037.एक कविता - भाई के लिए लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
037.एक कविता - भाई के लिए लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

एक कविता - भाई के लिए


भाई मेरे
हो तो तुम मुझसे छोटे
पर रिश्ते यूँ निभाते
जैसे हो कितने बड़े|
जीवन पथ पर चलते-चलते
जब भी मैंने ठोकर खाया
सर उठाकर जो देखा
हाथ तुम्हारा आगे पाया|

जब भी तुमने ये देखा
मुख मलीन है मेरा
तुम भी फिर खुश न रहते
हर कोशिश खुश रखने की
लेकर आगे पग बढ़ाया
सर उठाकर जो देखा
हाथ तुम्हारा आगे पाया|

आँखों में अश्रु मेरे होते थे
विकल तुम नजर आते थे
सांत्वना की बड़ी टोकरी ले
सदा तुम्हें खड़े ही पाया
सर उठाकर जो देखा
हाथ तुम्हारा आगे पाया|

कोई समस्या नहीं है ऐसी
जिसका हल न तुमसे पाया
खुद से ज्यादा विश्वास तुमपर
सदा आधार उसे बनाया
सर उठाकर जो देखा
हाथ तुम्हारा आगे पाया|

चंदामामा से प्यारा मेरा मामा
बच्चों ने सदा गुनगुनाया
बाल-मन पढ़ने में माहिर
तुमने जादू की छड़ी घुमाया
जो काम मैं नहीं कर पाती
झट से तुमने कर दिखाया|

हमारे खरीदे टेड्डी बियर
बार्बी और हेलिकॉप्टर ने
कोने में से मुँह चिढ़ाया,
तुम्हारे गुलाटी वाले बन्दर
फट-फट चलने वाले स्टीमर
बुलबुले उड़ाते पाइप ने ही
बच्चों को था सदा लुभाया|

एक वरदान दिया हमें प्रभु ने
मुझको तुमसे बड़ा बनाया
जन्मदिन तुम्हारा आया है
एक वस्तु एसी तो है
जो मैं तुम्हे दे सकती हूँ|

मेरे अन्तर्हृदय से दुआओं की
निर्मल स्नेहमयी धारा बह रही है
पावन आशीर्वाद वेद-ऋचाओं-से
पवन में उन्मुक्त गूँज रहे हैं
जीवन के किसी भी पल में
जब भी मेरी जरूरत होगी
मेरे हाथ भी तुम सदा
अपने लिए आगे पाओगे|

जन्मदिन की ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएँ!!!
तुम्हारी दीदी-- ऋता शेखर मधु