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सोमवार, 5 सितंबर 2022

लघुकथा- भविष्यतकाल

 

भविष्यतकाल


'वाह ममा, आज तो आपने कमाल की पेंटिंग बनाई है,' अपनी चित्रकार माँ की प्रशंसा करते हुए तुलिका बोल पड़ी|
'अच्छा बेटा, इसमे कमाल की बात क्या लगी तुम्हें यह भी तो बताओ,' 

ममा ने बिटिया की आँखों में देखते हुए पूछा|
'देखिए ममा, ये जो प्यारी सी लड़की बनाई है न आपने, वह तो मैं ही हूँ| उसके सामने इतनी सारी सीढ़ियाँ जो हैं वे हमारे सपने हैं जो हम दोनों को मिलकर तय करने हैं, ठीक कहा न ममा' तुलिका ने मुस्कुराते हुए कहा|
'बिल्कुल ठीक कहा बेटे, अब इन सीढ़ियों की अंतिम पायदान को देख पा रही हो क्या'ममा ने पूछा|
'नहीं ममा, क्या है वहाँ?'
'वहाँ पर तुम्हारे सपनों का राजकुमार है जो तभी नजर आएगा जब तुम पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जाओगी' ममा ने हल्के अ़दाज़ में कह दिया|
' ममा, जब मैं घोड़े पर चली जाऊँगी तब भी तुम ये सीढ़ियाँ मत हटाना,' एकाएक थोड़े उदास स्वर में तुलिका कह उठी|
'ऐसा क्यों कह रही बेटा,' ममा भी थोड़ी मायूस हो गई|
' यदि मैं खुद गिर गई, या उस राजकुमार ने धक्का देकर गिरा दिया तो मैं इन्हीं सीढ़ियों से वापस लौट सकूँगी, इन्हें हटाओगी तो नहीं न ममा', तुलिका सुबक उठी|
'नहीं बेटा, नहीं हटाऊँगी,' ममा ने तुलिका को गले लगाते हुए कहा|
ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 24 अगस्त 2022

सार गीता का समझकर मन मदन गोपाल कर

2122 2122 2122 212

जो मिला वरदान में वह जन्म मालामाल कर|
मान रख ले तू समय का जिन्दगी संभाल कर ||१

ध्यान हो निज काम पर ही यह नियम रख ले सदा |
बात यह अच्छी नहीं तू बेवजह हड़ताल कर ||२

कर कहीं उपहास तो मनु जाँच ले अपना हृदय |
सामने उस ईश के तू क्यों खड़ा भ्रम पाल कर ||३

त्याग के ही भाव में संतोष का धन है छुपा |
सार गीता का समझकर मन मदन-गोपाल कर ||४

बाँध लेता प्राण को जब मोह का संसार यह |
शुद्ध पावन सद्-विचारी उच्च अपना भाल कर ||५

इस जगत में मान ले तू प्रेम है सबसे बड़ा |
हो न ममता साथ तो कब कौन होगा ढाल पर||६

काट कर वन, घर बसाया खग बिना घर के हुए |
पा गया तू क्या मनुज जब हैं न पंछी डाल पर ||७

@ ऋता शेखर ‘मधु’

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

हे अशोक


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हे अशोक !

वापस आकर
हे अशोक! तुम
शोकहरण
कहला जाओ

लूटपाट से सनी नगरिया
लगती मैली सबकी चदरिया
नैतिकता का उच्चार करो
सद्भावों का संचार करो

प्रीत नीर से
हे अशोक! तुम
जन जन को
नहला जाओ

जितने मुँह उतनी ही बातें
सहमा दिन चीखती रातें
मेघ हिचक जाते आने में
सूखी धरती वीराने में

हेमपुष्प से
हे अशोक! तुम
हर मन को
बहला जाओ

नकली मेहँदी नकली भोजन
पल में पाट रहे अब योजन
झूठ के धागे काते तकली
आँसू भी हो जाते नकली

हरित पात से
हे अशोक! तुम
कण कण को
सहला जाओ

भूमिजा को मिली थी छाया
रावण उसके पास न आया
फिर उपवन का निर्माण करो
हर बाला का सम्मान करो

वापस आकर
हे अशोक! तुम
शोकहरण
कहला जाओ
-ऋता शेखर ‘मधु’
यह रचना अनुभूति के अशोक विशेषांक पर प्रकाशित है...
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गुरुवार, 9 अगस्त 2018

उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन- भक्ति गीत

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जिसने मोर मुकुट किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

अपने मुख से दधि लपटाए
बाल रूप में कान्हा भाए
मात जसोदा लेती बलैंयाँ
नंद मंद मंद मुस्काए

जिसने बैजंती किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

गौर वर्ण की राधा प्यारी
कृष्ण की सूरत श्यामल न्यारी
सदा प्रीत की रीत निभाए
ग्वाल बाल सब हुए बलिहारी

जिसने बंसी धुन किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

कोपित इंद्र जब झुक नहीं पाए
बूँद झमाझम वह बरसाए
अँगुली पर पर्वत को थामे
सबको बा़के बिहारी बचाए

जिसने गोवर्धन किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

बाल सखा को देखके रोए
फटे पाँव वह प्रेम से धोए
पूछें आलिंगन में भर भर
मित्र अभी तक कहाँ थे खोए

जिसने दिल में दया किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

चक्र लिए विष्णु जी आए
कृष्ण रूप में खूब समाए
कुरुक्षेत्र में रण के रथ पर
विकल पार्थ को वह समझाए

जिसने सारथि रूप किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन
जिसने मोर मुकुट किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन
--ऋता शेखर मधु

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

आज मैं...सबका दुलारा कृष्ण हूँ

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आज मैं....

आज मैं
देवकी का दर्द
यशोदा का वात्सल्य
राधिके का प्रेम
रुक्मिणी का खास हूँ

आज मै
वासुदेव की चिंता
नंद का उल्लास
गोपियों का माखनचोर
पनघट का रास हूँ

आज मैं
कंस का संहारक
कालिया का काल
सुदामा का सखा
योगमाया का विश्वास हूँ

आज मैं
द्रौपदी का भ्राता
पार्थ का सारथी
गीता का प्रणेता
युग युग की आस हूँ

आज मैं
सम्पूर्ण ब्रह्मांड लिए
जग का पालनहार
सोलह कलाओं से युक्त
नीला आकाश हूँ

हाँ, मैं सबका प्यारा, दुलारा कृष्ण हूँ|

--ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 4 जून 2016

सुप्रभाती दोहे - 4

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आनत लतिका गुच्छ से, छनकर आती घूप
ज्यों पातें हैं डोलतीं, छाँह बदलती रूप 40

खग मानस अरु पौध को, खुशियाँ बाँटे नित्य
कर ले मेघ लाख जतन, चमकेगा आदित्य

दुग्ध दन्त की ओट से, आई है मुस्कान
प्राची ने झट रच दिया, लाली भरा विहान

लेकर गठरी आग की, वह चलता दिन रात
बदले में नभ दे रहा, तारों की सौगात

नित दिन ही चलता रहे, नियमित जीवन चक्र
बोली में जब व्यंग्य हो, ग्रहण सूर्य हो वक्र

सौरमंडल बना रहा, इक कर्मठ सरकार
सूरज तो सिरमौर है, मेघ खा रहे खार

ब्रम्हांड में गूँज रहा, कपालभाति का ओम्
बड़ी अनोखी है ख़ुशी, झूम रहा है व्योम

जब जब ये सूरज करे, तपते दिन का ज़िक्र
तब तब होती चाँद को, शीतलता की फ़िक्र

सूरज की हर इक किरण, रच देती है गीत
नारंगी में वीर रस, नील श्याम की प्रीत 

लेखन में लेकर चलें, सूरज जैसा ओज
शीतल मन की चाँदनी, पूर्ण करे हर खोज
-----ऋता....

सोमवार, 23 मई 2016

सौहार्द्र - लघुकथा

साझा अनुशासन- लघुकथा

उस शहर में मंदिर और मस्जिद अगल बगल थे| ईद में दोपहर एक बजे नमाजियों की कतार मंदिर के गेट तक आ जाती और रामनवमी में हनुमान जी को ध्वाजारोहण के लिए भक्तों की पंक्ति मस्जिद के सामने तक पहुँच जाती| 

इस बार प्रशासन को चिन्ता हो रही थी कि भीड़ को कैसे नियंत्रित किया जाएगा क्योंकि ईद और रामनवमी एक ही दिन थे और पूजा का मुहुर्त भी दोपहर बारह बजे से था| पुलिस अधिकारी सुरक्षा का इंन्तेजाम देखने वहाँ पर मौजूद थे| तभी अधिकारी ने देखा कि मंदिर के मुख्य पुजारी तथा मस्जिद के संचालक मौलवी जी एक साथ मुस्कुराते हुए सामने से आ रहे थे मानो कुछ निर्णय ले लिया था दोनों ने| 

सुबह से ही पुलिस की तैनाती थी| धीरे धीरे समय खिसकने लगा| भीड़ बढ़ रही थी| मंदिर के मुख्य द्वार पर पंडित जी खड़े थे और मस्जिद के द्वार पर मौलवी साहब| आँखों ही आँखों में दोनों की बातें हो रही थीं| बारह बजे से ध्वजा की पूजा आरम्भ हुई| पक्का पौने एक बजे पंडित जी मस्जिद के द्वार पर जा पहुँचे| उन्होंने भक्तों की पंक्ति को दो भागों में बाँटकर बीच में नमाजियों के लिए जगह बनाई| पूजा का काम आधे घंटे के लिए रोक दिया गया| शांतिपूर्ण माहौल में नमाज अता की गई| उसके बाद मौलवी साहब मंदिर के गेट पर गए और ईद मना रहे लोगों को शांति से हट जाने को कहा| प्रशासन इस सौहार्द्र को देखकर दोनों के सामने नतमस्तक हो गई|

----ऋता शेख ‘मधु’--------

मंगलवार, 17 मई 2016

अम्बर प्यासा धरती प्यासी

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1.
2121/ 2121/ 2121/ 212
आन बान शान से जवान तुम बढ़े चलो
विघ्न से डरो नहीं हिमाद्रि पर चढ़े चलो
वीर तुम तिरंग के हजार गीत गा सको
शानदार जीत के प्रसंग यूँ गढ़े चलो
 2.
2212/ 2212/ 2212/ 2212
सरगम हवाओं की मुहब्बत से भरी सुन लो जरा
महकी फ़िजा से फूल की तासीर को गुन लो जरा
हर ओर हैं उसके नजारे जो नजर आता नहीं
उस प्रीत की तस्वीर से बस श्याम को चुन लो जरा
 3.
2222/ 2222/ 2222/ 2222
अम्बर प्यासा धरती प्यासी राहें मेघों की भटकी हैं
तरुवर प्यासे चिड़िया प्यासी कलियाँ सूखी सी लटकी हैं
खेतों की वीरानी में कोलाहल सूखे का गूँज रहा
अपनी करनी पर पछताती मानव की साँसें अटकी हैं
4.
2122 2122 2122
आपके जो ख्वाब में पलते रहेंगे
चाँदनी बन रात में चलते रहेंगे
आँधियों में दीप को तुम देख लेना
प्रेरणा बन कर सदा जलते रहेंगे

------------ऋता शेखर ‘मधु’----------------------

शनिवार, 14 मई 2016

सुप्रभाती दोहे-3









हरी दूब की ओस पर, बिछा स्वर्ण कालीन

कोमल तलवों ने छुआ, नयन हुए शालीन 30

छँट जाती है कालिमा, जम जाता विश्वास
जब आती है लालिमा, पूरी करने आस

ज्यों ज्यों बढ़ता सूर्य का, धरती से अनुराग
झरता हरसिंगार है, उड़ते पीत पराग

पहन लालिमा भोर की, अरुण हुआ है लाल
चार पहर को नापकर, होता रहा निहाल 

सूर्य कभी न चाँद बना, चाँद न बनता सूर्य
निज गुण के सब हैं धनी, बंसी हो या तूर्य

पर अवलम्बन स्वार्थ की, कभी न थामो डोर
निष्ठा निश्चय अरु लगन, चले गगन की ओर

सुबह धूप सहला गई, चुप से मेरे बाल
जाने क्यों ऐसा लगा, माँ ने पूछा हाल

हवा लुटाती है महक, मगर फूल है मौन
श्रम सूर्य के साथ चला, उससे जीता कौन

प्रेमी तारा भोर का, गाता स्वागत गान
उतरीं रथ से रश्मियाँ, लिए मृदुल मुस्कान

शुष्क दरारों से सुनी, मन की करुण पुकार
रवि नीरद की ओट से, देने लगे फुहार

मंगलवार, 3 मई 2016

सुप्रभाती दोहे-2










प्रतिपल स्वर्णिम रश्मियाँ, छेड़ रहीं खग गान
आकुल व्याकुल सी धरा, झटपट करे विहान२०

ध्यानमग्न प्राची रचे, अरुणाचल में श्लोक
मन की खिड़की खोल मनु, फैलेगा आलोक१९

सूरज भइया आज तो, कर लो तुम आराम
मई दिवस है मन रहा, फिर क्यों करना काम१८


तीखी तीखी धूप जब,पहुँचाए आघात
तब मेघो के नृत्य की, होती है शुरुआत१७


नित नवल शक्ति भक्ति का, दे जाता आयाम
उस ऊर्जा के स्रोत को, शत शत करें प्रणाम१६

ये भूमण्डल गोल है, सूरज भी है गोल
होंतीं बातें गोल जब, बज जाती है ढोल१५

ज्यों सूरज सजने लगा, आसमान के भाल
चलती कलछी देखकर, हँसे बाल गोपाल14

शनै शनै होने लगा, अर्द्धवृत्त से गोल
दिनकर जी को देखकर, अब तो आँखें खोल13

नव प्रभात की नव किरण, करे अँधेरा दूर
गहरी काली रात का, दर्प हुआ है चूर12

सप्त अशव की पीठ पर, सूर्य लगाता पंख
द्रुतगति से रश्मियाँ, चलीं बजाती शंख11
-ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

गर उद्गार जीवित हो जाएँ

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खुशियों की ऊँचाई से
व्यथा की गहराई तक
अमराई की खुशबू से
यादों की तन्हाई तक
जाने कितनी नज्म कहानी
सिमट जाती हैं पुस्तक में

जितने लोग उतने दर्द
जितने लम्हे उतने क्षोभ
कुछ व्यक्त कुछ रहे अव्यक्त
अथाह मन की अनगिन सोच
बल खाती हैं पुस्तक में

भोर की रश्मियाँ सुनहरी
रुपहली चाँदनी घोर निशा की
तपती दुपहरी की धूप छाँव
गोधूलि की साँझ सिंदूरी
बिखर जाती हैं पुस्तक में

ज्ञान ध्यान की प्रेरक बातें
भुखे पेट की बोझिल रातें
प्रेम शाश्वत प्रेम सत्य है
एहसासों की मीठी मुलाकातें
अल्फाजों का रूप धरे
सज जाती हैं पुस्तक में

कुछ अतीत से सबक सिखाए
कुछ कसक दिल की कह जाए
जीवन के कुछ अद्भुत पल भी
पन्नों पर रोशनाई गिराए
मौन रही घुटती हुई साँसें
मुखरित होती हैं पुस्तक में

अमलतास जूही पुरवाई
चौबारा लीपे जो माई
लेखनी सब कुछ ही कहती
पगडंडी पर्वत और खाई
पीर घनेरी आहत मन की
मसक जाती है पुस्तक में

नन्हें होठों की किलकारी
बारिश बूँदों के बुलबुले
प्रेम पत्र के उड़ते पन्ने
बीबियों के प्यारे चुटकुले
जाने कितनी चाँदनी रातें
थिरक जाती हैं पुस्तक में

गर उद्गार जीवित हो जाएँ
फिर कहाँ कुछ बयाँ होगा
कोलाहल की बस्ती में फिर
बाकी न कोई निशाँ होगा
तूफानों से डरती अभिव्यक्ति
लिपट जाती है पुस्तक में
*ऋता शेखर ‘मधु’*