उधेड़बुन
"जब से न्यायालय का निर्णय आया है
मन पर उधेड़बुन का गहरा साया है
यह उधेड़बुन निर्णय पर नहीं,
नाम पर है क्योंकि नाम है 'इच्छा मृत्यु'"
"मगर नाम पर उधेड़बुन कैसा है? "
"मरने वाला अपनी इच्छा व्यक्त नहीं कर पाया।
उसकी इच्छा का कहीं जिक्र न आया।
अस्पताल में जीवन मिलता है
परिजनों का चेहरा खिलता है।
उसे मृत्यु देने के लिए
जीवनदायिनी यंत्र हटाये गए
भोजन पानी घटाए गए।
वह बेबस बोल नहीं पाया
उसकी तंत्रिकाओं पर था
शिथिलता का साया।
पर उसे महसूस तो होता होगा
मन ही मन वह भी रोता होगा।"
"यह निर्णय तो परिवार का है
उनके थके हुए संसार का है।"
" इसलिए सब कुछ सहज लिया गया।
वेद मंत्रों द्वारा उसको विदा किया गया।"
" मगर बंधु
आज भी मन में एक प्रश्न समाया है।
क्या वृद्धों के लिए भी
इच्छा मृत्यु का समय आया है?"
" यह उधेड़बुन बेमानी है।
जीवन की ये अवस्थाएँ
आनी हैं तो आनी हैं।"
" बंधु ! समझो मेरी बात
धूप छुपे तो आती रात।
वृद्ध बेबस मजबूर हुए
उनके सपोर्ट सिस्टम
उनके बच्चे
घर से कितनी दूर हुए।
रसोई वक्त बेवक्त जगती है
वह भी सगी न लगती है।
तन मन पर भारी असर हुआ है
लगता है जैसे कहर हुआ है।
बदले समय का निर्णय
क्या पारिवारिक विघटन है?
क्या इच्छा मृत्यु के लिए विवश
ये सामाजिक अकेलापन है ?"
प्रश्न तो समय के साथ-साथ
समाधान पा जायेंगे
मगर अभी तो हम
उधेड़बुन में ही जिये जायेंगे।
ऋता शेखर 'मधु'

सही कहा, सचमुच उधेड़बुन है ...हरीश राणा को इच्छामृत्यु मिली पर मन में उधेड़बुन तो बहुत छोड़ गई..
जवाब देंहटाएंदिल को छूती रचना ।