
तब जुगनुओं से ही यहाँ शबगर्दगी रहे
मन में जले जो दीप अक़ीदत का दोस्तो
उनके घरों में फिर न कभी तीरगी रहे
कटते रहे शजर और बनते रहे मकाँ
हर ही तरफ धुआँ है कहाँ आदमी रहे
आकाश में बची हुई बूँदें धनक बनीं
हमदर्द जो हों लफ़्ज़ तो यह ज़िन्दगी रहे
हर उलझनों के बाद भी ये ज़िन्दगी चली
बचपन के जैसा मन में सदा ताज़गी रहे
*गिरह
भायी नहीं हमें तो कभी चापलूसियाँ
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे(ज़नाब निदा फ़ाज़ली)
-ऋता शेखर ‘मधु’
अब्र-बादल
निहाँ- छुपी रही
शबगर्दगी-रात की पहरेदारी
शुक्रवार, 10 नवंबर 2017
बचपन के जैसा फिर यहाँ मंजर नहीं देखा
बचपन के जैसा फिर यहाँ मंजर नहीं देखा
गोदी हो जैसे माँ की, वो बिस्तर नहीं देखा
हिन्दू या मुसलमान में आदम यहाँ उलझे
हों सिर्फ़ जो इंसान वो लश्कर नहीं देखा
धरती पे लकीरें हैं दिलों में हैं दरारें
काटे जो समंदर वही नश्तर नहीं देखा
बिखरे जो कभी गुल तो, रहे साथ में ख़ुशबू
जो तोड़ दे जज़्बात वो पत्थर नहीं देखा
शीरीं हो ज़ुबाँ और मुहब्बत की अदब हो
संसार में उसको किसी का डर नहीं देखा
-ऋता शेखर ‘मधु’
गोदी हो जैसे माँ की, वो बिस्तर नहीं देखा
हिन्दू या मुसलमान में आदम यहाँ उलझे
हों सिर्फ़ जो इंसान वो लश्कर नहीं देखा
धरती पे लकीरें हैं दिलों में हैं दरारें
काटे जो समंदर वही नश्तर नहीं देखा
बिखरे जो कभी गुल तो, रहे साथ में ख़ुशबू
जो तोड़ दे जज़्बात वो पत्थर नहीं देखा
शीरीं हो ज़ुबाँ और मुहब्बत की अदब हो
संसार में उसको किसी का डर नहीं देखा
-ऋता शेखर ‘मधु’
बुधवार, 11 अक्टूबर 2017
आसमाँ पर चाँद ढाला कौन है
आसमाँ पर चाँद ढाला कौन है
राह में दीपक जलाता कौन है
जा छुपी है बादलों में चाँदनी
इस कदर उसको डराता कौन है
इस कदर उसको डराता कौन है
उस किनारे एक साया है खड़ा
पूछने को हाल जाता कौन है
पूछने को हाल जाता कौन है
बतकही में आज माहिर हैं सभी
अब जहाँ में चुप से रहता कौन है
अब जहाँ में चुप से रहता कौन है
झूठ में लिपटे हुए किरदार सब
आइना सच का दिखाता कौन है
आइना सच का दिखाता कौन है
है पड़ी अपनी सभी को आज ‘मधु’
अब यहाँ रिश्ते निभाता कौन है
अब यहाँ रिश्ते निभाता कौन है
-ऋता शेखर ‘मधु’
2122 2122 212
काफिया-आ
रदीफ़-कौन है
2122 2122 212
काफिया-आ
रदीफ़-कौन है
रविवार, 20 अगस्त 2017
हर घर में पल रहा है इक साथी नवाब का--ग़ज़ल
आज एक ग़ज़ल
मजमून ही न पढ़ पाए दिल की किताब का
क्या फ़ायदा मिला उसे फिर आफ़ताब का
हर पल बसी निगाह में सूरत जो आपकी
फिर रायगाँ है रखना रुख पर हिजाब का
इस ख़ल्क की खूबसूरती होती रही बयाँ
हर बाग में दिखे है नजारा गुलाब का
हाथों में थाम कर के वो रखते रिमोट को
हर घर में पल रहा है इक साथी नवाब का
हल्की हुई गुलाब की लाली जो धूप से
देखा न जाए हमसे उतरना शबाब का
लिखती रही है मधु सदा जोश-ए-जुनून से
मिलता नहीं पता उसे कोई ख़िताब का
--ऋता शेखर 'मधु'
मजमून ही न पढ़ पाए दिल की किताब का
क्या फ़ायदा मिला उसे फिर आफ़ताब का
हर पल बसी निगाह में सूरत जो आपकी
फिर रायगाँ है रखना रुख पर हिजाब का
इस ख़ल्क की खूबसूरती होती रही बयाँ
हर बाग में दिखे है नजारा गुलाब का
हाथों में थाम कर के वो रखते रिमोट को
हर घर में पल रहा है इक साथी नवाब का
हल्की हुई गुलाब की लाली जो धूप से
देखा न जाए हमसे उतरना शबाब का
लिखती रही है मधु सदा जोश-ए-जुनून से
मिलता नहीं पता उसे कोई ख़िताब का
--ऋता शेखर 'मधु'
221 2121 1221 212
सोमवार, 13 फ़रवरी 2017
रुख़ की बातें तो बस हवा जाने

चित्र गूगल से साभार
2122 1212 22
क्वाफ़ी-आ/ रदीफ-जाने
रुख़ की बातें तो बस हवा जाने
हर दुआ को वही खुदा जाने
जो लगी ना बुझी जमाने में
इश्क की दास्ताँ वफ़ा जाने
ख़ाक में मिल रहे जनाज़े जो
क्यों नहीं दे रहे पता जाने
नेक जो भी रहे इरादों में
बाद में खुद की ही ख़ता जाने
अक्स मिलते रहेंगे किरचों में
टूट के राज आइना जाने
वक्त का करवटी इशारा था
आज तिनकों में आसरा जाने
जो रखे है गुरूर चालों में
है मुसाफ़िर वो गुमशुदा जाने
हौसले में जुनून है जिसके
गुलशनी राह खुशनुमा जाने
ख्वाब में भी वही नजर आए
दिल को क्या हो गया खुदा जाने
--ऋता शेखर ‘मधु’
बुधवार, 8 फ़रवरी 2017
हँसते हुए पलों को रखो तुम सँभाल कर
लफ्जों में प्रीत पालकर उनको निहाल कर
दुखती हुई रगों से कभी ना सवाल कर
मिलती रही हैं मुश्किलें जीवन की राह में
हँसते हुए पलों को रखो तुम सँभाल कर
माना तेरी हर बात पर मुझको रहा यकीं
अब जिंदगी से पूछकर तू ना बवाल कर
कहती रही हैं कुछ तो ये अमराइयाँ हमें
उनको गज़ल में ढालकर तू भी कमाल कर
जो वक्त आज बीत गया अब वो अतीत है
क्या फायदा मिलेगा उसे ही उछाल कर
-ऋता शेखर 'मधु'
दुखती हुई रगों से कभी ना सवाल कर
मिलती रही हैं मुश्किलें जीवन की राह में
हँसते हुए पलों को रखो तुम सँभाल कर
माना तेरी हर बात पर मुझको रहा यकीं
अब जिंदगी से पूछकर तू ना बवाल कर
कहती रही हैं कुछ तो ये अमराइयाँ हमें
उनको गज़ल में ढालकर तू भी कमाल कर
जो वक्त आज बीत गया अब वो अतीत है
क्या फायदा मिलेगा उसे ही उछाल कर
-ऋता शेखर 'मधु'
बुधवार, 25 जनवरी 2017
मुसीबत राह में आई मिले हमदर्द भी हरदम
ग़ज़ल
जरा भर लो निगाहों में कि उल्फ़त और बढ़ती है
हया आए जो मुखड़े पर तो रंगत और बढ़ती है
निगहबानी खुदा की हो तो जीवन ये महक जाए
मुहब्बत हो बहारों से इबादत और बढ़ती है
मुसीबत राह में आई मिले हमदर्द भी हरदम
खिलाफ़त आँधियाँ करतीं तो हिम्मत और बढ़ती है
जमाने में शराफ़त की शिकायत भी लगी होने
ज़लालत की इसी हरकत से नफ़रत और बढ़ती है
फ़िजा महफ़ूज़ होगी तब कटे ना जब शज़र कोई
हवा में ताज़गी रहती तो सेहत और बढ़ती है
--ऋता शेखर 'मधु'
जरा भर लो निगाहों में कि उल्फ़त और बढ़ती है
हया आए जो मुखड़े पर तो रंगत और बढ़ती है
निगहबानी खुदा की हो तो जीवन ये महक जाए
मुहब्बत हो बहारों से इबादत और बढ़ती है
मुसीबत राह में आई मिले हमदर्द भी हरदम
खिलाफ़त आँधियाँ करतीं तो हिम्मत और बढ़ती है
जमाने में शराफ़त की शिकायत भी लगी होने
ज़लालत की इसी हरकत से नफ़रत और बढ़ती है
फ़िजा महफ़ूज़ होगी तब कटे ना जब शज़र कोई
हवा में ताज़गी रहती तो सेहत और बढ़ती है
--ऋता शेखर 'मधु'
1222 1222 1222 1222
रविवार, 22 जनवरी 2017
सरजमीं पर वक्त की तू इम्तिहाँ की बात कर
चाँद वाली रौशनी में आसमाँ की बात कर
ऐ मुहब्बत अब सितारों के जहाँ की बात कर
मुफलिसी में भी रहे आबाद रिश्तों का जहाँ
हो मुरव्वत हर किसी से उस मकाँ की बात कर
जो तस्सव्वुर में दिखे वो सच सदा होते नहीं
सरजमीं पर वक्त की तू इम्तिहाँ की बात कर
ओ मुसाफिर आज तू जाता कहाँ यह बोल दे
हो सके रहकर यहीं पर आशियाँ की बात कर
अजनबी से रास्ते अनजान सी वो मंजिलें
वस्ल की हो रात जब तो ना ख़िजाँ की बात कर
रेत पर आती लहर वापस गुजर कर जा रही
है दिलेरी गर बशर में तो निशाँ की बात कर
--ऋता शेखर ‘मधु’
2122 2122 2122 212
बुधवार, 14 दिसंबर 2016
जमाना हर किसी को तोलता है
शराफ़त से सभी को जोड़ता है
किसी खुदग़र्ज से वो भी अड़ा है
न कोई बच सका है आइने से
जमाना हर किसी को तोलता है
नदी को बाँध लेते हैं किनारे
यही तहज़ीब की परिकल्पना है
बिखरती पत्तियाँ भी पतझरों में
दुखों के सिलसिले में क्या नया है
नजरअंदाज ना करना कभी भी
बड़ों में अनुभवों का मशवरा है
दिलों में है नहीं बाकी मुहब्बत
*कोई आहट न कोई बोलता है*
--ऋता शेखर 'मधु'
1222/ 1222/ 122
काफ़िया- आ
रदीफ़-है
काफ़िया- आ
रदीफ़-है
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016
हम उन्हें आफ़ताब कहते हैं-ग़ज़ल
हम तो दिल की किताब कहते हैं
आप जिसको गुलाब कहते हैं
जो उलझते रहे अँधेरों से
हम उन्हें आफ़ताब कहते हैं
धर्म के नाम पर मिटेंगे हम
उस गली के जनाब कहते हैं
हुक्म की फ़ेहरिस्त लम्बी है
शौहरों को नवाब कहते हैं
तोड़ दो नफरतों की दीवारें
उल्फतों का हिसाब कहते हैं
मुस्कुराके नजर मिलाते हैं
क्या इसी को नकाब कहते हैं
--ऋता शेखर ‘मधु’
बुधवार, 30 मार्च 2016
आता है याद हमको गुजरा हुआ जमाना
221 2122 221 2122
गजल....
हर राह पर गुलों की कालीन तुम बिछाना
आए हजार बाधा धीरज से लाँघ जाना
ये आसमाँ सजाता सूरज औ' चाँद तारे
तुम रौशनी में इनकी अपने कदम बढ़ाना
जब जिंदगी में दुख सुख का सिलसिला मिले तो
इतनी विशालता हो, थक कर न बैठ जाना
रहतीं झुकी निगाहें माँ बाप के अदब में
आता है याद हमको गुजरा हुआ जमाना
झुकती हुई कमर में लाचारगी बहुत है
तुम प्रेम से सदा ही उनको गले लगाना
नाजुक बड़े ये रिश्तों के हैं महीन धागे
रखना बड़ी नफ़ासत जब भी इन्हें निभाना
*ऋता शखर 'मधु'*
गुरुवार, 24 मार्च 2016
रंग
वो...जो अनदेखा है ...अनाम है...पर सबके साथ है...
2122 2122 2122 212
आज अपने साथ लाया ढेर सारे रंग वो
द्वेष को है छोड़ आया होलिका के संग वो
हर तरफ सद्भाव से निखरी पड़ी है ये फिजा
फाग की इन मस्तियों में साधता मिरदंग वो
मौसमी बदलाव का कोई असर है ना कहीं
ठंडई में है घोंटता किलकारियों का भंग वो
हरित पीले बैंगनी की धार मतवाली हुई
मुख पुते हैं लाल से जो लग रहा बजरंग वो
शोर गलियों में सुनें तो भागते डरपोक हैं
सामने आया खुशी से बन रहा शिवगंग वो
सरहदों पर जो मिटे अपने घरों के दीप थे
दस्तकें होली में देकर लौटता बेरंग वो
शब्द जो कागजों पर श्वेत श्यामल है 'ऋता'
मन उमंगित कर चला तो बन रहा बहिरंग वो
*ऋता शेखर 'मधु'*
सोमवार, 21 दिसंबर 2015
तुम हँसो तो साथ में हँसता जमाना
2122 2122 2122
देश को हर हाल में
बस है बचाना
हो सके तो जान भी
अपनी गँवाना
तुम हँसो तो साथ में
हँसता जमाना
अश्क आँखों में सदा
सबसे छुपाना
क्या खरी ही तुम सदा
कहते रहे हो
मिर्च तुमको इसलिए
कहता जमाना
वे चुरा लेते हमेशा
भाव मेरे
है नहीं आसान अब
इसको पचाना
चाँद में भी दाग है
कहते रहे हो
बोल कर यह चाहते
किसको बचाना
फावड़े यूँ ही नहीं
थामे हैं हमने
जानता हूँ राह अपनी
खुद बनाना
बेटियाँ फ़नकार हैं
मानो इसे भी
पंख से उनको हमें ही है सजाना
*ऋता
शेखर ‘मधु’*
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015
रोग दिल का न यूँ तुम बढ़ाओ कभी
चल के सपने कहीं तो सजाओ कभी
आसमाँ में परिंदे उड़ाओ कभी
आज है ये जमाना कहाँ से कहाँ
पाँव छूने की रस्में निभाओ कभी
बेटियों के जनम से होते हो दुखी
उनको भी तो गले से लगाओ कभी
अश्क आँखों में रखते दिखाते नहीं
रोग दिल का न यूँ तुम बढ़ाओ कभी
जान हाजिर है अपने वतन के लिए
सरहदों पर इसे आजमाओ कभी
*ऋता शेखर मधु*
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015
बंदगी जब की खुदा की हौसले मिलते गए
मतला--
दो दिनों की जिंदगी है आदमी के सामने
जान है क्या चीज बोलो दोस्ती के सामने
हुस्ने मतला--
आँधियाँ भी जा रुकी हैं हिमगिरी के सामने
चाल भी बेजार बनती सादगी के सामने
अशआर--
बेटियाँ हों ना अगर तो बहु मिलेगी फिर कहाँ
कौन सी दौलत बड़ी है इस परी के सामने
बंदगी जब की खुदा की हौसले मिलते गए
झुक न पाया सिर मिरा फिर तो किसी के सामने
नारियाँ सहमी दबी सी ठोकरों में जी रहीं
हर खुशी बेकार है उनकी नमी के सामने
हो अमीरी या गरीबी रख रही इक सी नजर
रौशनी की बात क्या है कौमुदी के सामने
फूल भी खिलते रहे हैं कंटकों के बीच में
खुश्बुएँ बिखरी रही हैं हर किसी के सामने
*ऋता शेखर 'मधु'*
दो दिनों की जिंदगी है आदमी के सामने
जान है क्या चीज बोलो दोस्ती के सामने
हुस्ने मतला--
आँधियाँ भी जा रुकी हैं हिमगिरी के सामने
चाल भी बेजार बनती सादगी के सामने
अशआर--
बेटियाँ हों ना अगर तो बहु मिलेगी फिर कहाँ
कौन सी दौलत बड़ी है इस परी के सामने
बंदगी जब की खुदा की हौसले मिलते गए
झुक न पाया सिर मिरा फिर तो किसी के सामने
नारियाँ सहमी दबी सी ठोकरों में जी रहीं
हर खुशी बेकार है उनकी नमी के सामने
हो अमीरी या गरीबी रख रही इक सी नजर
रौशनी की बात क्या है कौमुदी के सामने
फूल भी खिलते रहे हैं कंटकों के बीच में
खुश्बुएँ बिखरी रही हैं हर किसी के सामने
*ऋता शेखर 'मधु'*
बह्र -- 2122 2122 2122 212
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
काफिया -- ई (स्वर)
रदीफ़ -- के सामने
रदीफ़ -- के सामने
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