पर्वतों और समुद्रों को लांघती
कितने ही धूल-कणों को समेटती
सागर की नमी सँभालती
ये पुरवा और पछुआ हवाएँ
कुछ कहने आती हैं
झंझोड़ देती हैं खिड़की दरवाजे
इन्हें बन्द करने में
कुछ थपेड़े चेहरे पर पड़ते हैं
फिर भी बन्द कर देते हैं खिड़कियाँ
किन्तु उन साँय सांय करती
हवाओं की आवाज
क्या चैन से बैठने देती है
थक कर शांत क्लांत हवा
या तो चुप हो जाती है
या दिशा बदल देती है
यह है हवा की बात
अब देखते हैं उन्हें
जिन्होंने दरवाजे बन्द किए
सन्नाटे को पाकर
झाँकती हुई आँखें
क्या आँधियों के अवशेष
धूल की परत फ़र्श पर नहीं देखती
नमी के छींटे से
खिड़कियों के परदे
क्या भीगे नहीं होते
अनकहा दर्द झलक ही जाता है|
परिवार में
किसी एक के जीवन में आई सुनांमी
सबको अस्त-व्यस्त कर देती है
यह अलग बात है
किसी से ममता मिलती है
किसी से सहानुभूति
कटाक्ष से भी बचना मुश्किल है
इसलिए प्रभु से जब भी माँगो
सबकी खुशियाँ माँगो
सब खुश रहेंगे
तभी हम भी खुश रहेंगे
सिर्फ अपना सुख कुछ नहीं होता
सबकी खुशी में ही
अपनी भी खुशी होती है|
ऋता शेखर ‘मधु’
विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!!
विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!!