ओ री सखी,
अंतस की पीर को
भावों की भीड़ को
ओढ़े हुए धीर को
फुहारों में बहाएँ, बस
थोड़े से बच्चे बन जाएँ|
ओ री सखी
आँखों के नीर को
ख्वाबों के खीर को
रिवाजों की जंजीर को
सागर में समाएँ, बस
थोड़े से बच्चे बन जाएँ|
ओ री सखी
द्रौपदी के चीर को
विष्णु के क्षीर को
ज़ख्म वाले तीर को
इतिहास में दफ़नाएँ, बस
थोड़े से बच्चे बन जाएँ|
ओ री सखी
हारी हुई तक़दीर को
मिटी हुई तहरीर को
किए गए तबदीर को
हँसकर गुनगुनाएँ, बस
थोड़े से बच्चे बन जाएँ|
ओ री सखी
वेदना के शूल को
उनकी हर भूल को
आँखों की धूल को
हवा में उड़ाएँ, बस
थोड़े से बच्चे बन जाएँ|
ऋता शेखर ‘मधु’