चिन्तन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
चिन्तन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 18 जून 2017

प्रतिबिम्ब--कुछ भाव कुछ क्षणिकाएँ

बँधे हाथ

अपने वतन के वास्ते
गुलमोहर सा प्यार तुम्हारा
अनुशासन के कदम ताल पर
केसरिया श्रृंगार तुम्हारा
 

पत्थर बाजों की बस्ती में
जीना है दुश्वार तुम्हारा
चोट सहो तुम सीने पर
पर कचनारी हो वार तुम्हारा

हा! कैसा है सन्देश देश का
चुप रहकर शोले पी लेना
उन आतंकी की खातिर तुम
अपमानित होकर जी लेना।

अच्छी नहीं सहिष्णुता इतनी भी
रामलला को याद करो
कोमल मन की बगिया में
कंटक वन आबाद करो
-ऋता
============================

बुद्धत्व

मंजिल पर शून्य है
रे मन, सफ़र में ही रहा कर

संसार में
रोग क्यों है
शोक क्यों है
बुढ़ापा क्यों है
मृत्यु क्यों है
इस शाश्वत सत्य की खोज में
सिद्धार्थ को बुद्धत्व प्राप्त हुआ।
क्यों है...इसका उत्तर सहज नहीं
और यदि ये सब है ही
तो सहज स्वीकार्यता ही
संसार में बुद्धत्व पाने का सरल मार्ग है
ये मार्ग सरल होते हुए भी सहज नहीं
जीवन में हर मनुष्य इनकी खोज में है
मन का बूद्ध हो जाना भी
शाश्वत सत्य है।
-ऋता

 ===================
प्रतिबिम्ब
 
सागर भी है
तलैया भी
गगन का प्रतिबिम्ब
दोनों में समाया
अशांत लहरो में
गगन भी अशांत सा
तलैये के मौन में
महफूज़ चाँद सितारे
-ऋता
====================

एक सवाल

मनु,
तू कौन है, क्या है?
एक आकार
एक आत्मा
एक भाव
एक सोच
एक मन
एक यात्री
एक रास्ता
एक मंजिल
एक नागरिक
एक धर्म
एक मानवता
एक मोह
एक त्याग
एक अभिलाषा
एक लिप्सा
एक क्रोध
एक भाषा
एक जनक
एक सार
एक तत्व
एक प्रेम
एक विरह
एक भोग
एक विलास
एक क्रिया
एक प्रक्रिया
एक प्रशंसा
एक आलोचना
एक सत्यवादी
एक चापलूस
एक वक्ता
एक श्रोता
एक अभिव्यक्ति
एक पीर
एक हास्य
एक गंभीर

मनु: सुन ले
तू एक व्यक्तित्व हूँ
उपरोक्त सारे गुणों से लबरेज
प्रभु की अनुपम कृति है।

=========================

उम्मीदें

उम्मीदें तो बीज हैं
उनकी अवस्था
सुसुप्त नहीं होती
बार बार अंकुरण
बार बार आघात
फिर भी कोंपल
झाँकने को आतुर
मुरझाने का सिलसिला
जाने कब तक चले
अंकुरण की प्रक्रिया
जारी रहती है
अनवरत
===========================


 ये जरूरी नहीं कि हमारे शुभचिंतक सिर्फ हमारे अपने रिश्तेदार या मित्र ही हों...कई शुभचिंतक वो भी होते है जो राह चलते मिल जाते है...
जैसे जब आप ट्रेन में हो और गंतव्य के पास से गाडी धीरे धीरे गुजर रही हो तब उतरने की चेष्टा करते हुए किसी का टोक देना...
जब फ्लाइट में थोड़े हेवी सामन के साथ आप अकेले हों तब किसी का हाथ बढाकर आपका बैग उतार देना...
जब आप बेध्यानी में पटरी क्रॉस करके प्लेटफॉर्म पर आते हुए उधर से आ रही ट्रेन न देख पाएं हो तो पब्लिक का एक साथ चिल्ला देना...
जब आधे किलोमीटर की दूरी तय करवाकर ऑटो वाले का पैसा न लेना...
और भी बहुत कुछ जो याद रह जाता है और उन अजनबियों को मन बार बार धन्यवाद के साथ दुआएँ भी देता है। यदि आप किसी की मदद के लिए हाथ बढ़ाते है तो बदले में बहुत कुछ अर्जित कर लेते है।

आज उन सभी को धन्यवाद।

 


बुधवार, 30 जुलाई 2014

मधुर गुंजन ब्लॉग की तीसरी वर्षगाँठ पर प्रस्तुति -- संज्ञा हूँ मैं


नारी हूँ मैं , संज्ञा हूँ मैं
जब जब लेखनी उठाती हूँ
तड़प उठती हूँ देखकर
समाज में फैली कुव्यवस्था
दर्द दुख द्वेष छल अत्याचार
व्यक्त करना चाहती हूँ
उन सभी के अंतस को
जो मौन रह सह जाते हैं वह भी
जो नहीं सहना चाहिए
उस वक्त मैं जातिवाचक हूँ

संज्ञा हूँ मैं
एक नागरिक की तरह
देशभक्ति के गीत लिखती हूँ
सरहद पर सैनिकों की
भावना व्यथा महसूस करती हूँ
प्रान्तीय झगड़ों में
निर्दोष रक्त-धार देखती हूँ
देश हित से अधिक
निज हित में लिप्त
इंसानों की कतार देखती हूँ
कर्तव्य से अधिक
अधिकार के नारे सुनती हूँ
अपने वतन के लिए स्थानवाचक हूँ

संज्ञा हूँ मैं
नारी के कई किरदार हूँ
उम्र के हर मोड़ पर
मेरी सोच, मेरे निर्णय पर
दूसरों के अधिकार हैं
टूटे सपनों के किरचें चुनती
मुस्कुराती रहती हूँ सबके लिए
आहत मर्म जब बनते मेघ
नयन सावन बन जाते हैं
चाहतों की कश्ती सजाती
शब्दों के साहिल पर
अनुभूतियों का भाववाचक हूँ

संज्ञा हूँ मैं
महीने भर की रसोई के लिए
सूचि बनाती हूँ
दूध धोबी के हिसाब लिखती हूँ
दुकानों में सेल देख ठिठकती हूँ
सब्जियों के मोलभाव करती
भिंडी टमाटर चुनती हूँ
‘जागो ग्राहक जागो’याद करके
खराब सामान वापस कर देती हूँ
बैंकिंग से ए टी एम तक
इन्कम टैक्स से लेकर रिटर्न तक
बखूबी लेखनी चलती है
तब खुद को द्रव्यवाचक पाती हूँ

संज्ञा हूँ मैं
नारी होने पर गर्व है
अपनी परम्पराएँ संस्कार
जी जान से निभाती हूँ
सहन शक्ति तो बला की है
पर नियम विरुद्ध चलने वालों को
अच्छा खासा पाठ भी पढ़ाती हूँ
किसी की हजार बातें सह लूँ
पर मान पर आघात करने वाले
असभ्य अपशब्द बिल्कुल नहीं
उस वक्त स्वाभिमानी बनी
व्यक्तिवाचक में ढल जाती हूँ
मैं पूर्ण संज्ञा बन जाती हूँ||

ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

अहसास का साथ

छंदमुक्त रचना....

अहसास का साथ
---------------------

एकांत में रहने वाले मनु
कभी सोचा है गहराई से
क्या वाकई तुम अकेले हो?

नहीं, बिल्कुल भी नहीं
साकार न भी हो कोई
मगर हम सभी मनुष्य
किसी न किसी घेरे में रहते हैं|

कभी खुशियों की गोद में
कभी गमों की नदी में
कभी यादों में डूबे हुए
कभी भविष्य संजोने में

निरंतर साथ होता है
कोई न कोई एहसास
हर समय हर जगह
फिर क्यों रोते हौ भाई!

यदि सामने बैठा हो कोई
तब भी तुम अकेले हो
सामने वाला नहीं समझता
तुम्हारी इच्छाओं को
तुम्हारी भावनाओं को
क्या कहलाएगा यह??

प्रभु के आभारी हैं हम
दिया है उसने तन में मन
वह कभी किसी को भी
एकाकी नहीं होने देता

संवाद के लिए हमेशा
होठों का हिलना जरूरी नहीं
मन के भीतर के संवाद
हल दे जाते हैं
जटिल समस्याओं के
खुद ही करते सवाल
खुद जवाब देते रहते
फिर बोल रे मनु!
तुम अकेले कहाँ हो???
फिर अकेलेपन की शिकायत कैसी...
दुआ करो कि अहसास का साथ न छूटे कभी
................ऋता

गुरुवार, 13 जून 2013

ऐ समंदर...


पूनो की रात आती जब
समंदर क्युँ मचल जाता है
राज़े-दिल बयाँ करने को
वह भी तो उछल जाता है
खामोश चाँद ने कुछ कहा
फिर से वह बहल जाता है
कभी बहाने से सैर के
लहरों पे निकल जाता है
सुनने प्रेमी दिल की व्यथा
कूलों पर टहल आता है
करुण कहानी मुहब्बत की
सुनकर वह पिघल जाता है
समेट अश्कों की धार को
खारापन निगल जाता है

ऐ समंदर, तेरी गहराइयाँ
बेचैन बहुत करती हमें
मन मनुज का भी तो
तुझसे कम गहरा नहीं
लहरें बहुत उठतीं वहाँ भी
शांत धीर तुझसा ही वह
तेरी तरह ही तो वहाँ भी
बाँध का पहरा नहीं

पर सुनामियाँ भी कब भला
किसके रोके से रुकी हैं ???
..........ऋता..

शनिवार, 18 अगस्त 2012

अंगूर खट्टे हैं




जाने अनजाने
कई सपने
हमारे इर्द-गिर्द
मँडराने लगते हैं
कुछ सपने
जो हमारी पहुँच में होते हैं
उन्हें पूरा करने के लिए
हम जी जान लगा देते हैं
पर जरूरी तो नहीं
सब कुछ
प्राप्य की ही श्रेणी में हो
अथक प्रयासों के बावजूद
कुछ सपने पूरे होने के
आसार नजर नहीं आते|

लोमड़ी जानती थी
वह अंगूर नहीं पा सकती
तो उसने कह दिया
अंगूर खट्टे हैं
नर्तकी जानती थी
वह अच्छा नाच नहीं सकती
उसने आँगन को ही टेढ़ा कहकर
राहत की साँस ली
तो दो जुमले बने
अंगूर खट्टे हैं
नाच न जाने आँगन टेढ़ा
इनका प्रयोग हम
किसी का मखौल उड़ाने के लिए ही करते हैं

अब इस तरह से सोचते हैं
परिश्रम किया
फल मिला तो ठीक है
सफल न हुए
तो अंगूर को खट्टा, या
आँगन को टेढ़ा कहने में
हर्ज़ ही क्या है
यह कहकर हम
इस अपराधबोध से
मुक्ति तो पा सकते हैं
कि हम इस काबिल ही नहीं कि
अपने सपने पूरे कर सकें
दार्शनिकता का यह निराला अंदाज
हमें कभी निराश नहीं होने देगा|

ऋता शेखर मधु 

 

शनिवार, 14 जुलाई 2012

सत्य का तेज



एथेंस का सत्यार्थी
उसने जब सत्य को देखा
आँखें चौंधिया गई थीं उसकी
यह कहानी
तब सिर्फ
पढ़ने के लिए पढ़ लेती थी
गूढ़ता समझने की शक्ति नहीं थी
आखिर सत्य
इतना चमकीला हो सकता है क्या
कि कोई उसे देख न सके
देखना चाहे तो
न चाहते हुए भी
नजरें मुंद जाएँ|

कुछ अनुभव
कुछ लड़ाई थी
सच झूठ की
तब यह जाना
सत्य का तेज
वास्तव में
सूर्य का तेज है
भले ही बादलों का
झूठ का
आवरण पड़ जाए
सत्य उसके पीछे छुप जाता है
किन्तु जब भी वह झाँकेगा
प्रकाश-पुँज से परिपूर्ण
उसका तेज
आँखें चौंधिया देगा|
सूर्य पर ग्रहण लगता है
ढका है
तब तक तो ठीक है
जब वह
ग्रहण के ग्रास से निकलता है
कोई भी
उस तेज को देखने में समर्थ नहीं
तभी तो
एक्स रेप्लेट की जरूरत पड़ती है|

सत्य भी उसी शान से
चमकता हुआ
बेधड़क आता है
झूठ ने उसे
कितना भी डराया हो
डर की पराकाष्ठा
सत्य को निडर बना देती है
नजरें तो
झूठ को ही झुकानी पड़ती हैं
स्वाभिमानी सत्य
ऊँची नजर से
मुस्कुराता हुआ
परचम लहराता हुआ
वही शाश्वत गान गा उठता है
सत्यमेव जयते !!!

ऋता शेखर मधु

मंगलवार, 19 जून 2012

नेकी कर दरिया में डाल




बुजुर्गों ने कहा है...
नेकी कर दरिया में डाल
ठीक है,
बात मानने में हर्ज ही क्या है
की गई नेकियाँ
गहरे पर पैठ गईं
अचानक
दरिया उलीचने की बारी आ गई
क्यों????
कृतघ्नों की लाइन लगी थी...
नेकियाँ देखे बिना
वे मानने वाले नहीं थे***
        ऋता शेखर मधु

मंगलवार, 15 मई 2012

'डेज़' से भरी टोकरी




सुबह सुबह
अलसाई सी आवाज़
मम्मा, आज कौन सा डे है
आज सन्डे है,अभी सो जाओ
वो वाला डे नहीं
स्पेशल वाला डे
ओ,अभी मालूम नहीं
सर्च करके बताती हूँ


डे डे डे
हर दिन मनता
कोई न कोई 'डे'
डे मनाने के पीछे
मानसिकता होती है
उसे बढ़ावा देने की
या उससे निजात पाने की
अर्थात् हर ''डे''
उनके नाम
जो आते हैं
''निरीह' की श्रेणी में

'विमेन्स डे'
महिला मतलब निरीह
'डाटर्स डे'
बेटियाँ मतलब निरीह
'मदर्स डे'
यह भी महिला
सम्माननीय
'चिल्डरेन्स डे'
बच्चों को 
संरक्षण की आवश्यकता
'एनवायरोन्मेंट डे'
पर्यावरण भी
इंसानो के कारनामों से
बन गया निरीह
आजकल हँसने की गुंजाइश नहीं
निरीह हँसी के लिए
''लाफ्टर्स डे''
प्यार जताने का समय नहीं
'वैलेन्टाइन्स डे' है ना!
बच्चों को बचाना है
खतरनाक श्रम से
'चाइल्ड लेबर डे'
एक दिन की बैठक
फिर बच्चे वहीं के वहीं
चौकलेट डे
स्लैप डे
हग डे
रोज़ डे
टेड्डी डे
फ्रेंडशिप डे
मतलब डे ही डे

पुरुष होते बलवान
इसलिए है नहीं
कोई भी डे
उनके नाम
किन्तु जब बनते
पति और पिता
वे भी होते निरीह
अर्थात्
'हस्बेन्ड्स डे'
'फादर्स डे'
:):):)

ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 1 मई 2012

हे मर्यादापुरुषोत्तम...





हे श्रीराम
हे मर्यादापुरुषोत्तम
तुम तो रोम रोम में बसे हो
पर कभी कभी
तुम पर बहुत गुस्सा आता है
बेतुकी लगी न यह बात!
क्योंकि तुम प्रभु हो
प्रातः स्मरणीय हो
आराध्य देव हो
देव से गुस्सा कैसा!!
शिकायत कैसी!!!
पर गुस्सा तब आता है
जब सोचती हूँ
सीता के बारे में|

आदर्श पुत्र बनकर के
तुमने वनवास स्वीकार किया

चौदह वर्ष के विकट काल में
तुम अकेले वन में न भटको
तुम्हे साथ देने की खातिर उसने
सब सुखों का त्याग किया था
हे राम,
आखिर क्यों उस अनुगामिनी का
तुमने यूँ परित्याग किया था?

अशोक वाटिका में बैठी बैठी वह
नजरें नीची कर अड़ी रही
तुम्हारा नाम ही जपती जपती
दिन- रात वह पड़ी रही थी
हे राम,
आखिर क्यों बेकसूर होकर भी वह 
अग्नि के बीच खड़ी हुई थी ??

तुम तो सीता को जीत लाए थे
सहगामिनी को फिर से पाकर
मन में खूब हरषाए थे
जानकी ने तुम्हारे शौर्य को
सदा ही नमस्कार किया था
हे राम,
किस मर्यादा की खातिर तुमने
फिर उसका तिरस्कार किया था ???

तुम्हारा कुलदीपक संजोए
जननी बनने को वह तत्पर थी
जब तुम्हारा साथ पाने का
उसको पूर्ण अधिकार था
हे राम,
किसे प्रसन्न करने की खातिर तुमने
उस ममतामयी का बहिष्कार किया था ????

नन्हे पुत्रों की किलकारी सुनने को
क्या कभी तुम्हारा मन नहीं ललचाया
लघु पादप को सींचने में
सीता ने बहुत सितम उठाया 
हे राम,
क्यूँ पिता बन कर भी तुमने
जिम्मेदारियों को नहीं निभाया ?????

हे राम,
तुम अन्तर्र्यामी थे
तुम्हें मालूम था
सीता के साथ अन्याय हुआ था
तुमने और सीता ने तो
सिर्फ मानव स्वभाव चित्रित किया था
सीता ने भारतीय नारी के अनुगामिनी स्वभाव को
और तुमने.................................???

ऋता शेखर मधु’   



मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

मन का मेटाबॉलिज़्म


खाने की मेज पर
थालियाँ लगी थीं
सजे थे उनमें
भाँति भाँति के व्यंजन
चावल पड़े थे
दो-एक रोटियाँ भी
कटोरी भर दाल
हरी सब्जियाँ भी
मनभावन रायता
चटपटे अचार भी
पापड़ सलाद
थोड़ी स्वीट डिश भी

ये सारे खाद्य पदार्थ
पेट में जाने थे
अकेला पेट
इतने सारे क्लिष्ट भोजन
इन्हें रक्त में समाना था
इसलिए विरल को सरल बनाना था
ठोस को तरल सा बहाना था

हमारा मन भी तो
पेट जैसा ही है
वहाँ भी परोसे जाते
भाँति भाँति प्रकार की
संवेदनाएँ
कड़वे या मीठे बोल
मार्मिक या मनभावन दृष्य
कठोर या स्नेहिल स्पर्श
पर ये मन
क्यूँ आत्मसात् नहीं कर पाता
क्लिष्ट संवेदनाएँ
पेट की तरह
क्यूँ हम नहीं बना पाते इन्हें
इतना सरल तरल कि
ये मन पर भार न छोड़ें
क्या मन का मेटाबॉलिज्म इतना कमजोर है ?

ऋता शेखर मधु


मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

मनवाँ उनका थिरक रहा...





मनवाँ उनका थिरक रहा
मिल गया इस लोक में
वो पथ
जिसे
किसी ने
सजाया सँवारा
सुवासित फूलों को बिछाया
बस कदम धर चल दिए
श्रम के मोती जरा न बहे

खुश किस्मत हैं वो
मिल जाते जिन्हें
बने बनाए रास्ते
किन्तु उस पथ की तो सोचो
जो ले जाएँगे उस लोक
उसे तो स्वयं ही है सजाना
सुकुसुमित विचार है बिछाना
सद्‌भावों के इत्र छिड़क
प्यार की गंगा है बहाना
उस पथ का हमराही न कोई
बस साथ चलेंगे
अपने ही कर्म अपने ही धर्म
निश्छलता और निःस्वार्थता
स्वर्ग द्वार के दो पट नाम
इन्हें यहाँ है अपनाना
फल वहाँ है पाना|

ऋता शेखर मधु

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

हे प्रभु! उन्हें माफ कर...





हे प्रभु!
हे यीशु!
सदियों पहले
आवाज़ उठाई थी तुमने
अंधविश्वास के ख़िलाफ़
और ठोक दिए गए थे
कीलों से
सलीब पर,
तुम प्रभु थे
तुम्हें मालूम था
आने वाले समय में
हर वो मनुष्य ठुकने वाला है
जो आवाज उठाएगा
अराजकता के खिलाफ़
बेईमानी के खिलाफ़
हिंसा के ख़िलाफ़
झूठ के ख़िलाफ़
सलीब पर चढ़ा
वो कुछ कर न पाएगा
क्योंकि
सच्चाई विनीत होती है
ईमानदारी नम्र होती है
नैतिकता सर झुकाए रहती है
उनके पास वो गरल नहीं
जो सज़ा दे पाए
वो भी हाथ जोड़े
सिर्फ़ यही दोहराएगा
हे प्रभु ! उन्हें माफ़ कर!
उन्हें माफ़ कर!

ऋता शेखर मधु

गुरुवार, 8 मार्च 2012

तेरे नयन हैं गीले क्यों!-महिला दिवस पर




नारी,
तू अति सुन्दर है;
अति कोमल है;
सृष्टि की जननी है तू|
उम्र के हर पड़ाव पर किन्तु
तेरे नयन हैं गीले क्यों?

ओ गर्भस्थ शिशु बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘माता दिखाना ना चाहे दुनिया
दोष यह है, में हूँ एक कन्या ’’

ओ नवजात कन्या बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘पा सकी न स्नेह आलिंगन
समझते हैं सब मुझको बंधन’’

ओ नन्ही सी गुड़िया बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘भइया खाता है दूध और मेवा
मैं खाती हूँ सूखा कलेवा’’

ओ छोटी सी बालिका बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
 ‘‘पढ़ना चाहती हूँ पुस्तक मोटी
सेंकवाते हैं सब मुझसे रोटी’’

ओ चंचल किशोरी बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘मन है छोटा सा छोटी सी आशा
अनुशासन से होती है निराशा’’

ओ कमनीय तरुणी बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
 ‘‘ख्वाबों की दुनिया रंग रंगीली
कहते हैं सब मुझको हठीली’’

ओ प्यारी सी पुत्री बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘मैं भी तो हूँ उनकी जाई
फिर क्यूँ वो समझें मुझे पराई’’

ओ सजीली बन्नो बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
 ‘‘लागे है प्यारा मेरा साजन
पर छूटेगा घर और आँगन’’

ओ जीवन की संगिनी बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
 ‘‘मैं चाहूँ सबको खुश रखना
कोई मुझको समझ पाए ना’’

ओ घर की बहुरानी बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
 ‘‘दिन भर करती मैं सारे काम
ताने सुन सुन जीना है हराम’’

ओ आज्ञाकारिणी पत्नी बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘सुख दुख को लेती मैं बाँट
फिर भी सुननी पड़ती है डाँट’’

ओ ममतामयी जननी बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
 ‘‘सारे दर्द तो मैंने सहे
नाम पिता का ही क्यों चले’’

ओ बच्चौं की अम्मा बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
 ‘‘उनके लिए मैं सोचूँ दिन रात
मन की करें चलाते अपनी बात’’

ओ रोबीली सासू बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘बड़े प्यार से परपुत्री अपनाई
करती है सारे जहाँ में बुराई’’

ओ अशक्त वृद्धा बोल
तेरे नयन हैं गीले क्यों!
‘‘मेरी बोली मन को न भाए
सबका निरादर सहा नहीं जाए’’

इससे आगे की बातें अगले पोस्ट में...
ऋता शेखर मधु