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सोमवार, 7 सितंबर 2026

मातुल कंस

 

मातुल कंस

यमुना तट पर नगरी पावन।

मथुरा जिसका नाम सुहावन।।

कंस नाम का राजा आया।

जनता को वह खूब सताया।।


''भगिनी-सुत ही काल बनेगा।

तेरे आगे वही ठनेगा।।

पुत्र आठवाँ जो आएगा।

तेरी मृत्यु संग लाएगा।।''


आयी थी नभ से यह वाणी।

सुनकर काँपा था वह प्राणी।।

पाकर कटुक वचन की हाला।

अटका उसके कंठ निवाला।।


वाणी जो सुन ली थी भारी।

कंस हुआ था अत्याचारी।।

प्राणों पर जब थी बन आई।

क्रूर बना वह राजा भाई।।


बहन देवकी को वह पकड़ा।

जंजीरों से उसको जकड़ा।।

भगिनी-पति वसुदेव न भाया।

कारा में उनको भी लाया।।


छह पुत्रों को उसने पटका।

लगा देवकी को तब झटका।।

पति-पत्नी दोनों थे व्याकुल।

इतना क्रूर हुआ था मातुल।।


 गर्भ सातवाँ जब था आया।

प्रत्यारोपित करतीं माया।।

हुआ देवकी से विस्थापित।

बना रोहिणी में वह ज्ञापित।।


अष्टम सुत की थी अब बारी।

रखवाली नृप करता भारी।।

अपनी-अपनी नींदें त्यागे।

रात-दिवस सैनिक थे जागे।।


भादों कृष्ण-अष्टमी आयी।

माता ने पीड़ा थी पायी।।

शिशु-क्रंदन से  गूँजा कारा।

भय से बाबुल का मन हारा।।


नत नयनों में पीर बड़े थे।

विवश वहाँ वसुदेव खड़े थे।।

यह विचार तब मन में जागा।

कैसा हूँ मैं पिता अभागा।


रात अमावस की थी काली।

बारिश भी होती मतवाली।।

छाई मन पर घोर निराशा।

चिंतन में थी मूक हताशा।।


अद्भुत थी वह बात निराली।

टूटी सीकर कारा वाली।।

सैनिक भी सोए थे सारे।

पथ को पित निर्बाध निहारे।।


डलिया में रखकर के बालक।

जाते यमुना में वह पालक।।

शेषनाग-फन छतरी ताने।

शिशु को आये देव बचाने।।


पग छूता यमुना का पानी।

वसुदेव को हुई हैरानी।।

आये हैं सब शिशु के कारण।

बात नहीं है यह साधारण।।


नन्द गाँव में बालक देकर।

वसु लौटे कन्या-शिशु लेकर।।

तबतक सारे सैनिक जागे।

बात यही कहने को भागे।।


प्रबल हुआ मातुल का मारण।

बालक बिछड़ा उसके कारण।।

बात व्यथा की बड़ी पुरानी।

मार्मिक लगती आज कहानी।।




ऋता शेखर 'मधु'

विधा - चौपाई

मात्रा भार - 16

पदांत- 22

गुरुवार, 11 जून 2026

जिस धरती ने पाला पोसा

 🌱पर्यावरण दिवस पर🌱


जिस धरती ने पाला पोसा

उसका हम सम्मान करें

फसलों की उर्वर माटी पर

खड़ा न कोई मकान करें।


जल से है पृथ्वी पर जीवन

हरदम इसका ध्यान धरें

डिटर्जेंट डाल डाल सरि को

कभी न लहूलुहान करें।


प्राणवायु देता है पीपल

बरगद से मिलती है छाया 

मेट्रो के खम्भे ने छीना

उनसे उनकी विस्तृत काया


माटी नीर पादप पवन

हैं पूजा के शुद्ध हवन

वे जब होंगे जग में रक्षित

जीवन भी होगा संरक्षित।


ऋता शेखर


बुधवार, 22 अप्रैल 2026

इच्छा मृत्यु

 



उधेड़बुन

"जब से न्यायालय का निर्णय आया है

मन पर उधेड़बुन का गहरा साया है

यह उधेड़बुन निर्णय पर नहीं,

नाम पर है क्योंकि नाम है 'इच्छा मृत्यु'"


"मगर नाम पर  उधेड़बुन कैसा है? "


"मरने वाला अपनी इच्छा व्यक्त नहीं कर पाया।

उसकी इच्छा का कहीं जिक्र न आया।

अस्पताल में जीवन मिलता है

परिजनों का चेहरा खिलता है।

उसे  मृत्यु देने के लिए

जीवनदायिनी यंत्र हटाये गए

भोजन पानी घटाए गए।

वह बेबस बोल नहीं पाया

उसकी तंत्रिकाओं पर था

शिथिलता का साया।

पर उसे महसूस तो होता होगा

मन ही मन वह भी रोता होगा।"


"यह निर्णय तो परिवार का है

उनके थके हुए संसार का है।"


" इसलिए सब कुछ सहज लिया गया।

वेद मंत्रों द्वारा उसको विदा किया गया।"


" मगर बंधु

आज भी मन में एक प्रश्न समाया है।

क्या वृद्धों के लिए भी

इच्छा मृत्यु का समय आया है?"


" यह उधेड़बुन बेमानी है। 

जीवन की ये अवस्थाएँ

आनी हैं तो आनी हैं।"


" बंधु ! समझो मेरी बात

धूप छुपे तो आती रात।

वृद्ध बेबस मजबूर हुए

उनके सपोर्ट सिस्टम 

उनके बच्चे

 घर से कितनी दूर हुए।

रसोई वक्त बेवक्त जगती है

वह भी सगी न लगती है।

तन मन पर भारी असर हुआ है

लगता है जैसे कहर हुआ है।

बदले समय का निर्णय

क्या पारिवारिक विघटन है?

क्या इच्छा मृत्यु के लिए विवश

ये सामाजिक अकेलापन है ?"


प्रश्न तो समय के साथ-साथ

समाधान पा जायेंगे

मगर अभी तो हम

उधेड़बुन में ही जिये जायेंगे।


ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

मिट्टी की खुशबू

 मिट्टी की खुशबू और हम


जिस मिट्टी की तिलक लगाने

हम नीचे झुक जाते हैं

वह चंदन कण बन माथे पर

भारत  का मान बढ़ाते हैं


बारिश की वह प्रथम बूंद है

जो मिट्टी को महकाती है

सोंधी सोंधी खुशबू देकर

पकौडों को ललचाती है

मन मयूर बन जाता है

सतरंगी पँखो को खोले

विविध-भारती गाते हैं


मन सावन जब बने बसंती

दिख जाते हैं कृष्ण-राधिका 

ब्रज-माटी पर बसी प्रीत से

दर्शन की प्यासी बनी साधिका

मिट्टी की खुशबू जब उड़ती 

यमुना तट के कदम्ब पेड़ 

मुरली के राग सुनाते हैं।


मन ही मोहन, मन ही राधा

मन ही गोपियाँ मन अभिलाषा

मिट्टी की खुशबू मन जब मोहे

मीरा की बनती परिभाषा

मिट्टी से ही है जनजीवन 

मिट्टी पर उगकर नवरातों में

अन्न खुशी बरसाते हैं।


माटी घट के शीतल जल में

खुशबू उसकी घुल जाती है

मन वृंदावन हो जाता है

तृषित को तृप्ति मिल जाती है

खुशबू से हो प्रेम अपरिमित

जब तक मिट्टी न बन जायें

 फिर तो सागर इसे बहाकर 

दूर देश ले जाते हैं।


ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 9 मई 2025

तटस्थता अस्तु

 


तटस्थता क्या है ?

कहीं बुद्धिमानी

कहीं है स्वार्थ

कहीं चालाकी

कहीं परमार्थ


कहीं निष्क्रिय

कहीं उदासीन

कहीं कुटिल

कहीं पदासीन


कहीं समझौता

कहीं समर्पण

कहीं उपेक्षा

कहीं है दर्पण


कहीं समस्या

कहीं समाधान

कहीं मूढ़ता

कहीं है ज्ञान।


कहीं अहंकार

कहीं अपना काम

कहीं युद्ध

कहीं है विराम।


तटस्थ रहने में

कोई न कोई भाव

होता है निहित

तटस्थता में

हित है या अनहित

अंतरात्मा ही जाने

क्या है सम्मिलित


ऋता शेखर

रविवार, 8 दिसंबर 2024

मध्य में क्या

 जिंदगी की स्लेट पर

जन्म या मृत्यु लिखना

आरम्भ और अंत है।

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य वृहद उपन्यास है।


जन्म तो संयोग है

मृत्यु एक वियोग है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य मिलन का पर्याय है।


जन्म एक भोर है

मृत्यु निशा की ओर है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य चिलचिलाती धूप है।


जन्म उन्नयन है

मृत्यु अवनयन है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य उतार चढ़ाव है।


जन्म जो मुखड़ा है

मृत्यु भी तो टेक है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य अंतरे का विस्तार है।


जन्म गंगोत्री है

मृत्यु सागर समागम है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य ऊँची नीची धारा है।


जन्म जब बीज है

मृत्यु विशाल ठूंठ है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य फूल और काँटें हैं।


जन्म मतला है

अंत मकता है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य ग़जल है।


जन्म है अनुक्रम

मृत्यु है मतिभ्रम

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य  कथा है।


जन्म  प्रस्फुटन हो

मृत्यु भी विघटन है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य बसंत और पतझड़ है।


जन्म आशा है

मृत्यु में निराशा है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य खुशी या अवसाद है।


-ऋता शेखर

रविवार, 5 फ़रवरी 2023

जब हम सीख लेते हैं

 निभ जाते हैं रिश्ते

जब हम सीख लेते हैं

दोषों को नजरअंदाज़ करना


जी लेते हैं तमाम उम्र

जब हम सीख लेते हैं

बेवज़ह ही मरना


मिलती है सफलता

जब हम सीख लेते हैं

समय पर काम करना


पा लेते हैं निदान

जब हम सीख लेते है

समस्याओं को पकड़ना


मिल जाते हैं रास्ते

जब हम सीख लेते हैं

निडरता से पग धरना


कुसुमित होती है बगिया

जब हम सीख लेते हैं

काँटों संग निखरना


निखर जाता है लेखन

जब हम सीख लेते हैं

भाव सुन्दर भरना


खिल जाते हैं चेहरे

जब हम सीख लेते हैं

मुसकानों से सँवरना


पास आती हैं खुशियाँ

जब हम सीख लेते हैं

प्रकृति के संग गुजरना


जिंदगी हो जाती खूबसूरत

जब हम सीख लेते हैं

प्रीत-डोर में ठहरना


जीत लेते हैं जमाना

जब हम सीख जाते हैं

हरसिंगार सा झरना

-- ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 25 दिसंबर 2022

यात्रा

यात्रा-

यात्रा के हैं अनगिन रूप
कभी छाँव मिले कभी धूप
प्रथम यात्रा परलोक से
इहलोक की
नौ महीने की विकट यात्रा
बन्द कूप में सिमटी हुई यात्रा
जग से जुड़ता जब नाता
भोर से सायं तक
पृथ्वी की यात्रा
गंगोत्री से खाड़ी तक
गंगा की यात्रा
बचपन से बुढ़ापा तक
देह की यात्रा
कभी पैदल यात्रा
कभी पटरी पर चलती
रेल की यात्रा
नभ में बादलों के बीच
यान की यात्रा
सागर में
डूबती उतराती यात्रा
कभी दैनिक यात्रा
या फिर साप्ताहिक
मासिक या वार्षिक
समय की पाबंदी पर
बस यात्रा ही यात्रा
क्योंकि करनी है
मुख से पेट तक
भोजन को यात्रा
हर यात्रा में करनी होती तैयारी
बस चूक हो जाती है
अंतिम यात्रा की तैयारी में
जाने कितना कुछ
छोड़ जाते हैं ऐसा
जिसे स्वयं ठिकाने लगाना था
पर अपनी देह को ठिकाने
कोई न लगा सकता
हर आत्मनिर्भर होकर भी
बेबस है
परावलम्बन होना ही है
फिर घमंड किस बात का
इस यात्रा का टिकट तो है
बस तिथि का नहीं पता।
कैसे किस विधि जाना है
रीति का पता नहीं
– ऋता शेखर मधु

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

उम्मीदों के नए सफर में



नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ...

नवगीतों की पुरवाई

नवगीतों की पुरवाई में
नवल आस की कलियाँ चटकी |


किसलय आने को है आतुर
पेड़ों ने झाड़ी है डाली
नव खुश्बू की आशा लेकर
बगिया सजा रहा है माली
फूलों के काँधे चढ़ आई
खुशियों की सोंधी सी मटकी |


बीते वर्षों में बातों की
कहीं नुकीली फाँस लगी हो
नवल गगन में वही चाँदनी
शायद मधुरिम और सगी हो
नीलकंठ ने अमृत देने
नन्ही गरल- बूँद है गटकी |


कर्मों के जो वीर बने हैं
तम भी उनसे घबराता है
उमंगों भरी हर चौखट को
गम दूर से हाथ हिलाता है
छल प्रपंच की झूठी पटरी
प्रीत दिवानों को है खटकी |


उम्मीदों के नए सफर पर
हर्ष भरा जो झोला टाँगे
छींट चले हैं स्वप्न-बीज को
झिलमिल जुगनू ने जब माँगे
द्वार- द्वार भी थिरक उठे हैं
तोरण में जूही है लटकी |


आएँगे अब रंग बसंती
फूलों की चौपाल सजेगी
मटकेगी सरसों दुल्हनिया
नए वर्ष के गीत बजेंगे
उठ चुकी डोली बहार की
हौले से फुनगी पर अटकी |
—-ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

चैत्र माह-हिन्दू नवसंवत्सर-होली के संग


धरती को रंगों से भर दें
सबके माथे खुशियाँ जड़ दें
घोलो अब रंग

गुझियों की जो टाल लगाएँ
सबका मन मीठा करवाएँ
प्रीत भरा लेकर आलिंगन
शिकवे कोसों दूर भगाएँ
झूम जाएँ सारे हुरियार
पीसो अब भंग

आम्रकुंज में बौर जो महका
गूंज उठे कोयल के राग
समय न देखे उम्र न देखे
किलक उठे रंगीले फाग
देखो बोल रहा त्योहार
छू लो अब चंग

धरती पर जब उड़े गुलाल
हो जाता है अम्बर लाल
मस्त हुए हैं पवन झकोरे
झुक झुक जाती है डाल
भरकर अपनी पिचकारी
हो लो अब संग

भाव भरी सुन्दर बोली हो
सबके हिस्से शुभ होली हो
सजे रहेंगे रिश्ते प्यारे
गरिमा में हँसी ठिठोली हो
मिल जाएँ हाथों से हाथ
छोड़ो अब जंग

@ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

समय कठिन है

 












समय कठिन है

क्या कुंठा या क्या गिला
जो मिलना था वही मिला
मन को खुशियों से भर लो
समय कठिन है

किसने किसको क्या- क्या बोला
शब्द शब्द किसने है तोला
मन को अब तो पावन कर लो
समय कठिन है

जिन बन्धु की याद हो आती
उनको झट से लिख दो पाती
या फिर डायल नम्बर कर दो
समय कठिन है

यदि बाकी है इच्छित काम
आरम्भ करो कहकर के राम
बाँध लो अब दुआ के धागे
समय कठिन है

समझौते भी होते अच्छे
कर लेते हैं दिल के सच्चे
झूठे अहं की तोड़ो दीवार
समय कठिन है

कोविड की कैसी अनहोनी है
कौन साँस अंतिम होनी है
मन में रच लो मोहक संसार
समय कठिन है
@ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

चाँद-चाँदनी

 चाँद- चाँदनी...


चंदा की तुम चाँदनी, झरती सारी रात।

गगन अनोखा दे रहा, धरती को सौगात।।1


देख अमा की रात को, नहीं मनाना शोक।

घट-बढ़ ही है जिन्दगी, सीखे तुमसे लोक।।2


रूप रुपहला है मिला, लगते वृत्ताकार।

सूरज से रौशन रहे, लेकर किरण उधार।।3


तुमसे मनता चौथ है, तुम करवा त्योहार।

जग को तुम आशीष दो, मिले सभी को प्यार।।4


व्यथित हुई है चाँदनी, जाओ उसके पास।

क्यों छुपे अमा की रात में, क्यों करते परिहास।।5


जिस सूरज की रश्मियाँ, रखते अपने पास।

ग्रहण बने कृतघ्न तुम , देते हो संत्रास।।6


चन्द्र सलोने कृष्ण के, शायर के महबूब।

माँ की लोरी तुम बने, भाते सबको खूब।।7


बुढ़िया काते सूत जब, कट जाती है रात।

तन्हाई को बाँटकर, करते हो तुम बात।8


कहीं स्वप्न के पृष्ठ हो, कहीं किसी के राज।

गुड़िया के मामा बने, प्यारा हर अंदाज।।9

....ऋता शेखर

स्वप्न

तुम जब तक दूर हो

आँखों का नूर हो

तुम्हारे पूरा होते ही

तुम हकीकत हो जाओगे

तब फिर से उगेगा एक स्वप्न

फिर से परियों को पँख मिलेंगे

फिर से एक सफर का आगाज होगा

तब हकीकत बन गए स्वप्न तुम

सम्भाल लेना वह कहानी

जिसमें बिता दी हमने ज़िन्दगानी।

कल्पना का घोड़ा 

सपनों के तांगे में बैठ

गया है चाँद के पास

नटखट चाँदनी

झूला झुलाती हुई

उसे बहला रही ।

तारे भी आ गए 

सब हो गए हैं मगन 

स्वप्नों के आसपास

सब के नए स्वप्न हैं

सबका है नया आकाश।

*****

चाँद रोता है

धरती भी भीगती है

कभी भोर होते ही

हरे घास की कालीन पर

चलकर तो देखना

कभी 

हरसिंगार की पंखुड़ियों को

सहलाकर देखना

@ ऋता शेखर मधु


रविवार, 21 फ़रवरी 2021

माँ की माँ

 एक  माँ

जो बन चुकी होती है

माँ की भी माँ

मतलब

माँ बन चुकी बहू बेटी की माँ

जी लेती है 

अपने बच्चों का बचपन

अक्सर मिलाती है 

उस समय को इस समय से

जब आज की माएँ

कड़ी आवाज में भी

बच्चों को कुछ नहीं कहतीं

उसे याद आता है

अपना उठा हुआ हाथ

जो उठते थे देर तक सोने के लिए

समय पर पढ़ाई के लिए नहीं बैठने पर

जब वह देखती है 

नाती पोतों के नखरे 

उसे याद आती है

दूध रोटी

या लौकी पालक

जिसे खिलाकर ही छोड़ती थी

जब वह देखती है

बस एक डिमांड पर

नई कॉपी 

नए जिओमेट्री बॉक्स आते

उसे याद आता है

एक ही किताब को सम्भालना

जो काम आते थे छोटे को

दो या चार बार पहने गए

बच्चों के नए कपड़े

जब किनारे धर देती हैं बेटियाँ

तब माँ की माँ याद करती है

होली के कपड़े

दशहरे तक चलते हुए

पैसे तब भी थे

किन्तु साथ ही होते थे 

संयुक्त परिवार

नए बनाने हों तो

सभी के बनेंगे

यह अवधारणा जोड़ती थी

रिश्तों को, परिवार को

वह माँ की माँ

आंखों पर हाथ धरे आज भी

जाने क्या क्या ढूँढती है

उसके अनुभव

या तो हँसकर टाल दिए जाते

या शिकार हो जाते उपेक्षा के

वह माँ की माँ

आज भी समझौते कर लेती है

नए जमाने की माँ से

लेती नहीं है पंगा

उसकी हाँ में हाँ मिलाती

चुपके से देती है अपने सुझाव

बाद में जब मिलती है शाबासी

वह देती है एक सहज मुस्कान

मन ही मन बोलती हुई

ओल्ड इज गोल्ड बेटा 😊

ऋता.....

शनिवार, 19 सितंबर 2020

हिन्दी पखवारा की रचना -1-दो का महत्व

हिन्दी पखवारा की रचना -1










दो का महत्व
-------------------
दोनों तट गर मिल जायें
नदिया बहेगी कैसे
अगर नहीं हों सुख दुःख
जीवन चलेगा कैसे
ओर छोर के बीच में
धागे का अस्तित्व है
पति पत्नी के मध्य मनु
अटका स्वामित्व है
दिन रात जो चलें न साथ
तिथि नहीं बदलेगी
तर्क वितर्क के बिना कहाँ
नवकली करवट लेगी
होते हैं धरती आकाश
सजीव तभी पलते हैं
पतझर को देख देख
बसन्त बाग में चलते हैं
दिल दिमाग जब साथ हों
भाव झर झर फूटें
रूठ जाए जो एक कभी
घर जाने कितने टूटें
जन्म मृत्यु का तथ्य पहचानें
दो का महत्व तभी हम जानें
-----
हिन्दी अंग्रेजी के बीच में
क्यों अंग्रेजी का वर्चस्व सहें
हिन्दी के अपने सारतत्व हैं
मिलकर हम सब महत्व गहें
हिन्दी बोलें अभिमान से
कलम चलाएँ बड़े शान से
भाषा को मर्यादित रख
खूब रचें अरमान से।
---ऋता
हमारी भाषा हमारा अभिमान
सभी हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी पखवारा की हार्दिक शुभकामनाएं!!

रविवार, 23 अगस्त 2020

ड्रैगन को देना है मात

मानचित्र पर बिछी बिसात,
ड्रैगन को देना है मात।
सीमा से है उठी पुकार,
देना अपना सब कुछ वार।

भू भारत का लेगा छीन,
ऐसी सोच न पाले चीन।
बढ़ते पग देंगे हम रोक,
सीमा पर ही देंगे ठोक।

रखकर के नीयत में खोट,
जो भी पहुँचायेगा चोट।
शूरवीर कर देंगे वार,
फिर तो होगी उसकी हार।

हुई मित्रता में जब गैप,
हटा दिए हैं चीनी ऐप।
तोड़ दिए सारे सामान,
देंगे नहीं तुम्हें सम्मान।

अपना भारत बड़ा महान,
दुनिया में है इसकी शान।
प्यार निभाने की है रीत,
मिलन भाव के रचता गीत।

@ऋता शेखे मधु

बाढ़


Weather Update: 30 killed due to lightning in Bihar heavy rain ...
बाढ़ से भयावह स्थिति: प्रभावित ...
एक सुनहरी रेखा खींच
चपल दामिनी नभ के बीच
नभ-वसुधा से रिश्ता जोड़
सघन कालिमा देती तोड़|
ले आती बारिश की धार
जिसमें हुलसे घर संसार।
समझ न पाती वह यह बात
बाढ़ बुलाती अति बरसात।


नदियाँ रूप धरें विकराल
हहराती सी उनकी चाल।
सुरसा सम होतीं बेताब
लहरें लिखतीं नई क़िताब।
जाने क्या क्या लेतीं लील
बुझते खुशियों के कंदील।

कृषक स्वप्न को देकर मात
बाढ़ बुलाती अति बरसात।
तीव्र वेग से देकर जोर
आकर नीर मचाते शोर।
तटबन्धें होतीं लाचार
खिसक गिरें उनकी दीवार।

सर सर बढ़ते जाते पाँव
पानी में डूबे हैं गाँव।
सर्प निकल करते आघात
बाढ़ बुलाती अति बरसात।
बह जाते हैं फसल मकान
मिट जाते कितने अरमान।

ले नेता को उड़े विमान
जनता देख हुई हैरान।
राहत के थोड़े सामान
चैनल पर करते गुणगान।
बेघर होकर मिले न भात
बाढ़ बुलाती अति बरसात।

@ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 19 जून 2020

ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है-गीत


Air Definition in Science

खुशबुओं की पालकी से शुभ्रता को पा रही है।
पुष्प का उपहार पाकर तू बहुत इतरा रही है।
ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है।।


चाहते जिसको सभी वह रूप तेरा है बसंती,
झूमती हर इक कली का है बना अनुबंध तुझसे।
डालियाँ घूमीं उधर जाने लगी तू जिस दिशा में,
मंद शीतल जब हुई तू है बना संबंध तुझसे ।


प्रेम से सुरभित बनी तू प्रेम ही दिखला रही है|
पुष्प का उपहार पाकर तू बहुत इतरा रही है।
ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है।।


गर्म दिनकर जब हुए तू क्यों अचानक बौखलाई ,
ताप की आँधी चली तो जंग सी छिड़ने लगी क्यों?
चाल पर से खो नियंत्रण नाचती बनके बवंडर ,
हर दिमागी सोच से फिर भावना भिड़ने लगी क्यों?

रेत पर तू बावरी बन किस पिया को पा रही है|
पुष्प का उपहार पाकर तू बहुत इतरा रही है।
ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है।।

जो धुआँ लेकर चली है नफ़रतों से है भरी वह,
छोड़कर हर कालिमा तू बादलों को ला धरा पर|
तू न होगी तो जगत सुनसान मरघट ही बनेगा,
बुझ चुकी जो लौ दिलों में फूँक कर उनको हरा कर||

शुभ हवन की अग्नियों से साधना महका रही है|
पुष्प का उपहार पाकर तू बहुत इतरा रही है।
ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है।।


पतझरों में ढेर लगती सरसराती पत्तियों की,
कर रही हैं शोर देखो दर्द से भीगी शिराएँ|
मित्र बनकर ऐ पवन बस थाम ले उनके बदन को,
बैठकर कुछ देर सुन ले ठूँठ से उनकी व्यथाएँ||

तू सहेली सी बनी है वेदना सहला रही है|
पुष्प का उपहार पाकर तू बहुत इतरा रही है।
ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है।।

@ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 18 जून 2020

हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो-गीत


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(हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।)


हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
आद्या जया दुर्गा स्वरूपा, शक्ति का आधार हो।
*
शिव की प्रिया नारायणी, हे!, ताप हर कात्यायिनी।
तम की घनेरी रैन बीते, मात बन वरदायिनी।।।
भव में भरे हैं आततायी, शूल तुम धारण करो।
हुंकार भर कर चण्डिके तुम, ओम उच्चारण करो।
*
त्रय वेद तेरी तीन आखें, भगवती अवतार हो।
हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
*
कल्याणकारी दिव्य देवी, तुम सुखों का मूल हो।
भुवनेश्वरी आनंद रूपा, पद्म का तुम फूल हो।
भवमोचनी भाव्या भवानी, देवमाता शाम्भवी।
ले लो शरण में मात ब्राह्मी, एककन्या वैष्णवी।।
*
काली क्षमा स्वाहा स्वधा तुम, देव तारणहार हो।
हे अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
*
गिरिराज पुत्री पार्वती जब, रूप नव धर आ रही।
थाली सजे हैं धूप चंदन, शंख ध्वनि नभ छा रही।|
देना हमें आशीष माता, काम सबके आ सकें।
तेरे चरण की वंदना में, हम परम सुख पा सकें।।
*
दे दो कृपा हे माँ जयंती, यह सुखी संसार हो|
हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
*
मौलिक , स्वरचित
ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 16 जून 2020

मन पाखी पिंजर छोड़ चला-गीत

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मन पाखी पिंजर छोड़ चला

मन पाखी पिंजर छोड़ चला।
तन से भी रिश्ता तोड़ चला ।।

जीवन की पटरी टूट गयी ।
माया की गठरी छूट गयी ।
अब रहा न कोई साथी है,
मंजिल पर मटकी फूट गयी।।

निष्ठुरता से मुँह मोड़ चला ।
मन पाखी पिंजर छोड़ चला ।।

जीवन घट डूबा उतराया ।
माँझी कोई पार न पाया ।
शक्ति थी पँखों में जबतक,
भर उड़ान सबको भरमाया ।।

ईश्वर से नाता जोड़ चला ।
मन पाखी पिंजर छोड़ चला ।।

लक्ष्य सदा ही पाना होगा ।
जाना है तो जाना होगा ।
कितने जन्मों का फेरा है,
पूछ लौटकर आना होगा ।।

दर्पण को दंभी फोड़ चला ।
मन पाखी पिंजर छोड़ चला ।।

ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 15 जून 2020

दुनिया तो रैन बसेरा है-गीत


9 Key Insights from Adam Grant's 'Give And Take' | Heleo
क्या तेरा है क्या मेरा है
दुनिया तो रैन बसेरा है

क्या तेरा है क्या मेरा है|
यह घर कुछ दिन का डेरा है|
साथ चलेंगे कर्म हमारे,
यह पाप-पुण्य का फेरा है||

मानवता का साथी बनकर,
मिल जाता नया सवेरा है |
दुनिया तो रैन बसेरा है ||१

दुनिया में हर दीन-दुखी को,
गले लगाकर के चलना है|
बिन आँचल के मासूमों को
दूजे की गोदी पलना है ||

बुरी बला से बचे रहेंगे
आशीषों का जब घेरा है
दुनिया तो रैन बसेरा है ||२

पूजा में नत होकर देखो |
कर्मों में रत होकर देखो |
दुआ मिलेगी दुखियारों से,
उनके घर छत होकर देखो ||

अपने सारे जाल समेटो
आया संझा का बेरा है
दुनिया तो रैन बसेरा है ||३

मौलिक, स्वरचित
ऋता शेखर ‘मधु’