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गुरुवार, 25 अगस्त 2011

अमर प्रेम का मंदिर

अमर प्रेम का मंदिर

कई कहानियाँ ऐसी होती हैं जो इतिहास के पन्नों मे दबी रहती हैं और कई हमारे बुजु़र्गों की यादों में बसी रहती हैं|ऐसी ही एक कहानी मेरी नानी ने मुझे बचपन में सुनाई थी|
पटना में मीठापूर के निकट पुरंदरपुर में एक नाग मंदिर है जहाँ नागपंचमी के दिन दूध और लावा चढ़ाने वालों का ताँता लगा रहता है|श्रद्धालुओं के लिए वह पूजा स्थल है किन्तु जिन लोगों को मंदिर निर्माण के कारणों का पता है उनके लिए यह अमर प्रेम का मंदिर है|
यह कहानी लगभग अस्सी साल पहले की है| एक दिन सुबह-सुबह सारे मुहल्ले में शोर मच गया कि एक काला नाग गया रेलवे लाइन की पटरी पर फुँफकार छोड़ता बड़े वेग से पुनपुन की तरफ़ से चला आ रहा था| उसकी चाल बता रही थी कि वह नाग गुस्से में था| बहुत सारे लोग रेलवे लाइन के किनारे-किनारे दौड़ते शोर मचाते चले आ रहे थे| वे यह जानना चाहते थे कि नाग कहाँ जा रहा है|वह नाग अचानक मीठापूर के निकट रुक गया| उसने बड़ा सा मुँह फाड़कर खून से लथपथ एक टुकड़ा उठाया जो एक अन्य काले नाग का था| अब लोगों का ध्यान गया कि पटरी के अगल बगल वैसे ही कई टुकड़े बिखरे पड़े थे| वह काला नाग बड़े-बड़े मुँह खोलकर सारे टुकड़ों को एक स्थान पर इकट्ठा कर रहा था| जब सारे टुकड़े जमा हो गए तब नाग ने उन टुकड़ों के चारो ओर अपने शरीर का घेरा बनाया और अपना सर पटकने लगा|
सारे ही लोग यह तमाशा देख रहे थे किन्तु किसी की हिम्मत नहीं हुई कि कोई उसके निकट जाए| अपना सर पटकते-पटकते नाग लहुलुहान हो गया और धीरे-धीरे मूर्छित होकर उसने अपने प्राण त्याग दिए| यह दृश्य देखकर कइयों की आँखों में आँसू आ गए|
हुआ यह था कि पौ फटने से पहले एक नाग रेलगाड़ी से कई टुकड़ों में कट गया था|
यह तो पता नहीं कि प्राण त्यागने वाला नाग था या नागिन थी, किन्तु यह मार्मिक दृश्य प्रेम की मिसाल बन गया| स्थानीय लोगों ने चंदा इकट्ठा करके उस स्थल पर
नाग-मंदिर का निर्माण किया| वह मंदिर नाग-स्थान के नाम से जाना जाता है|
         
                                                     ऋता शेखर मधु