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शनिवार, 11 जनवरी 2025

पाँच लघुकथाएँ - ऋता शेखर

1. असर कहाँ तक

"मीना अब बड़ी हो गई है। उच्च शिक्षा लेने के बाद नौकरी भी करने लगी है। कोई ढंग का लड़का मिल जाये तो उसके हाथ पीले कर दें !" चाय पीते हुए सरला ने पति से कहा।

     "हाँ, बेटी के पिता को दिल पर पत्थर तो रखना ही होता है। बेटी को खूब पढ़ाया-लिखाया और वह अब नौकरी भी करने लगी है। फिर भी, उसे विदा तो करना ही है।"

     "किसे विदा करना है पापा?" मीना जाने कब कमरे में आ गई थी।

     "तुम्हें विदा करना है, और किसे। उसी पर बातें हो रही है।" माँ  ने बेटी से कहा।

     "पर मुझे तो यहीं रहना है। मैं अपना घर-द्वार, सखी-सहेलियों को छोड़कर दूसरे घर क्यों जाऊँगी माँ। मेरी नौकरी है तो आर्थिक रूप से आपको किसी पर बोझ नहीं बनने दूँगी।"

      "यही समाज का नियम है। विवाह तो करना ही होता हैं।" माँ ने उसे समझाते हुए कहा।

      "मैं यह नियम मानने से इनकार करती हूँ। विवाह कर मैं किसी को मानसिक प्रताड़ना नहीं दे सकती। कोई भी विरोध अपने घर से आरम्भ होना चाहिए।" मीना के स्वर में दृढ़ता झलक रही थी।

      "कैसी प्रताड़ना देने की बात कर रही हो मीना?"

      "वही, जो आज तक आप पापा को देती आई हो।"

      "मैंने क्या किया है?" बेटी के इस आरोप से सरला घबरा गई।

      "आप हमेशा पापा पर अहसान जताती रही हो, कि विवाह कर, अपने सबों को छोड़कर आप यहाँ आईं। पापा उस समय खुद को अपराधी समझने लगते हैं। आपको भी तो पता था कि यह समाज का नियम है। घरवालों को नहीं छोड़ना था तो अपने ही घर रहना चाहिए था। माना कि पहले के समय आर्थिक मजबूरी रहती थी। लड़की विरोध नहीं कर सकती थी। अब तो ऐसी बात नहीं है।"

      "ये तू क्या बोले जा रही है मीना?"

      "सही तो कह रही हूँ माँ, विवाह एक सामाजिक बंधन है। विवाह के बाद घर छोड़ने के त्याग को बार-बार कहकर किसी को अपराध बोध से ग्रसित रखना भला क्यों? मुझे कोई जबरदस्ती तो अपने घर नहीं ले जा सकता। विरोध मेरा ही है कि मुझे कहीं नहीं जाना।"

      मामूली नोक-झौंक का बेटी पर इतना गहरा असर देख सरला स्तब्ध रह गई। पिता ने पुत्री को निहारा और पीठ पर स्नेह का हाथ रख दिया।


2. सुपर मॉम

"भैया, मम्मी को पहले भी जब थकान लगी थी, तो उस वक्त आपने दिखाया क्यों नहीं?"

     "मम्मी तो सुपर मॉम हैं। सब कुछ सम्भाल लेती हैं। कभी उन्हें थकते नहीं देखा। काम करते हुए थोड़ी बहुत थकान तो हो ही जाती है, इसमें कौन-सी बड़ी बात है। लेकिन तुझे कैसे पता कि मॉम को थकान लग रही थी।" भैया ने सफाई देते हुए कहा।

     "मैं परसों भी आई थी। अपने लिए कभी कुछ न कहने वाली मॉम ने हताश स्वर में कहा था--"बहुत थकान लग रही है। चलते हुए लगता है कि अभी गिर पड़ूँगी।" 

      "मैंने कहा था कि डॉक्टर के यहाँ चलते हैं। उन्होंने कहा--"नहीं, डॉक्टर की जरूरत नहीं, वैसे ही ठीक हो जाउँगी। पहले भी कई दफा ऐसा हुआ है, फिर अपने आप ठीक भी हो गई थी।"

      बहन ने एक कागज़ थमाते हुए भाई से कहा--"मैंने उसी दिन उनका ब्लड टेस्ट करवाया था। भैया, ये आपकी सुपर मॉम की ब्लड रिपोर्ट आई है।"

      "ओह ! विटामिन 'डी' और हीमोग्लोबिन, दोनों इतना कम।" रिपोर्ट भैया के हाथों में फड़फड़ा रही थी।

       "तुम दोनों बेकार ही परेशान हो रहे हो। मैं तुम दोनों के लिए कुछ बनाकर लाती हूँ।" माँ ने बात टालने के लिए कहा।

       "आप सुपर मॉम हो। मेटल मॉम नहीं।" कहते हुए भैया ने माँ को कुर्सी पर बैठा दिया और खुद रसोई में चले गए।

       "माँ, यह आपकी भी भूल थी कि खुद को न थकने वाली मशीन समझा। अब दवाएँ समय पर लेते रहें और स्वयं को स्वस्थ रखें। पढ़े लिखे होने का यह फायदा दिखना चाहिए।" बेटी और बेटा एक साथ चिर्रा पड़े। 

       बच्चों की झिड़की सुन, माँ को अपनी माँ की याद हो आई। शरीर में हड्डियों का घनत्व कम होने के कारण ऑस्टियोपोरोसिस का शिकार होकर वह दस वर्षों तक बिस्तर से उठ ही नहीं पाई थी। काश उस समय यही बात मैंने भी, अपनी माँ को कही होती?


3. छाया दान

एक-एक कर सारे गमले ठेले पर चढ़ाए जा रहे थे। आदित्य बाबू हर गमले की पत्तियों पर हाथ फिराते, फिर जाने देते। बड़े नावनुमा गमले में बरगद का बोनसाई था। जिसमें तीस वर्षों से उनकी पत्नी वट सावित्री पूजा करती आई थी। एक बार पानी की टँकी बेकार हो गयी तो उसमें मिट्टी भरकर आम का वृक्ष लगाया गया था, ताकि सत्यनारायण की पूजा में आम के पल्लव मिल सकें। वैसे ही दान के लिए आँवले का पेड़ और शिव पूजन के लिए बेल का पेड़ भी लगा हुआ था। तीन तल्ला घर में ऊपरी छत पर पूरा एक बगीचा सुशोभित था।

      अब गुलाब के गमले ठेले पर जाने लगे। सफेद, लाल, गुलाबी, काले, पीले गुलाब; सबका अपना-अपना महत्व और सबकी अपनी-अपनी सुंदरता थी।

      इसी तरह बोगनविलिया, जिनिया, लिली, चमेली, बेली, कनेर, अपराजिता, अड़हुल, मीठा नीम के पौधे भी घर से निकलने लगे। हर पौधे के साथ आदित्य बाबू की आँखों मे नमी बढ़ती ही जा रही थी।

       तभी, पड़ोसी अरुण बाबू ने उनका हाथ थाम लिया और बोले--"पूरा बगीचा किधर भेज रहे भाई। क्यों हटा रहे हो यह सब?"

      आदित्य बाबू बोले--"रिटायरमेंट के बाद, यह शहर छोड़कर जा रहा हूँ भाई। अब बच्चे जिस शहर में रहेंगे, वहीं हम भी रहेंगे। पेड-पौधों को सूखने के लिए नहीं छोड़ सकता।" आवाज में दर्द साफ झलक रहा था।

      "तो इन्हें पड़ोसियों में बाँट देते भाई।"

      "बात तो सही है अरुण बाबू, लेकिन किसी पर अवांछित बोझ नहीं डाल सकता। इसे नर्सरी वालों के हवाले कर रहा हूँ। वही इसकी कीमत समझेंगे। कोई वहाँ से पैसे देकर खरीदेगा तो वह भी कीमत जानेगा।"

      "कितने पैसे दे रहा है नर्सरी वाला?"

      "दान में दी जा रही वस्तु की कीमत नहीं ली जाती।"

       तभी, पास खड़ी अरुण बाबू की माँ बोल पड़ीं--"यह छाया दान है बेटा, पर्यावरण रक्षा के लिए इस दान का बहुत पुण्य मिलेगा तुम्हें ! इन्हें हम अपने घर ले जाते हैं। इनके सहारे तुम्हारा स्नेह भी हमें याद आता रहेगा।"

       आदित्य बाबू ने झुककर माता जी के पाँव छू लिए।


4.परछाई

जीवन के उतार-चढ़ाव समझने की कोशिश में वह थोड़ा परेशान रहने लगा था। एक दिन, प्रोफ़ेसर ने उससे कहा--"वह सूरज उगने के साथ ही उठे और सूरज की ओर मुँह करके बैठ जाए। उसके बाद उसकी जो परछाई बनेगी, वह दिन के पहर बीतने के साथ-साथ कैसे-कैसे बदलती है, उसे लिखता जाए और मुझे दिखाया करे।"

      आज उसने यही करने का फैसला किया। सूरज उगा, वह भी उठा और एक खुली जगह पर आसन जमा लिया। सुबह, दोपहर, शाम और रात की परछाई का सर्वेक्षण था। निर्देशानुसार मुँह हमेशा पूरब की ओर ही रखना था। रात को वह प्रोफेसर के घर पहुँचा। प्रोफेसर ने उसे सर्वेक्षण पढ़ने को कहा। उसने पढ़ना शुरू किया--"सुबह में, लम्बी सी परछाई मेरे पीछे थी। दोपहर को वह मेरे आस-पास सिमट आई थी। शाम को परछाई फिर से लम्बी हुई। लेकिन शाम के समय वह मेरे आगे की तरफ थी। रात में तो बिल्कुल ही गायब हो गई थी। हाँ, एक बार दिन में परछाई धूमिल भी हुई थी। यह तब हुआ, जब आसमान में बादल आये थे।"

      प्रोफेसर ने उससे कहा--"तो समझ लो कि सूर्य जीवन है और परछाई है, यह जमाना। मनुष्य जब जन्म लेता है तो अपनी ऊर्जा, अपनी सफलता से पूरे जमाने को अपने पीछे चला सकता है। सफलता की ऊँचाई पर सारा जमाना उसके इर्द-गिर्द सिमटा रहता है। जीवन की संध्या में उसे जमाने के पीछे चलना होता है, और फिर मिट जाना होता है। मनुष्य मात्र एक बिम्ब है, जो सफलता की परछाइयाँ बनाता हुआ, एक दिन मिट जाता है। बादलों के कारण परछाई धूमिल हो सकती है, पर कुछ देर के लिए ही।"

      उसने अपनी उम्र देखी। और परछाइयों को अपने इर्द-गिर्द समेटने के लिए निकल पड़ा।


5. बेटी बड़ी हो गई

"आज हमारी बिटिया अट्ठारह साल की हो गई। अब तुम अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकोगी। मैं मतदाता सूची में तुम्हारा नाम दर्ज करवा देता हूँ।" पुत्री के अट्ठारहवें जन्मदिवस पर पिता ने बिटिया को बधाई देते हुए कहा।

     "लेकिन पापा, मैं तो चार वर्ष पहले ही बड़ी हो गई थी।"

     "अच्छा ! ये आपको किसने बताया?"

      "चार वर्ष पहले ही दादी ने कहा था कि अब मै बड़ी हो गई हूँ, और मुझे लड़कों से दूर रहना है।"

      मातृ-विहीन बिटिया को उसके पिता शारीरिक रूप से बड़े हो जाने और बौद्धिक रूप से उम्र का फर्क, चाहकर भी समझा नहीं सके थे।

*****

ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 5 सितंबर 2022

लघुकथा- भविष्यतकाल

 

भविष्यतकाल


'वाह ममा, आज तो आपने कमाल की पेंटिंग बनाई है,' अपनी चित्रकार माँ की प्रशंसा करते हुए तुलिका बोल पड़ी|
'अच्छा बेटा, इसमे कमाल की बात क्या लगी तुम्हें यह भी तो बताओ,' 

ममा ने बिटिया की आँखों में देखते हुए पूछा|
'देखिए ममा, ये जो प्यारी सी लड़की बनाई है न आपने, वह तो मैं ही हूँ| उसके सामने इतनी सारी सीढ़ियाँ जो हैं वे हमारे सपने हैं जो हम दोनों को मिलकर तय करने हैं, ठीक कहा न ममा' तुलिका ने मुस्कुराते हुए कहा|
'बिल्कुल ठीक कहा बेटे, अब इन सीढ़ियों की अंतिम पायदान को देख पा रही हो क्या'ममा ने पूछा|
'नहीं ममा, क्या है वहाँ?'
'वहाँ पर तुम्हारे सपनों का राजकुमार है जो तभी नजर आएगा जब तुम पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जाओगी' ममा ने हल्के अ़दाज़ में कह दिया|
' ममा, जब मैं घोड़े पर चली जाऊँगी तब भी तुम ये सीढ़ियाँ मत हटाना,' एकाएक थोड़े उदास स्वर में तुलिका कह उठी|
'ऐसा क्यों कह रही बेटा,' ममा भी थोड़ी मायूस हो गई|
' यदि मैं खुद गिर गई, या उस राजकुमार ने धक्का देकर गिरा दिया तो मैं इन्हीं सीढ़ियों से वापस लौट सकूँगी, इन्हें हटाओगी तो नहीं न ममा', तुलिका सुबक उठी|
'नहीं बेटा, नहीं हटाऊँगी,' ममा ने तुलिका को गले लगाते हुए कहा|
ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 14 मार्च 2021

लंच बॉक्स- लघुकथा

 लघुकथा- 

लंच बॉक्स

दसवीं कक्षा की क्लास लेते हुए अचानक सुधा मैम ने पूछा," बच्चों, यह बताओ कि आज सुबह का नाश्ता किये बगैर कौन कौन आया है।"

एक छात्रा ने हाथ उठाया।

" क्या घर में कुछ बन नहीं पाया था"

"बना था, पर उसे छोटी बहन के लंच बॉक्स में मम्मी ने देकर भेजा।"

"ऐसा क्यों, तुम्हें क्यों न मिला।"

"वह अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ती है न।मम्मी उसे अच्छा लंच देती है और उसके ड्रेस भी कड़क होते है।"

सुधा मैम ने ध्यान दिया कि उसने स्कूल शूज़ न पहन कर चप्पल पहन रखी था।

"सुनो, मम्मी को कहना कि वह तुम्हें भी साफ कपड़े दे और टिफिन भी"

"पर वह हमेशा कहती हैं कि सरकारी स्कूल में सब चलता है।"

सुधा मैम ने स्कूल के समापन सभा के समय कड़ाई से कहा," कल से सभी को पूरे स्कूल ड्रेस में आना है और सभी के साथ लंच बॉक्स और पानी की बोतल होनी चाहिए।"

सभा विसर्जित होने के बाद सुधा मैम की कुलीग ने पूछा, " यह अचानक इतनी कड़ाई क्यों"

" इसी कड़ाई की कमी है, तभी तो सरकारी उपेक्षित है। इसके लिए सरकार क्या करेगी जब मानसिकता ही सरकारी बनी रहेगी।"

सुधा मैम की चाल में बदलाव लाने की दृढ़ता झलक रही थी।

ऋता शेखर मधु

शनिवार, 7 नवंबर 2020

चार लघुकथाएँ


१.
कब तक
"अरे आभा, इतनी बुझी बुझी क्यों है? अभी सिर्फ महीना भर शादी को हुए हैं। लाइफ एन्जॉय करना चाहिए, पर तेरे चेहरे पर तो।"
"माला, लड़कियां लाइफ एन्जॉय कब और कैसे करें...शादी के पहले माँ ने सास का नाम ले लेकर डराया। ये करो, वो नहीं करो, नहीं तो सास के उलाहने पड़ेंगे।अब बात बेबात सास, माँ का नाम लेती रहती हैं।इन दो माओं के बीच लड़की का अस्तित्व कहाँ है।"
"आभा, तुम्हारी बात तो शत प्रतिशत सही है। आओ, हमलोग प्रण करें कि अपनी बेटियों को सही शिक्षा अच्छे नागरिक बनने के लिए देंगे, न कि किसी के नाम से भय दिखाकर..."
ऋता शेखर 'मधु'
२.
सागर की आत्महत्या
नलिनी ने सुबह की चाय के साथ अखबार भी ले लिया था।अखबार में एक कहानी छपी थी। कहानी का शीर्षक आकर्षक था " एक सागर की आत्महत्या"।
" एक सागर था। अपने आप में मस्त, मीठे जल, शांत लहरों वाला। सागर की विशालता देखते हुए उसमें जाने कितने जीव जंतुओं ने आश्रय लेना शुरू कर दिया। उदारमना सागर सभी का आश्रयदाता बन गया। उतने जीव जंतुओं ने सागर के जलको उद्वेलित करना शुरू कर दिया। एक दिन सागर ने देखा कि एक नन्ही सी सीप उसकी तली में बैठी है। उसने वहाँ पर अपनी लहरों को शांत करके सुरक्षा दी । उसमें एक चमकीले मोती का सृजन हो रहा था। एक दिन सागर शांत भाव से किनारे की चहलकदमी कर रहा था कि सामने से एक नदी आती दिखी। शायद बहुत दूर से आ रही रही। थकी थकी सी। सागर ने अपनी बाहें फैला दीं और नदी उसमें समाहित हो गयी। धीरे धीरे सागर ने महसूस किया कि सृष्टि के इतने सारे जीवों और नदियों को समेट लेने से उसकी जिम्मेदारियाँ बढ़ गयी थीं। उसका जल खारा हो गया था। उसकी लहरों का वेग बढ़ गया था। अब वह शांत नहीं था बल्कि बहुत कुछ कहने को किनारे पर भागता । फिर बिना कहे लौट जाता क्योंकि सब उसके खारेपन को लेकर मजाक बनाते थे। कोई नहीं समझ पाता था कि जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए मीठा रहना मुश्किल था।सबके लिए उसने अपनी आत्मा को मार लिया था। सागर की इस आत्महत्या को समझने वाला ही कौन था।"
नीचे लेखक का नाम पढ़ते ही नलिनी की आँखें फैल गईं। साहिल कब से लिखने लगा। नलिनी के दिल में कसक सी उठी। "ओह! मैंने और बच्चों ने साहिल को खडूस कहकर बहुत मजाक बनाया है। अशक्त माता पिता और दो छोटे भाई बहनों की जिम्मेदारियाँ निभाने में कभी कभी मैं भी स्वार्थी बनकर कठोर हो जाती हूँ। तो क्या साहिल मुझसे मन की बात कहना चाहता है किंतु मैने कभी सुननी ही नहीं चाही। कितना दर्द छुपा है उसके मन में।"
दो दिन पहले आफिस के काम से शहर से बाहर गए पति को फोन लगाने के लिए उसने मोबाइल उठा लिया।

*जंगल की नदी*
'दादी, मुझे उस बड़े जंगल में जाना है," छोटा मेमना अपनी दादी की गोद में ठुनक रहा था|
" नहीं, वहाँ नहीं जाना| वहाँ बड़ी सी नदी है जिसमें मेमने बह जाते हैं| वह भी तो बह गया था"
"कौन बह गया था दादी, बताओ न"
"तुम्हारा चाचा,वह भी जब नन्हा सा मेमना था पूरे जंगल में अपनी धाक जमाना चाहता था| इसके लिए वह अपना छोटा जंगल छोड़कर बड़े जंगल में चला गया| वहाँ उसे उसके काम की बहुत वाहवाही मिली| तभी उसकी दोस्ती एक लोमड़ी से हो गई| लोमड़ी ने धीरे धीरे मेमने को अपने अधिकार में लेने लगी| मेमना इसे समझ नहीं पाया| अचानक एक दिन उसने देखा कि उसके चारो ओर शेर , चीते, भेड़िए खड़े हैं | वह घबड़ा गया और भागने की तरकीब सोचने लगा| तभी उसने देखा कि लोमड़ी दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी| वह सारी बात समझ गया किंतु तब तक भागने के सारे रास्ते बंद हो चुके थे|
एक दिन छोटे जंगल में सभी स्तब्ध हो गये थे जब उन्हें खबर मिली कि मेमना नदी में डूब गया," कहते हुए दादी ने लम्बी साँस ली|
"मैं तैरना सीखकर जाऊँगा न, फिर नहीं बहूँगा" मेमना अपनी जिद पर अड़ा था|
"वह भी कुशल तैराक था,"कहकर दादी ने आँखें पोंछ लीं|

४. कुछ अच्छा भी
=========
नीरज को दोस्ती करना अच्छा लगता था। सिर्फ दोस्ती ही नहीं करता , यदा कदा घर में दोस्तों को बुलाकर पार्टियाँ भी दिया करता।उसकी पत्नी जूही सहर्ष पार्टियों का इंतेज़ाम करती। नीरज का दस वर्षीय बेटा रोहन भी अपने पिता के मित्रों के बच्चों का दोस्त बन गया था।
दोस्तों से घिरा रहने वाले नीरज को कोरोना के कारण घर में कैद रहना जल्द ही अखरने लगा। जब अनलॉक शुरू हुआ तो उसने अपने मित्रों को फिर से बुलाया। सबने कोई न कोई बहाना बनाकर आने से इनकार कर दिया। घर में इसी पर चर्चा छिड़ी हुई थी।
"जूही, मेरा कोई मित्र घर नहीं आना चाहता।"
" तो हम उनके घर चलेंगे पापा। आप उनको बता दो कि आज शाम हम आएँगे।" रोहन बीच में बोल पड़ा।
"ठीक है," कहकर नीरज ने अपने एक मित्र को फोन लगाया।
उस मित्र ने कहा कि वह शाम को व्यस्त है। उसके बाद दो अन्य मित्रों ने भी व्यस्तता का बहाना बना दिया।
"बहुत ही खराब समय चल रहा। किसी को दोष देना फ़िज़ूल है," जूही ने संजीदगी से कहा।
"पापा, आप रजनी बुआ को फोन करो। वे मना नहीं करेंगी।"
नीरज को याद आया कि जाने कितने महीनों, नहीं करीब दो वर्षों से उनकी आपस में बात नहीं हुई थी। रजनी पहले हमेशा फोन करती थी किन्तु नीरज के अन्य कॉल पर व्यस्त होने की सूचना मिलते ही रख देती। इस कॉल की सूचना नीरज को भी मिल जाती थी पर उसने कभी कॉल बैक करना जरूरी नहीं समझा। धीरे धीरे रजनी ने फोन करना बंद कर दिया। कभी कभी जूही फोन से हालचाल ले लिया करती थी|
आज अचानक फोन करने में नीरज को थोड़ी झिझक हुई फिर भी उसने कॉल लगाया। रजनी ने तुरंत फोन उठाया और खुश होकर बातें करने लगी।
" रजनी, रोहन तुम्हें मिस कर रहा। क्या तुम यहाँ आ सकती हो या हमलोग ही तुम्हारे यहाँ आ जायें?"
"अरे वाह! आ जाओ भइया। बड़ा मजा आएगा।इसी बहाने तुमलोगों की सैर भी हो जाएगी।"
नीरज ने फोन रख दिया।
"इस संक्रमण ने दोस्त को दोस्तों से दूर कर दिया , पर रिश्ते नजदीक आ गए," जूही ने मुस्कुराकर कहा और रोहन को लेकर तैयार होने चल दी।
@ऋता शेखर' मधु'

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

कुछ अच्छा भी-लघुकथा

कुछ अच्छा भी
=========
नीरज को दोस्ती करना अच्छा लगता था। सिर्फ दोस्ती ही नहीं करता , यदा कदा घर में दोस्तों को बुलाकर पार्टियाँ भी दिया करता।उसकी पत्नी जूही सहर्ष पार्टियों का इंतेज़ाम करती। नीरज का दस वर्षीय बेटा रोहन भी अपने पिता के मित्रों के बच्चों का दोस्त बन गया था।
दोस्तों से घिरा रहने वाले नीरज को कोरोना के कारण घर में कैद रहना जल्द ही अखरने लगा। जब अनलॉक शुरू हुआ तो उसने अपने मित्रों को फिर से बुलाया। सबने कोई न कोई बहाना बनाकर आने से इनकार कर दिया। घर में इसी पर चर्चा छिड़ी हुई थी।
"जूही, मेरा कोई मित्र घर नहीं आना चाहता।"
" तो हम उनके घर चलेंगे पापा। आप उनको बता दो कि आज शाम हम आएँगे।" रोहन बीच में बोल पड़ा।
"ठीक है," कहकर नीरज ने अपने एक मित्र को फोन लगाया।
उस मित्र ने कहा कि वह शाम को व्यस्त है। उसके बाद दो अन्य मित्रों ने भी व्यस्तता का बहाना बना दिया।
"बहुत ही खराब समय चल रहा। किसी को दोष देना फ़िज़ूल है," जूही ने संजीदगी से कहा।
"पापा, आप रजनी बुआ को फोन करो। वे मना नहीं करेंगी।"
नीरज को याद आया कि जाने कितने महीनों, नहीं करीब दो वर्षों से उनकी आपस में बात नहीं हुई थी। रजनी पहले हमेशा फोन करती थी किन्तु नीरज के अन्य कॉल पर व्यस्त होने की सूचना मिलते ही रख देती। इस कॉल की सूचना नीरज को भी मिल जाती थी पर उसने कभी कॉल बैक करना जरूरी नहीं समझा। धीरे धीरे रजनी ने फोन करना बंद कर दिया। कभी कभी जूही फोन से हालचाल ले लिया करती थी|
आज अचानक फोन करने में नीरज को थोड़ी झिझक हुई फिर भी उसने कॉल लगाया। रजनी ने तुरंत फोन उठाया और खुश होकर बातें करने लगी।
" रजनी, रोहन तुम्हें मिस कर रहा। क्या तुम यहाँ आ सकती हो या हमलोग ही तुम्हारे यहाँ आ जायें?"
"अरे वाह! आ जाओ भइया। बड़ा मजा आएगा।इसी बहाने तुमलोगों की सैर भी हो जाएगी।"
नीरज ने फोन रख दिया।
"इस संक्रमण ने दोस्त को दोस्तों से दूर कर दिया , पर रिश्ते नजदीक आ गए," जूही ने मुस्कुराकर कहा और रोहन को लेकर तैयार होने चल दी।
@ऋता शेखर' मधु'

मंगलवार, 2 जून 2020

महँगा कचरा - लघुकथा

This burger account is such a situation, the terrible reality that ...
महँगा कचरा

“दादी, सब कहते हैं कि हम मनुष्यों ने पर्यावरण का बहुत नुकसान किया है| पर मुझे तो ऐसा कुछ नहीं दिखता, आपको दिखता है क्या? ,” रेस्तरां में बैठे दस वर्षीय पीयूष ने बर्गर खाते हुए सवाल किया|

“बिल्कुल दिखता है पीयूष, मैं तो अभी ही गिना सकती हूँ कि बर्गर खाते हुए हमने कितना नुकसान कर दिया,” दादी ने थोड़ी गंभीरता से कहा|

“हमने अभी नुकसान कर दिया, ये क्या कह रहे हो दादी! यहाँ बैठ कर खा लिया इसमें नुकसान कैसा,” पलकें झपकाते हुए पीयूष ने कहा|

“देखो बेटा, बर्गर खाने से कोई नुकसान न हुआ किन्तु बर्गर गत्ता के बड़े से डब्बा में पैक होकर मिला जो सीधे प्लेट में भी आ सकता था| हमने जो चम्मच प्रयोग मे लाए वह लकड़ी की है, और सॉस प्लास्टिक कवर को काटकर निकाला हमने| डिस्पोज़ेबल ग्लास में हमने कॉफी पी| हमने खाया-पीया कम और कचरा ज्यादा इकट्ठा किया| ये कचरा हमने कहाँ से लेकर फैलाया यह बताओ? ”, दादी ने पीयूष की ओर देखते हुए कहा|

“दादी , ये डब्बे,ये ग्लास, ये चम्मच सभी पेड़ के पार्टस से बनाए गये हैं |मतलब हमने पेड़ों का नुकसान किया”, माथे पर हाथ रखकर सोचने की मुद्रा में पीयूष बैठ गया|

सबके बर्गर खत्म हो चुके थे|

“मम्मा, पापा, आपलोग टिशू पेपर रख दीजिए,”पीयूष अचानक बोल पड़ा|

“क्यों बेटा, हाथ साफ करने हैं न तो...”, पापा ने कहा|

“तो नल में हाथ धोकर रुमाल से हाथ पोछिये, टिशू का प्रयोग करके हम फिर से पेड़ों को ही नुकसान पहुँचाएँगे,”कहकर पीयूष वाश बेसिन की ओर बढ़ गया|

@ऋता शेखर ‘मधु’

सोमवार, 25 मई 2020

भीड़ का निर्माता-लघुकथा

birds in the sky | Tumblr
भीड़-निर्माता

“रोहित! इधर आओ, ये देखो, आसमान में अचानक इतने सारे पक्षी उड़ने लगे| सब कितने परेशान दिख रहे न| लगता है किसी ने इनका ठिकाना ही उजाड़ दिया हो| और ये आवाज कैसी आ रही, सुनो तो,” पत्नी प्रिया ने रोहित को बालकनी में बुलाकर कहा|

“अरे , ये तो पेड़ पर पेड़ काटते जा रहे| वो देखो, सामने उस जंगल के बहुत सारे पेड़ काट दिये| बिजली से चलने वाली कुल्हाड़ी की आवाजं है यह”, चौदहवें तल्ले से ध्यान से जंगल को देखते और आवाजों को सुनते हुए रोहित ने कहा|

“ओह! अब ये कहाँ जाएँगे बेचारे| इतने पंछियों को बेघर करने का श्राप लगेगा उन्हें| रोहित कुछ करो न! किसी को तो फोन करो जो आकर रोके उन्हें,” बेचैन सी प्रिया इधर- उधर टहलने लगी|

“हाँ, अभी फोन करता हूँ,” कहकर रोहित कमरे में चला गया|

तभी कूकर ने सीटी मारी और प्रिया किचेन में गैस बन्द करने जा रही थी कि कमरे से आती रोहित की आवाज सुनकर रुक गई और सुनने लगी|

“रघुवीर, उस लिस्ट को रद्द कर दो जिसमें मिल के पाँच सौ मजदूरों को नौकरी से हटाने की बात कही गई है| ये लौकडाउन कभी न कभी तो खत्म होगा ही, हम उन्हें बिना काम के भी तनख्वाह देते रहेंगे |’

प्रिया गहरी साँस लेती किचेन की ओर चल दी| उसकी बेचैनी थम चुकी थी|

@ऋता शेखर ‘मधु’

२५/०५/२०२०

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

तटस्थ-लघुकथा

शीर्षक : तटस्थ
रमा को अपना तटस्थ व्यवहार बहुत पसंद था। बड़ी से बड़ी बहस में भी वह अपना कोई मत प्रकट न करती और चुप्पी साध लेती। इसलिए वह सबकी प्रिय बनी रहती।

आज फिर से एक नई बहस छिड़ी थी। कॉलेज में कमिटी के प्रेसिडेंट का चुनाव होना था। इस चुनाव में दोनों प्रतिद्वंदी , रूही और सुरभि उसकी सहेलियाँ ही थीं। इसी बात को लेकर कॉमन रूम में बातें हो रही थीं। जाहिर है कोई रूही की ओर से बोल रही थीं और कुछ सुरभि के पक्ष में थीं।

थोड़ी देर बाद सबको यह कहा गया कि जो रूही के पक्ष में हैं वे अपने हाथ उठाएँ। कुछ ने हाथ उठाये जिनकी गिनती कर ली गयी। उसके बाद सुरभि के लिए हाथ उठाने को कहा गया।

यह संयोग ही था कि दोनों के लिए बराबर हाथ उठाये गए। वोट देने वाली छात्राओं की कुल संख्या विषम थी तो यह स्पष्ट हो गया था कि कोई तो ऐसा है जिसने अपने हाथ नहीं उठाए थे।

अचानक आवाज आई," रमा ने अपने हाथ नहीं उठाए ।"

सबकी निगाह रमा की ओर मुड़ गयी। उसने वास्तव में अपना मत नहीं दिया था। अपना मन्तव्य कभी स्पष्ट न करने वाली रमा दुविधा में पड़ गयी।

उसने कहा," मैं इन सब चीजों से दूर रहना चाहती हूँ।"

"किन्तु तुम्हारे मत पर ही किसी एक को जीत हासिल होगी। आज यह प्रक्रिया पूरी न हुई तो फिर से सारा आयोजन करना होगा।"

उसने सोचा कि जिसके लिए भी वह हाथ उठाएगी तो दूसरी सहेली नाराज हो जाएगी। वह यह भूल गयी थी वहाँ सब सहेलियाँ ही थीं। मत देना एक अलग बात थी, वहाँ योग्यता का चुनाव होना था। उससे कोई खुश या नाराज नहीं होता है।

उसने हाथ जोड़ दिया," मैं इस आयोजन से खुद को अलग करती हूँ।"

अब रूही, सुरभि और सारी सहेलियों की आँखों में नाराजगी उतर आई थी।
@ ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

उसे क्यों नहीं- लघुकथा

शीर्षक: उसे क्यों नहीं
     एक ही महानगर में दोनों भाई-बहन अलग अलग घरों में रहते हुए अपनी अपनी नौकरियों में व्यस्त थे। भाई के पास माँ कुछ दिनों के लिए आई थी। वीकेंड में माँ ने बेटी के यहाँ जाने का मन बनाया था। सरप्राइज़ देने के ख्याल से वह बेटे के साथ सुबह सुबह पहुँचीं। घर की एक चाबी भाई के पास भी रहती थी। बिना डोर बेल बजाए वे दरवाजा खोलकर अन्दर घुसे। अन्दर आते ही सिगरेट की तेज गन्ध नाक में प्रवेश कर गयी।
यहाँ कौन सिगरेट पीता होगा, यह सोचती हुई वह और अंदर गयीं तो देखते ही उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी। बालकनी में खड़ी बिटिया धकाधक सिगरेट के धुएँ के छल्ले उड़ा रही थी। महानगर में रहने वाली लड़कियाँ सिगरेट पीने से परहेज नहीं करतीं यह सुना तो था पर अपनी ही बेटी को यह करते देखने की कल्पना भी न की थी माँ ने।
"यह क्या, तुम सिगरेट पीती हो?" अचानक ही बोल पड़ीं।
"अरे माँ,आप कब आईं? और आने से पहले बताया भी नहीं।"
"बता कर आते तो तुम्हारा यह रूप कैसे देखते?"
"कौन सा रूप भाई?"
"यही, जो तुम कर रही थी।"
"अच्छा भैया, क्या तुम सिगरेट नहीं पीते। हमने तो कभी मना नहीं किया।"
"चुप रह, यह क्या लड़कियों को शोभा देता है।" अब माँ बोल पड़ी।
" माँ, आप कब से लड़का लड़की में भेद करने लगीं। भाई को तो कभी मना नहीं किया, मुझे क्यों...लड़की हूँ इसलिए न।"
निरुत्तर सी खड़ी माँ को देखकर भाई ने सिगरेट का डब्बा निकाला और माँ के हाथों में रखते हुए बोला," बहन सच कह रही माँ। जो वर्जना लड़की के लिए है वह लड़कों के लिए भी तो होनी चाहिए।आज से मैं इसे छोड़ता हूँ।"
"मैं भी," कहते हुए बहन ने भी अपना डब्बा माँ को दे दिया।
दोनों बच्चों को गले से लगाकर माँ कुछ देर खड़ी रही।
अब भी कुछ तो शेष था जिसके कारण दोनों ने पालन पोषण का मान रख लिया था।
@ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

अस्तित्व

"अस्तित्व"
दिल की धड़कन बन्द होती सी महसूस हो रही थी। मैंने झटपट मशीन निकाली और कलाई पर लगाया। नब्ज रेट वाकई कम था।
"ओह, क्या तुम मुझे कुछ दिनों की मोहलत दे सकती हो प्रिय", मैंने डूबते स्वर में उसका हाथ पकड़ते हुए कहा।
"तुम्हारे पास समय की कमी नहीं थी। पर अब ऐसा क्या है जो तुम करना चाहती हो।" उसने मेरा हाथ छुड़ाते हुए कहा।
"मैं पन्नों को समेट रही हूँ। कुछ बाकी हैं जो अंत में लगाने हैं। बस उतना वक्त दे दो मुझे।मैं अपने भाव संसार को देना चाहती हूँ," निवेदन का भाव आ गया था मेरी आवाज़ में।
"प्रिय सहगामिनी, आज तुम्हारी आयु पूरी हो रही। बस इच्छाशक्ति ही हम दोनों को साथ रख सकती है। वादा करो अब समय गंवाए बिना अपना कार्य पूरा करोगी।"
"वादा करती हूँ, वादा करती हूँ..." चीखते हुए कहा मैंने।
"तब लो, मैं पुनः तुम्हारे शरीर में समाहित हो रही"
मुझे लगा कि धड़कन अब सामान्य हो रही थी।
उफ्फ़...बिना आत्मा के हमारा सांसारिक अस्तित्व कुछ नहीं। अब अपने अस्तित्व को पन्नो पर शीघ्र ही समेटना होगा।
--ऋता

शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

धुँधली आँख-लघुकथा

धुँधली आँख

चारो तरफ ॐ कृष्णाय नमः की भक्तिमय धूम मची हुई थी। देवलोक में बैठे कृष्ण इस कोशिश में लगे थे कि किसी की पुकार अनसुनी न रह जाये। कृष्ण के बगल में बैठे सुदामा मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।
" रहस्यमयी मुस्कान तो हमारे अधरों पर विराजमान रहती है मित्र, आज आपने क्यों यह मुस्कान धारण किया है?"
"कुछ नहीं मित्र, आज मेरा मन हो रहा कि मैं भी धरती पर जाऊँ और आपकी महिमा देखूँ।"


" तो देर किस बात की प्रिय सुदामा, चलिये"

धरती पर पहुँचकर कृष्ण , कृष्ण ही बने रहे किन्तु सुदामा ने खुद का अवतरण इस प्रकार किया कि वे जहाँ जायें, उस घर के मालिक के दोस्त के रूप में दिखें।

धरती शंखध्वनि से गुंजायमान थी। दीपकों ने अपनी लौ स्थिर रखा था क्योंकि दीये में घी प्रचूर मात्रा में था।कृष्ण के बालरूप की सज्जा का तो कहना ही क्या था।कृष्ण-राधा का भी अद्भुत श्रृंगार था। कृष्ण के भोग की जितनी गिनती की जाए वह कम ही होनी थी।

कृष्ण सुदामा एक घर के सामने रुक गए। कृष्ण को भी मसखरी सूझी। उन्होंने बालक का रूप धारण कर लिया।

"कोई है, कोई है" सुदामा ने आवाज लगाई।

अन्दर से गृहस्वामी निकले जिनकी रईसी उनकी साजसज्जा बता रही थी।

"क्या है, क्यों आवाज लगा रहे हो। कान्हा की आरती का समय हो गया है भाई, अभी वापस जाओ।"

"मेरा बच्चा कई दिनों से भूखा है, कुछ खाने को दीजिये।" खुले दरवाजे से माखन, दही की हांडी देखते हुए सुदामा ने कहा।

"अभी क्या दूँ, सब कुछ भोग में चढ़ा हुआ है"

"मित्र, मैं राघव हूँ, मैं तो तुम्हें देखते ही पहचान लिया था।मैं चाहता था कि तुम मुझे स्वयं पहचानो। अभी मेरी माली हालत ठीक नहीं, बच्चा भूखा है।" सुदामा ने विनीत भाव से कहा।

गृहस्वामी की आंखों में क्षण भर की पहचान उभरी।
" पर मैं नहीं पहचान पा रहा। क्या मेरे वैभव से आकर्षित होकर आए हो।"

"नहीं,धरती पर शोर मचा है कि कृष्ण भाव के भूखे हैं। हम अपनी वही भूख मिटाने आये थे।" कृष्ण सुदामा ने असली रूप धारण कर गृहस्वामी को अचंभित कर दिया।

"मित्र कृष्ण, जो भी आपके नाम की टेर लगा रहे उनमें कितनों ने आपके सद्गुणों को अपनाया है, बस यही दिखाना था। जो जीते जागते बाल गोपाल को धुँधली आँखों से देख रहे वे आपका अनुकरण कैसे कर पाएँगे।"

रहस्यमयी मुस्कान अब भी सुदामा के अधरों पर थिरक रही थी।

--ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 27 अगस्त 2019

अपनी अपनी नौकरी-लघुकथा



अपनी अपनी नौकरी

सरकार की ओर से जमींदारी प्रथा खत्म हो चुकी थी।फिर भी लोकेश बाबू जमींदार साहब ही कहलाते थे।उनके सात बेटे शहर में रहकर पढ़ाई करते और लोकेश बाबू मीलों तक फैले खेत की देखरेख और व्यवस्था में लगे रहते। धीरे धीरे सातों बेटे ने उच्च शिक्षा प्राप्त की और पदाधिकारी बनते गए। लोकेश बाबू को यह चिंता सताने लगी कि गाँव के जमीन जायदाद की देखभाल कौन करेगा। सब शहर में रहकर नौकरी करना चाहते थे।एक बार उन्होंने यही बात सभी बेटों के सामने रखी।उनमें एक बेटा गाँव में रहकर देखभाल के लिए तैयार हो गया। जब वे जीवित थे तो सभी बेटों को पैदावार का कुछ हिस्सा भेज दिया करते थे। जमींदार साहब को गए पाँच वर्ष बीत चुके थे।अब किसी को कुछ भी नहीं भेजा जाता था।

आज अचानक छोटे भाई उमेश को देख गाँव वाले भाई सोमेश को बहुत खुशी हुई। दोनों भाई देर तक हरियाली भरे खेतों में घूमते रहे। घूमते घूमते उमेश ने दिल की बात बता ही दी।
"भैया, पिताजी के जाने के बाद हमलोगों को खेत का कुछ भी नहीं मिल रहा। लगता ही नहीं कि हम खेतिहर परिवार से हैं।"
"देखो बाबू, जैसे तुमलोग शहर में रहकर नौकरी करते हो तो मैं तो तुम्हारी नौकरी के पैसे से कुछ नहीं माँगता। खेती ही मेरी नौकरी है और पैदावार मेरी तनख्वाह। यदि तुम्हे पैदावार में हिस्सा चाहिए तो अभी इन बैलों को हल में जोतकर दिखा" । यह कहते हुए सोमेश ठठाकर हँस पड़ा।
"पिता जी की इच्छा का मान रखते हुए मैंने गाँव और खेती स्वीकार किया और तुमलोगों ने शहर और नौकरी। खेत की जमीन जब चाहे ले लेना। फिर उस पैदावार पर तुम्हारा हक होगा भाई मेरे"
उमेश मुस्कुरा दिया क्योंकि यही जवाब उसे शहर लौटकर बड़े भाइयों को देना था।
-अप्रकाशित
ऋता शेखर मधु

शनिवार, 22 जून 2019

आप अच्छे हो - लघुकथा







लघुकथा-पितृदिवस पर आप अच्छे हो 

"निभा, कहाँ है हमारी लाडली बिटिया। देखो!हम तुम्हारे लिए क्या लाये हैं।" घर में घुसते ही नीलेश ने बड़े प्यार से तेज आवाज़ में कहा । सामने विभा खड़ी थी। उसने इशारे से बताया कि निभा अपने कमरे में है। आज दोपहर में निभा का बारहवीं के रिजल्ट आया था। उसका प्रतिशत सहपाठियों के मुकाबले काफ़ी कम था। जब से रिजल्ट आया था, वह आंखों में आँसू लिए बैठी थी। दिन का खाना भी नहीं खाया था उसने। उसकी मम्मी विभा ने नीलेश को फ़ोन करके सब बातें बतायी। 
"अरे, मेरी बिटिया कहाँ है" नीलेश ने बिल्कुल उसी अंदाज में कहा जैसे बचपन में वह बेटी के साथ खेला करता था और सामने देखकर भी नहीं देखने का नाटक किया करता था। निभा ने अपना सिर ऊपर नहीं किया। वैसे ही मूर्तिवत बैठी रही। 
"निभा, देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ" कहते हुए नीलेश ने नन्हा सा टेड्डी निकाला और सामने रख दिया। निभा ने उदास नजर टेड्डी पर डाली। पहले की बात रहती तो वह नीलेश के गले लग जाती। 
"निभा, देखो मैं पटीज़ लाया हूँ और आइसक्रीम भी वही जो फ्लेवर तुम्हें पसन्द है।" यह कहकर उसने दोनों चीज़ें निभा के सामने रख दीं। 
"पापा, प्लीज, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैंने आपके उम्मीदों को तोड़ा है। आपने मुझे हर सुविधा दी, और देखिए मैं कितनी नालायक निकली।" "मेरी बेटी और नालायक, कभी नहीं। मुझे सिर्फ तुम चाहिए बेटा। तुमने प्रयास किया वही हमारे लिए बहुत है...अब चलो, हमलोग जश्न मनाते हैं। विभा, इधर आ आओ" कहते हुए नीलेश ने निभा के मुंह में बड़ा सा चम्मच डाल दिया आइसक्रीम वाला। 
एकसाथ इतनी ठंडा आइसक्रीम मुंह में जाते ही वह उठकर पापा के गले लग कर जोर से रो पड़ी। नीलेश ने उसे रो लेने दिया।अब वह नन्हीं बच्ची नहीं थी जो फुसल जाती। नमी नीलेश की आँखों में भी उतरी पर वह खुशी बिटिया को वापस पा लेने की थी। 
अचानक निभा धीरे से बोली,"आप बहुत अच्छे हो पापा" निभा की गम्भीर आवाज ने नीलेश को अंदर से रुला दिया। --ऋता शेखर मधु

सोमवार, 31 दिसंबर 2018

दो लघुकथाएँ

1.
समझौता
घर में चाहे जितने भी बदलाव किए जाते मगर बैठक के मुख्य द्वार के एक ओर दो सजी कुर्सियाँ वापस रख दी जाती थीं| एक कुर्सी पर करीने से एक तुलसी माली टँगी रहती | दूसरी कुर्सी पर एक छड़ी, एक चश्मा और एक पेन रहते थे| सजावट के ख्याल से छड़ी पर सुनहरी मूठ लगवा दी गई थी और चश्मा को कलम के साथ सुन्दर पारदर्शक डब्बे में बंद किया गया था|

एक बार शरद ने पूछा था,' पापा, इन कुर्सियों पर रखी माला, छड़ी, कलम और चश्मे को हम अन्दर के शो बॉक्स में भी रख सकते हैं न, यहाँ ही क्यों?''
'बेटा, इन कुर्सियों पर मेरी माँ और पिताजी बैठा करते थे| जब भी मैं कुछ गलत करने की सोचता हूँ तो पिता जी की यह छड़ी मुझे धमकाती है| किसी गहरी समस्या पर सोचता हूँ तो चश्मा मुझे दूरदर्शिता रखने को कहता है| यह कलम मुझे कहती है कि कभी गलत काग़ज़ पर हस्ताक्षार न करना| माँ की माला धर्म की राह दिखाती है|'

'वह तो ठीक है पापा, पर अन्दर भी तो शो बॉक्स में रख सकते हैं न', शरद ने दोहराया|

'रख तो सकते हैं बेटा, फिर वह सजावट का सामान बन कर रह जाएगा| मुख्य द्वार पर बुज़ुर्गों के रहने का अहसास भी घर को कई आपदाओं से बचाता है| घर के सदस्य स्नेहाकर्षण से बँधे रहते हैं|'

तभी शरद का मोबाइल बज उठा| वहाँ शालिनी का नाम चमक रहा था|

'शरद, पापा ने यादों के कचरे को मेन डोर से हटाया या नहीं,' मोबाइल पर जोर से कही गई बहू की आवाज़ धीमे से दिनेश बाबू के कानों में पड़ गई| शरद का उत्तर जानने के लिए वे कुछ देर वहीं ठिठक गए|

'नहीं यार, लाख गुण हों हमारे बुज़ुर्गों में पर उन्हें समझौता करना नहीं आता,' अन्दर कमरे की ओर जाता हुआ शरद कह रहा था|

कुछ देर बाद शरद बाहर जाने के लिए दरवाजे पर पहुँचा तो वहाँ कुछ खाली खाली सा लगा| ध्यान देकर देखा तो दोनों कुर्सियाँ गायब थीं| अचकचा कर वह पापा, पापा बोलता हुआ उनके कमरे में गया| सामान सहित कुर्सियाँ वहीं रखी थीं| दिनेश बाबू के पलंग पर चारों ओर पुस्तक के पन्ने बिखरे पड़े थे और पुस्तक का मुखपृष्ठ उनके हाथों में था जिसे वे अपलक देख रहे थे|
अभी एक सप्ताह पहले ही दिनेश बाबू ने बड़े गर्व से 'मेरे बच्चे मेरा संस्कार' नामक अपनी पुस्तक को लोकार्पित किया था|

'पापा, ये क्या किया आपने?' विह्वल स्वर में शरद ने कहा|
'समझौता', दिनेश बाबू की आवाज़ स्थिर थी|

--ऋता शेखर 'मधु'
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2.
दर्द

फेसबुक पर सुमित्रा ने लिखा,
" कल मैंने एक सिनेमा देखा-हाउसफुल-3 जिसमें लँगड़ा, गूँगा और अँधा बनकर सभी पात्रों ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया..."
बस पाँच मिनट ही बीते थे यह लिखे हुए कि इनबॅाक्स की बत्ती जली|
ये तो तुषार का मेसेज है, सोचती हुई सुमित्रा ने मेसेज़ खोला|
'दीदी जी, विकलांग क्या मनोरंजन की वस्तु हैं? ' यह पढ़कर सुमित्रा का दिल धक् से रह गया| तुषार सुमित्रा का फेसबुक मित्र था| दोनों पैरों से लाचार तुषार कलम का धनी था| उसकी लिखी रचनाएँ बहुत लोकप्रिय होती थीं| अभी हाल में ही विकलांग कोटि के द्वारा उसकी नौकरी एक सरकारी विद्यालय में लगी थी|
अभी सुमित्रा सोच ही रही थी कि क्या जवाब दे, तुषार का दूसरा मेसेज़ आ गया|
'दीदी जी, स्वस्थ इंसान विकलांगों के दर्द कभी महसूस नहीं कर सकते तभी तो उनके किरदार निभाकर हास्य पैदा करते हैं|'
सुमित्रा ने कुछ सोचकर कर एक फ़ोटो पोस्ट किया जिसमें वह एक प्यारी सी लड़की के साथ खड़ी थी| उस लड़की की आँखें बहुत सुन्दर थीं|
'बहुत प्यारी बच्ची है दीदी, ये कौन है?'
'मेरी छोटी बहन जो देख नहीं सकती| समय से पूर्व जन्म लेने के कारण बहुत कमजोर थी तो इसे इन्क्युबेटर में रखा गया था| नर्स ने बिना आँखों पर रूई रखे उच्च पावर का बल्ब जलाकर
सेंक दे दिया जिससे इसकी आँखों की रौशनी छिन गई| यह बात तब पता चली जब वह आवाज होने पर अपनी प्रतिक्रिया तो देती थी किन्तु नजरें नहीं मोड़ती| यह पता चलने पर हमारे परिवार पर जो वज्रपात हुआ होगा वह तो तुम समझ सकते हो न तुषार| मैंने फेसबुक पर यह तो नहीं लिखा कि यह सिनेमा देखकर मुझे मजा आया|'
'सॉरी दीदी जी'
'सॉरी की बात नहीं तुषार, दर्द से हास्य पैदा करना ही तो दुनिया की आदत है| अब बताओ तो, विकलांग कौन है? '
तुषार ने खिलखिला कर हँसने वाली बड़ी सी स्माइली भेजी और सुमित्रा ने चैन की साँस ली|
--ऋता शेखर मधु 

सोमवार, 12 नवंबर 2018

नैतिकता - लघुकथा


"ममा, आप पटाख़े ले आये, शाम को दो घण्टे का समय रखा गया है जहाँ सब मिलकर पटाख़े फोड़ेंगे"

"हाँ बेटा, सब तरह के पटाख़े लायी हूँ। सुतली बम, रॉकेट बम, धरती बम, आलू बम, मल्टीकलर फुलझड़ियां...सब कुछ।"


"ममा, आप कितने अच्छे हो। लव यू ममा। समय हो रहा पार्क में इकट्ठा होने का। आप तैयार हो जाएं, मैं भी आ रहा हूँ।"

पार्क में जाते हुए ममा ने मोबाइल ऑन किया।

छह सौ लाइक और पाँच सौ कमेंट्स आ चुके थे उनकी दस मिनट पहले डाली गई इस पोस्ट पर,
" पटाखों से वायु प्रदूषण होता है, बुज़ुर्ग, बच्चों और पशुओं का ख्याल रखें। पर्यावरण को शुद्ध रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।"
-ऋता

रविवार, 30 सितंबर 2018

धातु के बरतन - लघुकथा

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धातु के बरतन

सास और बहू का घर अलग अलग शहरों में था।


"मम्मी जी, आपने मलने के लिए सारे बर्तन बाई को दे दिए। बर्तनों पर खरोंच आएगी तो भद्दे दिखेंगे।" बर्तनों का अंबार देखकर सास के घर आई बहु आश्चर्य से बोल पड़ी।

"नहीं बहु, तेज रगड़ से ये और भी चमक उठेंगे, धातु के हैं न।"

"मम्मी जी, हमारे यहाँ तो आधे से अधिक बर्तन मुझे ही साफ करने होते हैं। काँच के शौफ़ियाना बर्तन, नॉन स्टिक तवा कड़ाही, ये सब बाई को नहीं दे सकती। खरोंच लगा देगी या काँच का एक भी गिलास या कटोरी टूट गयी तो डिनर सेट खराब हो जाएगा।"

"तभी तो आजकल के रिश्ते भी नर्म और नाजुक हो गए हैं। क्रोध या अहम की हल्की खरोंच भी उन्हें बदरंग कर सकती है।"

"क्यों, पहले रिश्ते बदरंग नहीं होते थे क्या मम्मी जी।"

"होते थे, पर उन रिश्तों को संभालने के लिए प्यार के साथ कठोरता से भी काम लिया जाता था और उनमें निखार बढ़ता जाता था। धातु के बर्तनों को अपने गिरने या रगड़े जाने की परवाह नहीं होती । "
-ऋता

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

राशिफल - लघुकथा

राशिफल

सुबह के पाँच बजे से सुनंदा की दिनचर्या शुरू हो जाती। सबसे पहले बच्चों के मनपसन्द नाश्ते और लंच बनाती। उन्हें पैक करती। उधर बच्चे स्कूल के लिए स्वयं तैयार हो जाते। इतना करते हुए छह बज जाते और पतिदेव सुरेश भी तबतक उठकर चाय की फरमाइश कर देते। सास, ससुर और पति के लिए वह एक साथ ही चाय बनाती। इस दौरान उसके कान बालकनी की तरफ लगे रहते जहां गोल गोल मुड़ा ,नन्ही रस्सी में बंधा अखबार 'टप' से गिरता और वह दौड़ लगाकर बालकनी में पहुँच जाती क्योंकि एक बार अखबार पतिदेव के हाथ लगी तो मिलने से रही।
जल्दी जल्दी तीन चार पन्ने पलटती, कुछ पढ़ती और वापस अखबार मेज पर रखकर रसोई में लौट जाती। ऑफिस जाने के समय पति जब बाहर निकलने लगे तो सुनंदा ने धीरे से कहा,"आज वाणी और क्रोध पर नियंत्रण रखना उचित रहेगा। ऐसा आपकी राशि में लिखा है।"
पति के क्रोधी स्वभाव से वह हमेशा सशंकित रहती थी।सुनंदा की ओर कड़ी नजर से देखकर सुरेश चले गए।
"बहु, राशिफल में आज धनप्राप्ति का भी योग है, ये क्यों नहीं बताया सुरेश को" , सास ने अखबार पढ़ते हुए पूछा।
सुनंदा मुस्कुराकर चुप रह गई।
शाम को सुरेश घर आये तो बहुत खुश थे। आते ही माँ को बताया," आज मुझे एक नई प्रोजेक्ट मिली है"
"बेटा, आज के राशिफल में यह भी लिखा था जिसे सुनंदा ने नहीं बताया।"
"माँ, आज ऑफिस जाते ही बॉस किसी बात पर उलझ गया। मैं भी उससे बड़ी बहस करना चाह रहा था तभी सुनंदा की बात याद आ गई और मैन धैर्य से काम लिया।उसके बाद बॉस ने वह प्रोजेक्ट मुझे ही देने का फैसला किया"
"अरे वाह !" कहती हुई सास ने बहु को हल्की मुस्कान के साथ देखा
"धनप्राप्ति से अधिक महत्वपूर्ण व्यवहार पर नियंत्रण है, मान गए तुम्हारी सोच को बहु।"
"जी" कहकर सुनंदा ने मेज पर गरम गरम चाय और पकौड़े रख दिये।
-ऋता

प्रॉपर्टी - लघुकथा

प्रॉपर्टी

"अभी आ रही हो, इतनी रात गए कहाँ थी तुम?"
"मैं तुम्हारी प्रॉपर्टी नहीं जो तुम मुझपर बन्धन लगाओ"
"प्रॉपर्टी कैसे नहीं, तुम्हारे पिता ने तुम्हे दान दिया है मुझे। तुम्हारे प्रति जिम्मेदारी है मेरी"
"अब भूल जाओ, कोर्ट ने धारा 497 हटाते हुए कहा है कि पत्नी पति की प्रॉपर्टी नहीं"
"हम्म"
"सुनो, कल तुम मेरे साथ चलना। पड़ोस में जो नया आदमी आया है, मुझे अजीब नजरों से घूरता है। तुम्हे मेरा साथ देखेगा तो डरेगा"
"रक्षा तो अपनी प्रॉपर्टी की की जाती है"
-ऋता

मंगलवार, 11 सितंबर 2018

पुत्रीरत्न

नवरात्र की पूजा पर बैठी नंदिनी ने मोबाइल बजते ही तत्परता से उठाया और बोल पड़ी,
" हलो, पापा, क्या हुआ है?"
"बेटा,बहुत बहुत बधाई ! तू बुआ बन गयी, काजल की रस्म के लिए यहाँ आने की तैयारी कर।"
" अरे वाह ! आपको भी दादा बनने की बहुत बधाई पापा। भाभी कैसी है और वो दोनों छुटकू किस रूप में अवतरित हुए हैं, ये भी बताइये।"
"एक पुत्ररत्न और एक लक्ष्मी, सोमेश की फ़ैमिली पूरी हो गई। बहुत प्यारा परिवार बन गया नन्दिनी," पापा ने नन्दिनी को जुड़वाँ जन्म लिए बच्चों के बारे में बताया।
" अरे वाह ! पर मैं आपसे नाराज हूँ पापा। आपने नवजात शिशुओं का परिचय ठीक से नहीं दिया|"
"अच्छा, तो यह बता दो क्या ग़लत कहा|"
"पुत्र को गणेश नहीं कहा पर बिटिया को लक्ष्मी कहकर अभी से ही देवी बना दिया आपने। पापा, नवरात्रि के पाठ से यह समझ पा रही हूँ कि स्त्री जीवन स्वयं एक चुनौती है जिसे वह साधारण मानवी के रूप में ही स्वीकार करता है। पढ़ाई, कमाई और सृष्टि निर्माण की शक्ति के समय उसे देवियों के रूप में जाना जा सकता है, पर अभी से क्यो?"
शायद पापा को भी यह बात तर्कसंगत लगी थी तभी  पूछे,"तो क्या कहकर परिचय देता"
"पुत्रीरत्न कहना था," कहकर नन्दिनी खिलखिला उठी।
"समझ गया, तू आरती कर देवियों की और फ़ोन जरा दामाद जी को दे।"
नन्दिनी ने स्पीकर ऑन किया तब पति को फोन दिया।
"सोमेश के जुड़वाँ बच्चों के जन्मोत्सव में आप और नन्दिनी आमन्त्रित हैं, अवश्य आइयेगा" पापा ने कहा।
"जी अवश्य, पर शिशुओं के परिचय तो दीजिये पापा जी।"
"एक पुत्ररत्न और एक पुत्रीरत्न",
यह सुनते ही नन्दिनी का चेहरा खिल गया और वह घंटी बजाकर गाने लगी, "जय अम्बे गौरी.....
-ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 22 जून 2018

पुरस्कार

पुरस्कार 

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लगभग चार वर्ष पहले अनीता की नियुक्ति मध्य विद्यालय में हुई थी| जिस दिन वह विद्यालय में योगदान देने गईं , सभी शिक्षक और बच्चे बहुत खुश हुए थे क्योंकि वहाँ गणित के लिए कोई शिक्षक न था| 
योगदान देने के बाद प्रधानाध्यापिका ने उन्हें बैठने को कहा और बोलीं, “अनीता जी, आप कल से क्लास लीजिएगा| हम आपको आठवीं कक्षा की क्लास टीचर बनाएँगे|" 
उसके बाद उन्होंने एक बच्चे को पुकारा,”रोहित बेटा, ये नई मैडम आई हैं| जरा बाहर चाय वाले को कह दो कि चाय दे जाए|’ 
“जी मैम, “कहकर वह बाहर गेट पर के चायवाले को कह आया| 
“पर आपने बच्चे को क्यों भेजा,”बात अनीता के गले से न उतरी| 
“मध्य और प्राथमिक विद्यालयों के लिए सरकार ने चपरासी और क्लर्क का पद नहीं रखा है| इसलिए कुछ काम बच्चों से भी करवा लेते हैं|’जवाब सुनकर अनीता ने उनकी लाचारी को समझा| 
कुछ देर बाद किसी कागज की फोटो कॉपी करवाने और मध्यान्ह भोजन के लिए दाल मँगवाने के लिए उन्होंने रोहित को भेजा| 
“मैम, आप बार बार रोहित को ही क्यों भेजती हैं काम के लिए| किसी अन्य को भी भेजिए,”अनीता ने जिज्ञासा प्रकट की| 
“क्योंकि वह स्कूल का सबसे जिम्मेदार बच्चा है,” कह कर वह आफिस में चली गईं| 
दूसरे दिन अनीता समय से कुछ पूर्व विद्यालय पहुँचीं| उन्होंने देखा कि रोहित भी आ चुका था| उसने विद्यालय के सभी कमरों के ताले खोले| कुछ कुर्सियाँ निकाल कर बाहर बरामदे में रखी| प्रार्थना सत्र समाप्त हुआ तो सभी बच्चे अपनी अपनी कक्षा में चले गए| 
अनीता रजिस्टर लेकर आठवीं क्लास में गई| सबसे पहले बच्चों के स्तर को जाँचने के लिए उसने गणित का एक सवाल दिया| रोहित ने झटपट बना कर दिखा दिया| अनीता ने बोर्ड पर फिर दूसरा सवाल दिया| सभी बच्चे हल करने लगे| तभी बाहर से रोहित की पुकार हुई| 
“सुनकर आता हूँ मैम, “कहकर वह चला गया| अनीता ने उसकी कॉपी देखी| वह आधा सवाल हल कर चुका था| रोहित वापस आकर उत्तर पूरा करने लगा| पाँच मिनट बीत गये| दूसरे बच्चों ने तबतक दिखा दिया| रोहित के माथे पर पसीने की बूँदें थीं| 
‘ क्या हुआ रोहित, नहीं बन रहा क्या”,अनीता ने पूछा| 
“मैम, बार बार भाग देने में गल्ती हो जा रही|” 
अनीता समझ गई कि ध्यान भंग होने की वजह से ऐसा हो रहा| वह रोहित से कुछ कहने ही वाली थी कि बाहर से फिर बुलावा आ गया| इस बार रोहित ज्यों ही उठा, अनीता ने उसे बैठकर सवाल हल करने को कहा और स्वयं बाहर चली गई| 
“आप क्यों आ आईं क्लास छोड़कर,” हेड मैम को अनीता का आना अच्छा नहीं लगा था| 
“रोहित भी तो क्लास छोड़कर ही आता मैम| बताइए, क्या करना है| मैं कर देती हूँ| मैं अपने क्लास से पढ़ाई के दौरान किसी को निकलने नहीं दूँगी|” दृढ़ता से अनीता ने कहा| 
“वैसा कुछ काम नहीं है, आप जाइए,” अनीता वापस आ गई| रोहित ने वह सवाल हल कर लिया था| उसकी कॉपी देखते हुए अनीता ने पूछा,”देखो रोहित, काम करना अच्छी बात है किन्तु इससे एकाग्रता भंग होती है, तुमने देखा न अभी|पढ़ने वाले बच्चों को हमेशा पढ़ाई पर ही एकाग्र रहना चाहिए|” 
“किन्तु मैम, मुझे बुलाया जाए तो क्या करूँ, क्या कहूँ|” 
“देखो बेटा, तुम वे सारे काम लंच ब्रेक में भी कर सकते हो न| सुबह भी मैं बच्चों की पारी बनाकर विद्यालय खोलने की जिम्मेवारी बाँट दूँगी| सुबह का समय भी पढ़ाई में लगाया करो| पढ़ाई ही तुम्हारा भविष्य है| दसवीं में अच्छे नम्बर नहीं आए तो अच्छी जगह दाखिला नहीं मिलेगा|” 
उस दिन के बाद से रोहित को बीच कक्षा से नहीं बुलाया गया| आठवीं पूरी करके वह किसी दूसरे शहर चला गया था जहाँ उसके पिता का तबादला हो गया था| 
दसवीं की बोर्ड परीक्षा का परिणाम आ चुका था| विद्यालय में जिला शिक्षा पदाधिकारी का निमंत्रण पत्र आया हुआ था| बोर्ड परीक्षा में जिलास्तर और राज्यस्तर पर अच्छा रैंक लाने वाले बच्चों को आज सरकार की ओर से सम्मानित किया जाना था| वहाँ जाने की जिम्मेदारी अनीता को सौंपी गई| मंच पर कार्यक्रम शुरु हो चुका था| बच्चे आते और अपना सम्मान शिक्षा मंत्री से लेकर वापस चले जाते| अनीता का ध्यान आज रोहित की ओर जा रहा था| पता नहीं रोहित को कितने प्रतिशत नम्बर आए होंगे, बार बार यह बात जेहन में आ रही थी| 
“और जिला स्तर पर प्रथम स्थान पाने वाले बच्चे का नाम है, रोहित कुमार”, मंच पर आनेवाला बालक सम्मान ग्रहण कर चुका था| 
उससे पूछा गया,”तुम अपनी सफलता का श्रेय किसे देना चाहोगे|” “अनीता मैम को,”सुनकर अनीता की तंद्रा अचानक भंग हुई| 
“यदि अनीता मैम यहाँ हैं तो मंच पर आने की कृपा करें| मैं उनका आशीर्वाद लेना चाहता हूँ|” हॉल के पिछले सीट पर बैठी अनीता रोहित को पहचान नहीं पाई थी| 
अब उसके कदम मंच की ओर बढ़ रहे थे, आख की कोरों पर आई बूँदें ढलक जाना चाहती थीं| 
“मैम, आपने मुझे समझाया न होता तो आज मैं यहाँ नहीं होता,” कहते हुए रोहित अनीता के पैरों पर झुक गया| तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूँज रहा था| अनीता को लग रहा था जैसे रोहित ने उसे बेस्ट टीचर का पुरस्कार दिया है| 
@ऋता शेखर ‘मधु’