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शनिवार, 19 सितंबर 2020

छन्न पकैया

छन्न पकैया

छन्न पकैया छन्न पकैया, बिटिया घर का गहना।
लगती है गुड़िया सी प्यारी, भाई का है कहना।।१

छन्न पकैया छन्न पकैया, खूब खिले गुलमोहर।
कान्हा जी के आ जाने से, गूँज उठा है सोहर।।२

छन्न पकैया छन्न पकैया, कोई नहीं भतीजा।
बुरे काम का सदा रहेगा,जग में बुरा नतीजा।।३

छन्न पकैया छन्न पकैया, जागी जनता सारी |
चंचल जिद्दी कोरोना पर, मास्क पड़ा है भारी ।।4

छन्न पकैया छन्न पकैया , सूई में है धागा |
देख पुलिस का मोटा डंडा, चोर निकल के भागा || ५

छन्न पकैया छन्न पकैया, देखी सारी दुनिया |
सब पर भारी पड़ती है, पढ़ती लिखती मुनिया ||६

छन्न पकैया छन्न पकैया, सच हरदम है जीता |
उसके घट मे भरा है अमृत, घड़ा झूठ का रीता ||७

छन्न पकैया छन्न पकैया, हाथी हो या पेंग्विन |
बोलो कैसे बच पाओगे, किया कभी हो जब 'सिन'||८

छन्न पकैया छन्न पकैया, कौन बजाए बाजा |
चूहों की नगरी इटली में, नीरो फिर से आजा|| ९

छन्न पकैया छन्न पकैया, सुन लो नई कहानी|
आई कंगना के वेश में, फिर झाँसी की रानी ||१०

छन्न पकैया छन्न पकैया, प्यारी लगती पोती|
दादी बचपन जी लेती जब, वह गोदी में सोती ||११
--ऋता शेखर

रविवार, 14 जनवरी 2018

बिसात जीवन की














देखो बंधु बाँधवों,
जिंदगी ने बिछायी है
बिसात शतरंज की
बिखरायी है उसने
मोहरें भाव-पुंज की
श्वेत-श्याम खानों के संग
दिख जाते सुख-दुःख के रंग
प्यादे बनते सोच हमारी
सीधी राह पर चलते हुए
सरल मना को किश्ती प्यारी
तीव्र चतुर दलबदलू ही
करते हैं घोड़ों की सवारी
व्यंग्य वाण में माहिर की
तिरछी चाल विशप कटारी
समयानुकूल वजीर बने जो
चाणक्य नीति के वो पिटारी
सबकी चालें सहता हुआ
बादशाह है हृदय बेचारा
नाप रहा उल्फ़त से पग
कैसे  विजय मिले दोबारा
विषयासक्त अनुरागी को
यह टकराव बना रहेगा
कुछ भी कर लो जेहनवालों
अज्ञानी से ठना रहेगा
पूर्वाग्रह के पिंजरे में बैठे
अजनबी  क्षितिज पर दिखते
हल्की सी भी ठेस लगे तो
यातना के नज़्म लिखते
ऐ जिंदगी,
छलिया बन तूने
हम सबको है नाच नचाया
बाँध के धागे भाव पगे
तूने सबसे रास रचाया
पर समझ लेना यह बात
मात हमें न दे पाएगी
मनु के अंतर्मन की शक्ति
तेरा हर घात सह जाएगी|
चालें चाहे हों जितनी शतरंजी
बस एक निवेदन करती हूँ
उनकी खुशियाँ खोने न देना
जिन रिश्तों पर मरती हूँ|
-ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

दर्द की पूर्णाहुति

मन के अपरिमित वितान पर
बिछे हुए हैं शब्द अथाह
कुछ कोमल कुछ तपे हुए
कुछ हल्के कुछ सधे हुए
अधर द्वार पर टिक जाते
निकल पड़े तो बिक जाते
सरस सौम्य अरु कोमल शब्द
कोई सके न उनको तोल
प्रताड़ित अभिशापित शब्द
सिमट जाते खुद घबराकर
प्रेरित करते ज्ञानी शब्द
बन जाते अनमोल कथन
वर्ण से वर्ण जोड़ चले हो
अभिमानी को तोड़ चले हो

शब्द मूक तभी तक होते
जब तक सोते सुख की नींद
दर्द गंगोत्री बन जाता जब
निकल पड़ती धारा अनेक
शुष्क शब्दों को मिलत
नमी का साथ और
बन जाती है मधुर कविता
प्यारी सी नज़्म
या कोमल राज भरी ग़ज़ल
कुछ प्रेरणादायक छंद
या फिर व्यंग्य
चुभ जाने के लिए
हृदय की कोमल परत पर
बन जाते हैं गहरे निशान
और इसी निशान से रिसती है
रक्तबीज की तरह
एक के बाद एक अभिव्यक्ति
हो जाती है दर्द की पूर्णाहुति|
*ऋता शेखर 'मधु'*

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

लघुकथा....घर


लघुकथा....घर
 वह बहुत खुश थी...उसने राधा-कृष्ण की एक पेंटिंग बनाई थी...दौड़ी दौड़ी माँ के पास गई...माँ,इसे ड्रॉइंग रूम में लगा दूँ...माँ - बेटा इसे तेरी भाभी ने बड़े प्यार से सजाया है...तेरा पेंटिंग लगाना शायद उसे पसंद आए न आए...तू ऐसा कर, इसे सहेज कर रख...अपने घर में लगाना|
शादी के बाद...सासू माँ...इस पेंटिंग को ड्रॉइंग रूम में लगा दूँ?...बेटा...जो जैसा सजा है वैसे ही रहने दो...इसे अपने घर में लगाना|
पति के साथ नौकरी पर...इसे ड्रॉइंग रूम में लगा देती हूँ...
पति-नहीं, अपने बेड रूम में लगाओ या कहीं और...यह मेरा घर है...मेरी मर्जी से ही सजेगा|
पेंटिंग बक्से में बंद हो गया वापस...आज फिर वह उसी पेंटिंग को लिए खड़ी थी...बेटे के ड्रॉइंग रूम में...सोच रही थी...क्या यह घर मेरा है?

.................................ऋता

मंगलवार, 11 जून 2013

कोमल हाथ चुभ गए थे काँच


ताँका........विश्व बाल श्रम दिवस पर-१२ जून

बालक रोया
बस्ता चाहिए उसे
है मजबूर
दिल किया पत्थर
बनाया मजदूर|१|

कोमल हाथ
चुभ गए थे काँच
बहना रोई
भइया आँसू पोंछे
दोनो कचरे बिनें|२|

दिल के धनी
राजा औ' रंक बच्चे
देख लो फ़र्क
एक खरीदे जूता
पोलिश करे दूजा|३|

गार्गी की बार्बी
कमली ललचाई
माँ ने पुकारा
बिटिया, इधर आ
बर्तन मांज जरा|४|

कठोर दिल
कैसी माता है वह
काम की भूखी
बेटी को देती मैगी
कम्मो को रोटी सूखी|५|

........ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 1 मई 2013

मई दिवस

श्रमिकों के अधिकारों की पैरवी करता मई दिवस


मई माह के पहले दिन अर्थात 1 मई को विश्व के लगभग सभी देशों में मई दिवस या श्रमिक दिवस मनाया जाता है. श्रमिकों के काम के घंटों को कम करने और उन्हें अधिकार दिलाने के लिए अमेरिका में एक मुहिम की शुरूआत हुई. धीरे-धीरे यह मुहिम एक आंदोलन में परिवर्तित हो गई और भारत पहुंच गई. अमरीका में तो श्रमिक दिवस मनाने की परंपरा बहुत पुरानी है लेकिन भारत में इसे पहली बार 15 जून, 1923 को मनाया गया. इसके अलावा कई राष्ट्रों और संस्कृतियों में यह दिवस पारंपरिक बसंत महोत्सव के तौर पर भी मनाया जाता है और इस दिन सार्वजनिक अवकाश रखने का भी प्रावधान है.

मई दिवस का इतिहास
अमरीका में शुरू हुआ मजदूर आंदोलन, वहां उमड़े औद्योगिक सैलाब का ही एक हिस्सा था. इसका सीधा संबंध अमरीका की आजादी के लिए चल रही लड़ाई तथा 1860 में हुआ गृहयुद्ध भी था. 19वीं शताब्दी तक पहुंचते-पहुंचते मजदूर संगठन एवं मजदूर यूनियन बेहद मजबूत और अपने अधिकारों के लिए जागरुक भी हो गए थे.
सबसे पहले मजदूरों के जो भी संगठन बने उनमें बुनकर, दर्जी, जूते बनाने वाले लोग, फैक्ट्री आदि में काम करने वाले पुरुष तथा महिला मजदूर प्रमुख थे. अपने अधिकारों की मांग करते हुए मजदूरों ने राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने की भी कोशिश की और वर्ष 1834 में नेशनल ट्रेड यूनियन का निर्माण किया गया.

संगठन से जुड़े मजदूरों ने सबसे पहले अपने काम के घंटे कम करने के लिए संघर्ष किया, जिसमें सबसे ज्यादा योगदान अमरीकी मजदूर ‘तहरीक’ का था. नेशनल ट्रेड यूनियन और अन्य मजदूर संगठनों ने मिलकर यह निर्णय लिया कि 1 मई, 1886 को श्रमिक दिवस मनाया जाएगा. कुछ राज्यों में बहुत पहले से ही मजदूरों के लिए आठ घंटे काम करने का चलन था परंतु इसे कानूनी मान्यता नहीं दी गई थी. इस चलन को पूरी तरक वैधानिक बनाने के लिए पूरे अमेरिका में 1 मई, 1886 को हड़ताल हुई. जिसके बाद पहले जहां मजदूरों को 10 घंटे प्रतिदिन काम करना पड़ता था वहीं अब उनके लिए 8 घंटे निश्चित कर दिए गए.

may day 2भारत में मई दिवस
भारत में मई दिवस पहली बार वर्ष 1923 में मनाया गया जिसका सुझाव सिंगारवेलु चेट्टियार  नाम के एक प्रभावी कम्यूनिस्ट नेता ने दिया. उनका कहना था कि दुनियां भर के मजदूर इस दिन को मनाते हैं तो भारत में भी इसकी शुरूआत की जानी चाहिए. मद्रास में मई दिवस मनाने की अपील की गई. इस अवसर पर वहां कई जनसभाएं और जुलूस आयोजित कर मजदूरों के हितों के प्रति सभी का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया.



आज भी विश्व के सभी बड़े देशों में श्रमिक दिवस या मई दिवस मनाया जाता है. भले ही अलग-अलग राष्ट्रों में इस दिन को मनाने का तरीका भिन्न है लेकिन इसका एकमात्र उद्देश्य मजदूरों को मुख्य धारा में बनाए रखना और उनके अधिकारों के प्रति समाज को और स्वयं उन्हें जागरुक करना है.
जागरण जंक्शन से साभार....

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

जली पतीली का दर्द



जली पतीली का दर्द

ये महिलाएँ भी न
पता नहीं
क्या समझती हैं खुद को,
कभी भी धैर्यपूर्वक
चुल्हे के पास खड़े होकर
दूध नहीं उबालतीं
उन्हें बड़ा नाज है
अपनी याददाश्त पर
पतीले में दूध डाला
उसे गैस पर चढ़ाया
पर वहाँ खड़े होकर
कौन बोर होने का सरदर्द ले
या तो तेज आँच पर ही
दूध को छोड़कर
गायब हो जाती हैं
यह सोचकर
बन्द कर दूँगी न
इधर दूध बेचारा भी क्या करे
उसे आदत है
उबलकर बाहर निकल जाने की
और नतीजा बड़ा सुहाना
हँस-हँस कर गाइए
हम उस घर के वासी हैं
जहाँ दूध की नदिया बहती हैJ

दूसरा विकल्प
गैस की आँच धीमी करो
फिर निकल जाओ गप्पें मारने
अब दूध बेचारा
उबलता रहा
उबलता रहा
आधा हुआ
उसका भी आधा हुआ
उफ! मालकिन अब भी गायब
पतीली ने सारा दूध पी लिया
अब क्या करे
उसने जले दूध की गंध
फ़िजाओं में घोल दिया
फिर रो-रो कर गाने लगी
मैं बैरन ऐसी जली

कोयला भई न राख’…J

.ऋता शेखर 'मधु'