बारिश का मौसम सुहाना है
पावस ने छेड़ा तराना है
काँधे सजते झूलते काँवर
भजनों में शिव-गुण को गाना है
सुंदर पत्ते बेल के लाओ
शिवशंकर जी पर चढ़ाना है
सावन में चुनरी हरी लहरी
हाथों में लाली रचाना है
बच्चे पन्ने फाड़ते झटपट
धारा में किश्ती चलाना है
चूड़ी धानी सी खरीदे वे
परिणीता को जो लुभाना है
पानी है तालों तडागों में
मेढक को हलचल मचाना है
मंथर मंथर चल रही गंगा
तट पे शायद कारखाना है
पनपीं बेलें जात मज़हब की
सद्भावों के बीज पाना है
..........ऋता