अपनी ही धुन में वह चला जा रहा था
शम्मा बन के बस वह जला जा रहा था
छोटी सी दुनिया सितारों की बसे बस
ख्वाब इतना सा मन में पला जा रहा था
शीतल बन के वह तो बरफ़ सा रहा था
पा कर के तपिश वह गला जा रहा था
चंदा को इतना सा गुमाँ भी नहीं था
सूरज द्वारा वह तो छला जा रहा था
चंदा भला इतना मायूस क्यों है
आसमाँ को यह भी खला जा रहा था
चलते चलते जब वह निढाल हो गया
क्षितिज की आगोश में वह ढला जा रहा था
ऋता शेखर ‘मधु’