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मंगलवार, 24 जनवरी 2023

बेटियाँ वरदान हैं

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस













संसार के सुन्दर सृजन में, बेटियाँ वरदान हैं।

माता पिता की लाडली अब बन रही अभिमान हैं।।

बेटी पढ़े आगे बढ़े यह कह रही सरकार है।

उसकी खुशी सबसे जरूरी जो बनी आधार है||1


बगिया सुवासित देखकर के, गुनगुनाती बेटियाँ|

नभ में पतंगों को उड़ाकर, मुस्कुराती बेटियाँ||

अम्बर सितारे टिमटिमाए, जगमगाई बेटियाँ|

कलकल नदी की धार बनकर, खिलखिलाई बेटियाँ||2


जब बूँद बनकर बारिशों में, नाचता सावन कभी|

रुनझुन हुई है पायलों की, हँस दिए आँगन सभी||

शृंगार बालों का हुआ है, झूलती है चोटियाँ|

चकले थिरक जाते खुशी से, बेलती जब बेटियाँ||3


लगती कमलदल सी सुकोमल, धैर्य में है झील सी|

जगमगाती दीप बनकर, रोशनी कंदील सी||

प्राची हँसी पूरब दिशा में भोर की लाली बनी|

धरती सुहानी बेटियों सी खेत की बाली बनी||4


वह चाहते हैं बेटियों को, सरस्वती बसती जहाँ |

जो पूजते हैं बेटियों को, लक्ष्मी रहती वहाँ||

कुछ पर्व भारत में बने जो, बेटियों से हैं खिले|

होंगी नहीं जब बेटियाँ तब, राखियाँ कैसे मिले||5


कुछ शील्ड भारत को मिले हैं, बेटियों के काम पर।

वह हों बछेन्द्री पाल या फिर, कल्पना के नाम पर।।

वैमानिकी तकनीक हो या, हो पहाड़ी चोटियाँ।

बढ़ती गईं आगे हमेशा, हिन्द की ये बेटियाँ।।6


भारत बहादुर बेटियों से, पा रहा गौरव कई।

वह पाँच महिला हैं खिलाड़ी, जो भरें सौरभ कई।।

झूलन क्रिकेटी टीम में रह, जब बनी कप्तान थीं।

तब गेंदबाजी में रमी वह, देश में वरदान थीं।।7


जमुना मुक्केबाज ने तो, रच दिया इतिहास है।

चौवन किलो की वर्ग श्रेणी, वह उन्हीं से खास है।।

तसनीम सोलह वर्ष में ही, रैंक नम्बर वन बनी।

गुजरात की महिला खिलाड़ी, बैडमिंटन बन तनी।।8


जब खेल लंबी कूद अंजू, चैंपियन बनती रहीं|

अनगिन पदक वह नाम अपने, देश के करती रहीं||

आसाम में जनमी हिमा ने,रेस को करियर बनाया|

वह गोल्ड मेडल पाँच जीती, देश का गौरव बढ़ाया|९


माता पिता का साथ पाकर खिल उठी हैं बेटियाँ।

चाहे पढ़ाई नौकरी हो, चल पड़ी हैं बेटियाँ।।

जूडो कराटे भी सिखाएँ, आत्मविश्वासी बनाएँ।

अपनी सुरक्षा कर सकें वे, आत्मबल साहस बढायें।।10


सौन्दर्य का प्रतिमान बनकर वह बनी अभिकल्पना|

माधुर्य का अभिदान पाकर, सृष्टि की अनुरूपना||

जिसने सजाए भाव सारे, क्यों वही अनजान है?

दो-दो घरों से मान पाना, क्यों महाअभियान है??11


जो पूजते नौ देवियाँ पर, बेटियाँ भाती नहीं|

समझे पराया धन हमेशा, वंश की थाती नहीं||

बहुएँ सभी को चाहिए पर, बेटियाँ लाते नहीं|

जब हों मुखौटे इस तरह के, मान वे पाते नहीं||12

--- ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 20 मई 2022

कुछ हो अनूठा कुछ नवल हो

हरिगीतिका छंद- 
मात्रा विधान- २२१ २२२ १२२(१६), २१ २२२ १२(१२) 
दो-दो पंक्तियाँ तुकांत 

 कविमन सृजन में तब लगे जब, शब्द का शृंगार हो। 
कुछ हो अनूठा कुछ नवल हो, भाव में कुछ सार हो।। 
आरम्भ हो सुन्दर सुरीला, रागिनी उर में बजे। 
भारत वतन के ही लिए तो, लेखनी में धुन सजे।।1 

 हर साधना में गीत सारे, प्रीत के सुर में ढलें | 
धागा रहें या मंजरी हों, संग ले सबको चलें || 
संसार की राहें कठिन हैं, है न मंजिल का पता | 
हे ईश ! तुझसे पूछते हैं, तू इसे हमको बता ||२ 

 पर्यावरण था शुद्ध पावन, जो विरासत में मिला | 
नुकसान सबने ही किया है, फिर करें किससे गिला || 
शुरुआत भी हम ही करेंगे, सृष्टि के शॄंगार का | 
जो खो गया वह लौट आये, गीत रच मनुहार का ||३ 
 
जब भोर से वसुधा मिले तब, यह नवल आगाज़ है | 
उल्लास से सुरभित गगन में, अनकही परवाज़ है || 
बगिया सुगंधित पुष्प से है, गूँजती किलकारियाँ | 
हर ओर जीने की ललक है, भर गईं पिचकारियाँ ||४ 

 दिन यूँ निकलता ही रहे अब, ख्वाहिशें ये हैं बड़ी | 
बन के अटल है पग बढ़ाना, जब कभी बाधा अड़ी || 
पतवार साहस की लिए हम, राह में आगे बढ़ें | 
संसार को हम जीत लेंगे, सोच को मन में मढ़ें ||५ 

==ऋता शेखर ‘मधु’

गुरुवार, 18 जून 2020

हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो-गीत


Meri Maa Ambe Meri Jagdambe - Posts | Facebook
(हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।)


हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
आद्या जया दुर्गा स्वरूपा, शक्ति का आधार हो।
*
शिव की प्रिया नारायणी, हे!, ताप हर कात्यायिनी।
तम की घनेरी रैन बीते, मात बन वरदायिनी।।।
भव में भरे हैं आततायी, शूल तुम धारण करो।
हुंकार भर कर चण्डिके तुम, ओम उच्चारण करो।
*
त्रय वेद तेरी तीन आखें, भगवती अवतार हो।
हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
*
कल्याणकारी दिव्य देवी, तुम सुखों का मूल हो।
भुवनेश्वरी आनंद रूपा, पद्म का तुम फूल हो।
भवमोचनी भाव्या भवानी, देवमाता शाम्भवी।
ले लो शरण में मात ब्राह्मी, एककन्या वैष्णवी।।
*
काली क्षमा स्वाहा स्वधा तुम, देव तारणहार हो।
हे अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
*
गिरिराज पुत्री पार्वती जब, रूप नव धर आ रही।
थाली सजे हैं धूप चंदन, शंख ध्वनि नभ छा रही।|
देना हमें आशीष माता, काम सबके आ सकें।
तेरे चरण की वंदना में, हम परम सुख पा सकें।।
*
दे दो कृपा हे माँ जयंती, यह सुखी संसार हो|
हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
*
मौलिक , स्वरचित
ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 12 जून 2020

माँ शारदे ! घर में पधारो-गीत


आरती ॐ जय सरस्वती माता - Saraswati Mata Aarti | Hindupath

ऋतुराज की आहट हुई है, माघ का विस्तार है|
माँ शारदे ! घर में पधारो, पंचमी त्योहार है||१||
*
है राह भीषण ज़िन्दगी की, पग कहाँ पर हम धरें|
मझधार में नौका फँसी है, पार कैसे हम करें ||
तूफ़ान में पर्वत बनें हम, शक्ति इतनी दो हमें |
बन कर चरण-सेवी रहें हम, भक्ति भी दे दो हमें ||
*
देवी ! हमारी वंदना में, पुष्प का गलहार है |
माँ शारदे ! घर में पधारो, पंचमी त्योहार है||२||
*
जब राग सारे टूटते हों, या सघन अवरोध हो |
दे दो हमें वरदान जिससे, आत्मबल का बोध हो ||
हम हैं अधूरे बिन तुम्हारे, यह हमें अनुबोध है |
गंगा बहाओ ज्ञान की तुम, यह सरल अनुरोध है||
*
फैला तिमिर चहुँ ओर है माँ, दृष्टि की मनुहार है|
माँ शारदे ! घर में पधारो, पंचमी त्योहार है||३
*
माँ ! दूर कर दो भाव सारे, जो जगत को पीर दे|
 उस ज्ञान-रथ के सारथी हों, जो विकल को धीर दे|
इस आस में दर पर खड़े हम, कर रहे अनुराधना |
माता करो उपकार हमपर, पूर्ण कर दो साधना ||
*
सद्भाव ही तो इस जगत में, प्रेम का आधार है|
माँ शारदे ! घर में पधारो, पंचमी त्योहार है||४
*
संदेश अपना शांति का हो, दो हमें यह भावना |
भारत वतन में हर जगह हो, प्रीत की सद्भावना ||
साकार हों सपने सभी के, हो न तम से सामना |
आसक्त विद्या में रहें हम, बस यही है कामना ||
*
जब तुम करो हम पर कृपा तो, स्वप्न भी साकार है|
माँ शारदे ! घर में पधारो, पंचमी त्योहार है||५

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ !!



करती समर्पित काव्य उनको, देश हित में जो डटे|
वे वेदना सहते विरह की, संगिनी से हैं कटे ||


दिल में बसा के प्रेम तेरा, हर घड़ी वह राह तके|
लाली अरुण या अस्त की हो, नैन उसके नहिं थके||

जब देश की सीमा पुकारे, दूर हो सरहद कहीं|
इतना समझ लो प्यार उसका, राह का बाधक नहीं||

तुम हो बहादुर, ओ सिपाही, याद उसकी ले चलो|
संबल वही है जिंदगी का, साथ में फूलो फलो||

आशा, कवच बन कर रहेगी, बात यह बांधो गिरह|
तुम लौट आना एक दिन तब, भूल जाएगी विरह|

फिर मांग में भर के सितारे, वह सजी तेरे लिए|
अर्पण करेगी प्रीत अपना, आँख में भर के दिए||

ले लो दुआएँ इस जहाँ की, भूल जाओ पीर को|
आबाद हो संसार तेरा, अंक भर लो हीर को||

जब जब तिरंगा आसमाँ में, शान की गाथा लिखे|
हम सब नमन करते रहेंगे, वीर, तुम मन में दिखे ||
....................ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

कोमल घरौंदे रेत के वो, टूटकर बिखरे रहे-हरिगीतिका

नौका समय की जब बनी वो, अनवरत बहने लगी |
मासूम बचपन की कहानी, प्यार से कहने लगी ||
कोमल घरौंदे रेत के वो, टूटकर बिखरे रहे |
हम तो वहीं पर आस बनकर, पुष्प में निखरे रहे ||1||

तरुणी परी बन खिलखिलाई, चूड़ियों में आ बसी |
अनुराग की वो प्रीत बनकर, रागिनी में जा बसी ||
वो बंसरी में बंदिनी थी, कृष्ण की राधा बनी |
नक्षत्र सत्रह में मिली वो, रात अनुराधा बनी ||2||

सजनी सजन को भा रहा अब, श्रावणी पावन पवन |
दौलत बना है तर्जनी में, वो अँगूठी का रतन ||
बुलबुल बनी पीहर गई वो, डाल पींगें झूलती |
‘’मेरा बसेरा है कहाँ अब’’, टीस को वो भूलती ||3||

नानी बनी, आया बुढ़ापा, लौट आया बचपना |
बढ़ती लकीरों में सजाई, नित नई अभिकल्पना ||
गुड़िया बना गुझिया पिरोती, और कहती थी कथा |
संसार में अनमोल बनना, ना झगड़ना अन्यथा ||4||
-ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

साँझ ढले बिटिया पढ़ती है--छंद


मापनीयुक्त मात्रिक छंद -
1.
हरिगीतिका- गागालगा गागालगा गागालगा गागालगा

सूरज उगा ज्यों ही गगन में, कालिमा घटने लगी|
मन व्योम के विस्तृत पटल पर, लालिमा बढ़ने लगी||
कलकल सरित अपनी लहर में, गीतिका कहती रही|
पाषाण वाली राह पर भी, प्रेम से बहती रही|
-ऋता शेखर 'मधु'
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मापनीयुक्त वर्णिक छंद -
2.
तिलका- ललगा ललगा

यह दीप कहे
तम दूर रहे
हिय प्यार खिले
शुभ लाभ मिले
-ऋता शेखर 'मधु'
===================
3.
तोटक- ललगा ललगा ललगा ललगा

जब भोर हुई निखरी कलियाँ|
घट हाथ लिए जुटती सखियाँ||
बृजभान लली घर से निकली|
चुपके यमुना तट को तक ली||
-ऋता शेखर 'मधु'
===================
4.
दोधक- गालल गालल गालल गागा
साँझ ढले बिटिया पढ़ती है|
दीप तले सपने गढ़ती है||
मैं घर की अब शान बनूँगी
जीवन का इतिहास रचूँगी||
-ऋता शेखर 'मधु'
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5.
विद्याधारी- गागागा गागागा, गागागा गागागा

जो जागा सो पाया, जो सोया सो खोया|
जो बोया सो खाया, जो बैठा सो रोया||
आने वाला आता, जाने वाला जाता|
दीदी खेले खोखो, भाई सोलो गाता||
-ऋता शेखर मधु
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6.
चंचला- गाल X 4, गाल X 4
.आन, ज्ञान, मान संग, बेटियाँ बनीं महान|
राग, रंग, आसमान, वे बढ़ा रहीं वितान||
सैन्य के समूह बीच, ले उड़ीं बड़े विमान|
देख कोख शानदार, है निहाल खानदान||
-ऋता शेखर 'मधु'

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सोमवार, 30 जनवरी 2017

सरस्वती वंदना—हरिगीतिका छंद



सरस्वती वंदना—हरिगीतिका छंद

 
यह शीश कदमों पर नवा कर कर रहे हम वन्दना
माँ शारदे  कर दो कृपा तुम  ज्ञान की है कामना
संतान तेरी राह भूली दृष्टि की मनुहार है
उर में हमारे तुम पधारो पंचमी त्यौहार है

धारण मधुर वीणा किया है  दे रही सरगम हमें
संगीत से ही तुम सिखाती  एकता हरदम हमें
पद्‌मासिनी कर दो कृपा अब हो सुवासित यह जहाँ
कुसुमित रहे बगिया हमारी चम्पई भर दो यहाँ

है ज़िन्दगी की राह भीषण पग कहाँ पर हम धरें
मझधार में कश्ती फँसी है पार हम कैसे करें
तूफ़ान में पर्वत बनें हम शक्ति इतनी दो हमें
तेरे चरण- सेवी रहें हम  भक्ति से भर दो हमें

तेरे बिना कुछ भी नहीं हम  सब जगह अवरोध है
हों ज्ञान-रथ के सारथी हम  यह सरल अनुरोध है
करते तुझे शत-शत नमन हम, हो न तम का सामना
आसक्त तुझमें ही रहें हम  बस यही है कामना

हो शांति ही संदेश अपना  दो हमें यह भावना
भारत वतन ऐसा बने  हो सब जगह सद्‌भावना
साकार हों सपने सभी के  कर रहे आराधना
माता करो उपकार हमपर पूर्ण कर दो साधना

-ऋता शेखर ‘मधु’

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

सांवरे की मनुहार


वसुधा मिली थी भोर से जब, ओढ़ चुनरी लाल सी।
पनघट चली राधा लजीली,  हंसिनी  की  चाल  सी।।
इत वो ठिठोली कर रही थी,   गोपियों  के साथ में ।
नटखट कन्हैया उत छुपे थे,   कंकड़ी  ले  हाथ  में ।१।


भर नीर मटकी को उठाया, किन्तु भय था साथ में ।
चंचल चपल इत उत  निहारें, हों   न   कान्हा  घात  में।।
ये भी दबी सी लालसा थी, मीत के दर्शन  करूँ।
उनकी मधुर मुस्कान पर निज, प्रीत को अर्पण करूँ।२।


धर धीर, मंथर चाल से वो, मंद मुस्काती चली ।
पर क्या पता था राधिके को, ये न विपदा है टली ।।
तब ही अचानक, गागरी में, झन्न से कँकरी लगी ।
फूटी गगरिया,  नीर फैला, रह  गई  राधा ठगी ।३।


कान्हा नजर के सामने थे, राधिका थी चुप खड़ी।
अपमान से मुख लाल था अरु, आँख धरती पर गड़ी ।।
बोलूँ न कान्हा से कभी मैं, सोच कर के वह अड़ी ।
इस दृश्य को लख कर किसन की, जान साँसत में पड़ी।४।


चितचोर ने झटपट मनाया, अब न छेडूंगा तुझे ।
ओ राधिके, अब मान भी जा, माफ़ भी कर दे मुझे ।।
झट  से  मधुर  मुरली  बजाई,  वो  करिश्मा  हो  गया ।
मनमीत की मनुहार सुनकर,  क्रोध  सारा  खो   गया ।५।


मनुहार सुनकर सांवरे की, राधिका विचलित हुई ।
हँसकर लजाई इस अदा पर, प्रीत  भी बहुलित हुई ।।
ये  प्रेम  की  बातें  मधुरतम,  सिर्फ़  वो ही जानते।
जो प्रेम से बढ़ कर जगत में, और कुछ ना मानते।६।
*ऋता शेखर 'मधु'*

शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

थाली सजे हैं धूप चंदन...माँ दुर्गा हरिगीतिका में


हे अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
आद्या जया दुर्गा स्वरूपा, शक्ति का आधार हो।
शिव की प्रिया नारायणी, हे!, ताप हर कात्यायिनी।
तम की घनेरी रैन बीते, मात बन वरदायिनी।१।।

भव में भरे हैं आततायी, शूल तुम धारण करो।
हुंकार भर कर चण्डिके तुम, ओम उच्चारण करो।
त्रय वेद तेरी तीन आखें, भगवती अवतार हो।
काली क्षमा स्वाहा स्वधा तुम, देव तारणहार हो।२।।

कल्याणकारी दिव्य देवी, तुम सुखों का मूल हो।
भुवनेश्वरी आनंद रूपा, पद्म का तुम फूल हो।
भवमोचनी भाव्या भवानी, देवमाता शाम्भवी।
ले लो शरण में मात ब्राह्मी, एककन्या वैष्णवी।३।।

गिरिराज पुत्री पार्वती ही, रूप नव धर आ रही।
थाली सजे हैं धूप चंदन, शंख ध्वनि नभ छा रही।
देना हमें आशीष माता, काम सबके आ सकें।
तेरे चरण की वंदना में, हम परम सुख पा सकें।।४।।
ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 6 जून 2013

तुम हो बहादुर ओ सिपाही, याद उसकी ले चलो



यह हरिगीतिका समर्पित है उन वीर जवानों और उनकी परिणीताओं को जो देश की रक्षा के लिए विरह वेदना में तपते हैं...

दिल में बसा के प्रेम तेरा, हर घड़ी वह रह तके|
लाली अरुण या अस्त की हो, नैन उसके नहिं थके||

जब देश की सीमा पुकारे, दूर हो सरहद कहीं|
इतना समझ लो प्यार उसका, राह का बाधक नहीं||

तुम हो बहादुर, ओ सिपाही, याद उसकी ले चलो|
संबल वही है जिंदगी का, साथ में फूलो फलो||

आशा, कवच बन कर रहेगी, बात यह बांधो गिरह|
तुम लौट आना एक दिन तब, भूल जाएगी विरह|

फिर मांग में भर के सितारे, वह सजी तेरे लिए|
अर्पण करेगी प्रीत अपना, आँख में भर के दिए||

ले लो दुआएँ इस जहाँ की, भूल जाओ पीर को|
आबाद हो संसार तेरा, अंक भर लो हीर को||
....................ऋता शेखर 'मधु'


शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

अज्ञान में संतान तेरी, ज्ञान की मनुहार है - ऋता



सरस्वती वंदनाहरिगीतिका छंद   

यह शीश कदमों पर नवा कर, कर रहे हम वन्दना |
माँ शारदे, कर दो कृपा तुम, ज्ञान की है कामना||

अज्ञान में संतान तेरी, ज्ञान की मनुहार है |
उर में हमारे तुम पधारो, पंचमी त्यौहार है ||

धारण मधुर वीणा किया है, दे रही सरगम हमें|
संगीत से ही तुम पढ़ाती, एकता हर पाठ में||


बस शांति हो संदेश अपना, दो हमें यह भावना|
भारत वतन ऐसा बने, हो, सब जगह सद्‌भावना||

पद्‌मासिनी करिये कृपा अब, हो सुवासित यह जहां
हंस पर जब माँ विराजें , शांति छा जाती यहाँ||

माता करो उपकार हमपर, कर रहे हम साधना|
साकार हों सपने सभी के, कर रहे आराधना||

इस ज़िन्दगी की राह भीषण, पत्थरों से सामना|
नहिं ठोकरें खा के गिरें, माँ, बुद्धि दे सँभालना||

तेरे बिना कुछ भी नहीं हम, सब जगह अवरोध है|
हों ज्ञान-रथ के सारथी हम, यह सरल अनुरोध है||

तूफ़ान में पर्वत बनें हम, शक्ति इतनी दो हमें|
तेरे चरण- सेवी रहें हम, भक्ति भी दे दो हमें||

करते तुझे शत-शत नमन हम, हो न तम का सामना|
आसक्त तुझमें ही रहें हम, बस यही है कामना||

ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

पूरी प्रकृति तुममें समाहित, भस्मप्रिय तुम कान्त हो- हरिगीतिका


सावन का महीना है और सौवीं रचना लगा रही हूँ...
यह रचना महादेवाधिदेव शिवजी को समर्पित है !!!!!!!!!




नन्दीश्वर दण्डी दिवाकर,  दिव्य पालनहार हो|
सिर पर मुकुट सा शोभता है,चन्द्र-सा साकार हो||

अर्द्धांगिनी गौरी सहित तुम, ध्यान के आधार हो|
विष, कण्ठ में धारण किया है, विश्व के आभार हो|१|


पूरी प्रकृति तुममें समाहित, भस्मप्रिय तुम कान्त हो|
तेजोमयी  गोपति  बने हो,  वीतरागी   शान्त   हो||

हे दृढ़ महायोगी तमोहर,   सूर्यतापन  धर्म  हो|
संहारकारी  धूर्जटि  हो,  श्रेष्ठ  पशुपति कर्म हो|२|


पौराण पुष्कल हव्यवाहन, लोककर्ता सौम्य हो|
गुणराशि ओजस्वी जगद्गुरु, शुद्धात्मा भौम्य हो||

वीरेश वृषवाहन सुधापति, सर्वदर्शन नित्य हो|
दुर्जय ललित भावात्मा के, सारशोधन नृत्य हो|३|


कैलास के अधिपति कपाली, हो गणों के ईश तुम|
भागीरथी का मान रखने, गंग को दिए शीश तुम||

तुम्हीं महादेवा पिनाकी, ज्ञान के तुम सार हो|
हर रूप में हर हाल में तुम, सर्वदा स्वीकार हो|४|

ऋता शेखर मधु

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

ऋतुराज को आना पड़ा है


ऋतुराज को आना पड़ा है हरिगीतिका छंद





फिर वाटिका चहकी खुशी से,खिल उठे परिजात हैं।
मदहोशियाँ फैलीं फ़िजाँ में, शोखियाँ दिन रात हैं।।
बारात भँवरों की सजी है, तितलियों के साथ में।
ऋतुराज को आना पड़ा है, बात है कुछ बात में ।१।  

मीठी बयारों की छुअन से, पल्लवित हर पात है ।
ना शीत है ना ही तपन है, बौर की शुरुआत है।।
मौसम सुहाना कह रहा है, कोकिलों, चहको जरा।
परिधान फूलों के पहनकर, ऐ धरा! महको ज़रा।२।
हुड़दंग गलियों में मचा है, टोलियों के शोर हैं।
क्या खूब होली का समाँ है, मस्तियाँ हर ओर हैं।।
पकवान थालों में सजे हैं, मालपूए संग हैं।
नव वर्ष का स्वागत करें हम,फागुनी रस रंग है।३।

:- ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 1 जून 2012

इन थरथराते से लबों पर अनकही इक बात है – हरिगीतिका छंद


शादियों के मौसम के लिए...

गोरी सजी दुल्हन बनी है, नैन शर्मीले बने|
लाली हया की छा रही है, हाथ बर्फीले बने||

जाना सजन के संग में है, यह विदा की रात है|
इन थरथराते से लबों पर, अनकही इक बात है|१|

बाबुल नजर के सामने हैं, नत नयन से वह खड़ी|
जाना जरूरी क्यों बताओ, कौन सी आई घड़ी||

लाडो नियम संसार का यह, अब वही तेरा जहाँ|
माता-पिता की लाज रखना, खुश सदा रहना वहाँ|२|

भाई हृदय की ही परत पर, नेह-पाती लिख रहा|
आँखें उदासी से भरी हैं, खुश मगर वह दिख रहा||

जब खिलेगा चाँद सावन, दूज का ही मास होगा|
बहना पिरोना स्नेह-मोती, वह महीना खास होगा|३|

सुनसान आँगन कर चली है, लाडली नाजों पली|
कैसे रहेगी दूर माँ से, बोल ऐ नाजुक कली||

इन मौन आँखों में नमी है, दिल हुलस कर कह रहा|
आबाद हो संसार तेरा, नीर खुशी के बह रहा|४|

देता दिलासा वह सभी को, मीत को लेकर चला|
शोभा बनेगी यह हमारी, आस भी देकर चला||

हौले दबाया हाथ उसका, लाज से पानी हुई|
ले प्यार सबका वह चली है, प्रीत दीवानी हुई|५|

ऋता शेखर मधु

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

उर में हमारे तुम पधारो, पंचमी त्योहार है - हरिगीतिका छंद

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सरस्वती वंदनाहरिगीतिका छंद

गूगल से साभार

यह शीश कदमों पर नवा कर, कर रहे हम वन्दना |
माँ शारदे, कर दो कृपा तुम, है विद्या  की  कामना||

संतान  हम  तेरे  अज्ञानी, ज्ञान  की  मनुहार है |
उर में हमारे तुम पधारो,  पंचमी  त्यौहार  है |१|


धारण मधुर वीणा किया है,  दे रही सरगम हमें|
संगीत से ही तुम पढ़ाती, पाठ  एकता  का हमें||

बस शांति हो संदेश अपना, दो  हमें यह भावना|
भारत वतन ऐसा बने, हो, सब जगह सद्‌भावना|२|


पद्‌मासिनी होकर कही तुम, हो सुवासित यह जहाँ|
रहती सदा ही हंस पर तुम, शांति छा जाती वहाँ||

माता करो उपकार हमपर, कर रहे  हम  साधना|
साकार हों सपने सभी के,  है  यही  आराधना|३|


इस ज़िन्दगी की राह भीषण, पाहनों से सामना|
ना ठोकरें खा के गिरें माँ, ज्ञान  दे,  संभालना||

तेरे बिना कुछ भी नहीं हम, सब जगह अवरोध है|
हों ज्ञान-रथ के सारथी हम, यह सरल अनुरोध है|४|


तूफ़ान में पर्वत बनें हम, शक्ति  इतनी  दो  हमें|
तेरे चरण- सेवी रहें हम,  भक्ति भी दे  दो  हमें||

करते तुझे शत-शत नमन हम, हो न तम का सामना|  
आसक्त तुझमें ही रहें हम,  बस  यही  है  कामना|५|

ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 25 जनवरी 2012

आजान गूँजें मस्जिदों में, मंदिरों में घंटियाँ

चित्र गूगल से साभार
नटखट कन्हैया जा रहे हैं, धर्म से अनजान हैं|
बैठे सकीना गोद में वे,  मंद  सी  मुस्कान   है||

यह दृश्य है अद्भुत अलौकिक, बन रहा पहचान है|
ऐसे सलीमों को नमन है,  देश  की  ये  शान  हैं|१|


भारत वतन समभाव का है,हैं विविध से गीत भी|
सद्भाव बहता है रगों में,    है  दिलों  में  प्रीत  भी|

आजान गूँजे मस्जिदों में,  मंदिरों   में   घंटियाँ|
मीठा मधुर संगीत बन के, भाव प्यारा हो बयाँ|२|

ऋता शेखर 'मधु'

!!!गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!!!


गुरुवार, 12 जनवरी 2012

लिपटे लटाई मंझ धागे,जीत का आगाज़ है


मकर संक्रंतिहरिगीतिका में


पावन  मकर संक्रांति  आया,  सूर्य  उत्तरायण  हुए|
उष्मा भरी अरु, ऊर्जा समायी, सब सरस सावन हुए||

खाते दही चूड़ा गजक हम, आज  यह  आहार  है|
सब देव जागे हैं जमीं पर, मन  रहा  त्योहार  है|१|


पंजाब में  यह लोहड़ी है,  बंग  में  संक्रांति है|
पोंगल तमिलनाडू मनाए, बिहु असम के संग है||

प्यारी पतंगें सज चुकी हैं,  यह  बना  परवाज़  है|
लिपटे लटाई मंझ धागे,  जीत  का  आगाज़  है|२|

ऋता शेखर मधु