प्रेम का हर सार छुपा है राधा-कान्हा की भक्ति में
परम आनंद प्रकट होता मीरा की अनुरक्ति में
छलिया चितचोर साँवला सलोना नंद का छोरा
मनमोहना था, डूबी गोपियाँ प्रेम-आसक्ति में
मोहन एक गोपियाँ अनेक रास रचाए मधुवन
अधर से मुरली यूँ जुड़े ज्यूँ समास जुड़ें विभक्ति में
निष्ठुर बना वह नंदलाला छोड़ गया वृंदावन
गऊ गाछ गोपियाँ गलियाँ गुमसुम हुए विरक्ति में
कालिया जयद्रथ शिशुपाल कंस कृष्ण को ना भाते
धैर्य से हम रखें यकीन नारायण की शक्ति में
ऋता शेखर 'मधु'
इस ग़ज़ल को जन्माष्टमी के लिए तैयार किया था किन्तु ऐन मौके पर एक सप्ताह के लिए नेट महाराज धोखा दे गए...
अपनी रचना तो नहीं ही डाल पाई , सबके ब्लॉग की रचनाएँ भी मिस कियाः(
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