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शनिवार, 7 अप्रैल 2012

क्यूँ कभी-कभी...उलझनों की दास्ताँ




क्यूँ कभी-कभी
उमड़ आते भाव
भिगोते जाते
हृदय की परतों को
कई भूली यादों को|१|

क्यूँ कभी-कभी
छलक उठते हैं
धैर्यहीन से
अँखियों के गागर
दिखलाते सागर|२|

क्यूँ कभी-कभी
मन भटकता है
किसी खोज में
करूँ कुछ तो ऐसा
यादगार जो बने||३|

क्यूँ कभी-कभी
हथेली मसलते
बेबस बन
छूट रहा हो जैसे
किसी निज का साथ|४|

क्यूँ कभी-कभी
होकर भी न होते
सबके साथ
पथराई सी आँखें
देखती हैं सन्नाटे|५|

क्यूँ कभी-कभी
सँभल नहीं पाते
रिश्तों की डोर
न अहं अहंकार
फिर भी टूट जाते|६|

क्यूँ कभी-कभी
निर्दोष होकर भी
खुद को पाते
कटघरे में स्तब्ध
बन जाते निःशब्द|७|

क्यूँ कभी-कभी
होता है एहसास
वक्त जा रहा
कर न पाए वह
जो दिल ने चाहा था|८|

क्यूँ कभी-कभी
सुँदर सा सपना
लगे जीवन
कभी डरावना सा
विकट अँधेरा सा|९|

क्यूँ कभी-कभी
हमें कैद करते
प्रश्नों के घेरे
बहुत सारे ऐसे
जो हैं अनुत्तरित|१०|

क्यूँ कभी-कभी
दुनियादारी नहीं
आ जाते भाव
दार्शनिकता भरे
जग बेमानी लगे|११|

क्यूँ कभी-कभी
मन बनता जाता
अँधरी गुफ़ा
उलझनों की दास्ताँ
हो नहीं पाता बयाँ|१२|

ऋता शेखर मधु