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बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

२.श्रीराम जन्मोत्सव- ऋता की कविता में


श्रीरामकथा की पहली कविता श्रीराम जन्म पर उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं|
श्रीरामकथा की दूसरी कविता लेकर प्रस्तुत हूँ|
आपकी छोटी सी प्रतिक्रिया भी मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है|
श्रीराम जन्मोत्सव


विप्र गौ देव सन्त, और वचन  के कारण|
श्री विष्णु आए, करके मानव शरीर धारण||
 
कौशल्या माता को दिए थे दर्शन, लेने से पहले अवतार|
श्याम शरीर नेत्र थे सुन्दर,आयुध सहित भुजाएँ थीं चार||

साकार रूप कौशल्या देखें, जैसे चकित चकोर|
पुत्र-रूप में प्रभु को पाया, हो गईं भाव-विभोर||

प्रभु  पुनः  शिशु  बने, गूँजा  कर्णप्रिय  रूदन|
रानियाँ दौड़ पड़ीं,अयोध्या हुआ आनन्द मे मग्न||

हर्षित दशरथ उठ नहीं पाते, आए  ब्रह्मानंद|
पुत्र रूप में प्रभु को पाए,हुआ परम आनन्द||

दिया आदेश दासों को, खूब बजाओ बाजा|
हमारे कुलदीपक आए,लहरा दो ढेरों ध्वजा||

गुरू वशिष्ठ ने करवाया, श्राद्ध नान्दीमुख जात कर्म|
ढेरों दक्षिणा विप्रों को दे, दशरथ ने  निभाया धर्म||

आकाश झूम-झूम करने लगा, पुष्पों की वृष्टि|
श्रीराम के स्वागत को, नाच  उठी सारी सृष्टि||

तोरण वन्दनवार से, सज गया अयोध्या नगर|
सजी नारियाँ जाने लगीं, राजमहल  के  डगर||

स्वर्ण कलश भर, मंगल थाल सजा, गा उठीं शुभमंगलम्|
मागध  सूत  बन्दी  गवैये, गाने लगे गीत सुस्वागतम्||

सिंच गया नगर,  कस्तूरी चन्दन और कुंकुम से|
मह-मह महक उठी हवा, मिट्टी महकी खुशबू से||

कैकेयी सुमित्रा भी माता बनीं, पाई  सुन्दर  पुत्र-रत्न|
वर्णन हो न सकी शोभा,शब्दों ने किया बहुत ही यत्न||

अगर की धूप है अन्धकार, अबीर गुलाल है लालिमा|
मन्दिर की मणियाँ तारागण, महल कलश है चन्द्रमा||

कोमलवाणी की वेदध्वनि,लगे पक्षियों की चहचह रसीली|
भास्कर सोचने लगे, पकृति क्यों लगने लगी नई नवेली||

देख नगर का सौन्दर्य, रुक गया सूर्य का रथ|
अपलक दृष्टि जमी रही, भूले आगे  का  पथ||

एक मास बीत गए, दिन गया ठहर
मर्म   जान   सका   न   कोई
क्यों   न   आया   रात्रि  पहर||

देख जन्मोत्सव की शोभा, सूर्य राम गुण गाने लगे|
देव शेष महेश मुनि, सारे भाग्य अपने सराहने लगे||
अयोध्यापति ने दिए भाँति-भाँति के दान
आशीष  मिला  सारे  ही  शिशुओं  को
वे   बनें,    दीर्घायु   और   महान||
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ऋता शेखर मधु