सोमवार, 10 नवंबर 2014

गुनगुनी सी धूप आई


गुनगुनी सी धूप आई
शरद बैठा खाट लेकर
मूँगफलियों को चटकता
मिर्च नींबू चाट लेकर

फुनगियों से हैं उतरती
हौले झूमती रश्मियाँ
फुदक रहीं डाल डाल पर
चपल चंचला गिलहरियाँ

चौपालों पर सजी बजीं
तरकारियाँ, हाट लेकर
गुनगुनाती हैं गोरियाँ
गेहुँएँ औ' पाट लेकर

छिल गईं फलियाँ मटर की
चढ़ी चुल्हे पर घुघनियाँ
क्यूँ होरियों से चल रहीं
ये पूस की बलजोरियाँ

बंधने लगीं लटाइयाँ
मँझे धागे काट लेकर
समेट रहीं परछाइयाँ
आगमन की बाट लेकर

गुनगुनी सी धूप आई
शरद बैठा खाट लेकर
*ऋता शेखर 'मधु'*
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13 टिप्‍पणियां:

  1. पूरे दृश्य को सजीव कर गयी आपकी कविता.....,

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  2. apne gun guni dhup me bin di achchi kavita badhai svikar ho

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (12-11-2014) को "नानक दुखिया सब संसारा ,सुखिया सोई जो नाम अधारा " चर्चामंच-1795 पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. वाह कमाल की कविता कमाल की गुनगुनी धूप।

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  5. chitr ne lalchuwa diya....prastuti kamaaal ki...lajawaab

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  6. क्‍या बात है .... बहुत ही बढिया

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  7. बहुत सुन्दर...उम्दा और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@आंधियाँ भी चले और दिया भी जले

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