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मंगलवार, 13 सितंबर 2011

माँ सी ही सरल- हमारी मातृभाषा


हिन्दी दिवस पर विशेष
 

हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा और मातृभाषा है|
इसे भारतीय संविधान में १४ सितंबर १९४९ को शामिल किया गया था|
भारतीय संविधान के भाग १७ के अध्याय की धारा ३४३(१) में यह वर्णित है|
इसे देवनागरी लिपि में लिखा जाता है|
हिन्दी विश्व की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है|
भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है| दिल की बात दिल में ही दबी रहे यदि भाषा न हो| इस धरती पर जितने भी जीव-जन्तु पौधे है,सभी अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं| सभी जानवरों की अपनी बोलियाँ होती हैं, और जिस ढंग से वे बोलते हैं वो उनकी वेदना और खुशी को वर्णित कर जाते हैं| किन्तु उनके पास भाषा नहीं होती|
पेड़-पौधे भी वातावरण की अनुकूलता या प्रतिकूलता को चुपचाप दर्शाते हैं| धूप में मुरझा जाते हैं और पानी मिलने पर खिल जाते हैं| किन्तु उनके पास भाषा नहीं होती|
इस धरती पर एकमात्र प्राणि मनुष्य ही है जिसे ईश्वर ने भाषा का वरदान दिया है|
वे अपनी हर खुशी, वेदना, आक्रोश या विद्रोह को बोलकर, भाषा के जरिए व्यक्त करते हैं|धरती पर अगणित भाषाएँ बोली जाती हैं| हर भाषा की अपनी गरिमा होती है| हमारे हिन्दुस्तान की भाषा हिन्दी है किन्तु हम अपनी हिन्दी भाषा बोलते हुए सहज क्यों नहीं रह पाते| हिन्दी हमारी मातृभाषा है, हमारे राष्ट्र की भाषा है, फिर भी किसी बाहरी व्यक्ति से मिलते समय हम क्यों अंग्रेजी बोलकर उन्हें प्रभावित करने की कोशिश करते हैं| यह अलग बात है कि आठ-दस पंक्तियाँ अंग्रेजी की बोलने के बाद बातचीत का सिलसिला हिन्दी में ही जमता है| इस सन्दर्भ में मुझे एक कहानी याद आती है जो मैंने बचपन में बाल-पत्रिका नंदन में पढ़ी थी|
अंतरमन में बसी मातृभाषा
अकबर के दरबार में बीरबल सबसे चतुर दरबारी माने जाते थे| एक बार एक विद्वान पंडित अकबर के दरबार में आए| वे बहुत सारी भाषाओ के ज्ञाता थे| उन्होंने चुनौती दी कि उनकी मातृभाषा कोइ नहीं ज्ञात कर सकता है क्योंकि वे सभी भाषाएँ धाराप्रवाह बोल सकते थे| सबने उनसे भिन्न-भिन्न भाषाओं में बहुत सारे सवाल किए जिसका उत्तर वे आसानी से देते चले गए| कोई उनकी मातृभाषा नहीं जान पाया| अब पंडितजी ने कहा कि यदि कल तक कोई दरबारी उनकी मातृभाषा नहीं बता पाया तो वे मान लेंगे कि वही सर्वोत्तम हैं|
अब अकबर ने बीरबल को पंडितजी की मातृभाषा पता लगाने का काम सौंप दिया| बीरबल ने इस चुनौती को स्वीकार किया और कल तक इस पहेली को सुलझा लेने का वादा किया| उसी दिन आधी रात को बीरबल पंडितजी के कक्ष में पहुँचे जहाँवे गहरी निद्रा में सो रहे थे| बीरबल एक तिनका लेकर आए थे जिसे उन्होंने पंडितजी के कान में घुसाकर गुदगुदी लगाई| पंडितजी थोड़ा कुनमुनाए और फिर करवट बदलकर सो गए| अब बीरबल ने तिनका दूसरे कान में डाला| पंडितजी उठकर बैठ गए और जोर से बोले, येवुरुरा अदि अर्थात् कौन है?| बीरबल तबतक पलंग के नीचे छुप चुके थे| किसी को न पाकर पंडितजी फिर से सो गए| बीरबल वहाँ से चुपचाप निकल गए|
दूसरे दिन जब दरबार लगा तो बीरबल ने बताया कि पंडितजी की मातृभाषा तेलुगू है| सही उत्तर सुनकर पंडितजी आश्चर्यचकित हो गए| सबने यह जानना चाहा कि बीरबल मातृभाषा कैसे जान पाए| बीरबल ने कहा कि जब व्यक्ति नींद में होता है और उसे अपनी भावना व्यक्त करना होता है तो उसके मुँह से मातृभाषा ही निकलती है| फिर उन्होंने रात वाली घटना बताई| सारी बातें सुनकर सब हँस पड़े| पंडितजी ने बीरबल की चतुराई का लोहा मान लिया|
यहाँ पर मेरा यह कहना है कि दिल की गहराई से निकली अभिव्यक्ति सदा अपनी मातृभाषा में ही होती है, फिर हम इसे सहज रूप में क्यों नहीं अपनाना चाहते|
-०-
इसी सन्दर्भ में एक दूसरी घटना का जिक्र करना चाहती हूँ|
अप्रैल और मई प्रतियोगिता परीक्षाओं का महीना होता है| उस समय दूसरे प्रांतों से आए प्रतियोगी विद्यार्थियों से बंगलोर भर जाता है| मेरे घर भी कुछ परिचित आकर रूकते हैं और अपने बच्चों को परीक्षाएँ दिलवाते हैं| एक परिचित  की पुत्री अच्छे रैंक लाकर इंजिनीयरिंग की प्रतियोगिता परीक्षा में सफल हुई| जब काउँसलिंग का समय आया तो मेरे परिचित की इच्छा हुई कि मैं भी उनके साथ केन्द्र पर चलूँ| उनकी बात मानते हुए मैं भी केन्द्र पर गई| वहाँ पर विद्यार्थियों और अभिभावकों की भीड़ लगी हुई थी| माइक पर काउँसलिंग से सम्बन्धित सूचना दी जा रही थी| जिन बच्चों को मनपसंद कॉलेज मिल रहे थे, वे खुशी-खुशी बाहर आ रहे थे|
अब बारी थी हॉस्टल के तलाश की| कहीं से कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी| लोग एक दूसरे से इस बारे में पूछना चाह रहे थे किन्तु संकोचवश पूछ नहीं पा रहे थे| यह संकोच भाषा को लेकर था| सब लोग यह सोच रहे थे कि या तो दक्षिण भारतीय भाषा जैसे कन्नड़, मलयालम वगैरह चलेगा या अंग्रेजी में बोलना होगा| अंग्रेजी में लोग बातें कर रहे थे किन्तु खुलकर बातें नहीं हो पा रही थीं| सब की नजरों में एक जिज्ञासा थी| बच्चे आपस में ज्यादा सहज थे| जो थोड़ी बहुत बातें हो रही थीं उससे पता चला कि सामने वाले अभिभावक भी उत्तर भारत से ही थे| मैंने देखा कि यह जानते ही दोनों अभिभावकों के चेहरे खिल उठे| दोनों ने एक ही तरह के उद्‌गार व्यक्त किए कि अंग्रेजी बोलते-बोलते वे परेशान हो गए थे, अब खुलकर बातें होंगी| मैं उनकी बातें सुनकर यही सोच रही थी कि आखिर हम हिन्दी बोलने में इतना क्यों सकुचाते हैं| हमारी मातृभाषा जो कि राष्ट्रभाषा भी है, कितनी सरल और कर्णप्रिय है और यह हमारी भारत माता की भाषा है| माता और संतान की भाषा एक ही होगी, तभी तो भावपूर्ण रिश्ते बनेंगे| गर्व से हिन्दी में बातें करें|
                      ऋता शेखर मधु