रुख़सत होने वाले अब जाड़े हैं
दरख्तों ने जीर्ण पत्ते झाड़े हैं
आने वाला बहारों का मौसम है
शाखों पर नव कोंपलें मुस्कुराएँगे
घूँघट में छुप चुकी रंगीन कलियाँ हैं
भँवरे भी अब गुनगुनाएँगे
पकृति ने फूलदार चूनर काढ़ा है
ऋतुराज पीत साफ़े में आएँगे
हवाओं ने भी रंगत बदली है
खग भी खुशी से चहचहाएँगे
शुभ्र नभ के नील विस्तार पर
नन्हें तारे भी खूब टिमटिमाएँगे
तितलियों ने रंगीन फ्राक पहने हैं
बच्चे बागों में खिलखिलाएँगे
प्रेमी-जोड़े खुशी से चहके हैं
सपने अँखियों में झिलमिलाएँगे
वीणा शारदे की बजने को है
सुरमयी धुन फ़िजा में लहराएँगे
नव पकृति संग नव गीत लिए
हम भी तो स्वागत में गीत गाएँगे|
ऋता शेखर 'मधु'