किसी की बेबसी का तो, मजाक न उड़ाइए|
न आप भी विधाता के, निशाना बन जाइए|१|
सोच समझ के ही तो, उंगलियाँ उठाइए|
आपकी ओर भी हैं ये, इसे न भूल जाइए|२|
है उपदेश आसान, सबने हँस के दिए|
जो बात खुद पे आई, समंदर बहा दिए|३|
ज्ञान की ही पिपासा थी, कहनी कुछ बात थी|
'इटरनेट' देखा तो, साहित्य का दरिया था|४|
लदे वृक्ष फलों से जो, सदा ही वे झुके रहे||
क्षितिज पे धरा ही है, फ़लक को झुका रही|५|
ऋता शेखर 'मधु'