रविवार, 22 जुलाई 2012

थोड़े से बच्चे बन जाएँ...




ओ री सखी,
अंतस की पीर को
भावों की भीड़ को
ओढ़े हुए धीर को
फुहारों में बहाएँ, बस
थोड़े से बच्चे बन जाएँ|

ओ री सखी
आँखों के नीर को
ख्वाबों के खीर को
रिवाजों की जंजीर को
सागर में समाएँ, बस
थोड़े से बच्चे बन जाएँ|

ओ री सखी
द्रौपदी के चीर को
विष्णु के क्षीर को
ज़ख्म वाले तीर को
इतिहास में दफ़नाएँ, बस
थोड़े से बच्चे बन जाएँ|

ओ री सखी
हारी हुई तक़दीर को
मिटी हुई तहरीर को
किए गए तबदीर को
हँसकर गुनगुनाएँ, बस
थोड़े से बच्चे बन जाएँ|

ओ री सखी
वेदना के शूल को
उनकी हर भूल को
आँखों की धूल को
हवा में उड़ाएँ, बस
थोड़े से बच्चे बन जाएँ|

ऋता शेखर मधु

18 टिप्‍पणियां:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति सोमवार के चर्चा मंच पर ।।

    जवाब देंहटाएं
  2. हारी हुई तक़दीर को
    मिटी हुई तहरीर को
    किए गए तबदीर को
    हँसकर गुनगुनाएँ, बस
    थोड़े से बच्चे बन जाएँ|...वाह: ऋता खुबसूरत भाव और सुन्दर शब्दो के चयन ने रचना को बहुत ही सुन्दर बना दिया...

    जवाब देंहटाएं
  3. ज़रूरी है ... बच्चे ना बनें तो मासूमियत नहीं रहेगी , न नए हौसले

    जवाब देंहटाएं
  4. ओ री सखी
    वेदना के शूल को
    उनकी हर भूल को
    आँखों की धूल को
    हवा में उड़ाएँ, बस
    थोड़े से बच्चे बन जाएँ|

    गहन और उत्कृष्ट प्रस्तुति ....बहुत अच्छी लगी ...थोड़ी देर को बन ही गया मन बच्चा ...!!

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सही ...
    अगर हम थोड़े से बच्चे बन जाएं और निश्छल हो जाएँ तो कितना अच्छा हो !
    सुंदर रचना !
    सादर !!

    जवाब देंहटाएं
  6. Pahli baar aayee hun aapke blogpe....ab hamesha aatee rahungi. Bahut sundar likhtee hain aap.

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर ऋता जी.....
    हम थोड़े से नहीं पूरे बच्चे बन कए......ऐसा सुख और कहाँ....
    बहुत प्यारी रचना
    सस्नेह
    अनु

    जवाब देंहटाएं
  8. बच्चे मन के सच्चे,,,,आपने सही कहा,,,,

    बहुत बढ़िया प्रस्तुती, सुंदर रचना,,,,,

    RECENT POST काव्यान्जलि ...: आदर्शवादी नेता,

    जवाब देंहटाएं
  9. बस ये कर लें तो जीवन में नया उत्साह भर जायेगा , नयी ऊर्जा आ जाएगी..... बहुत सुंदर रचना

    जवाब देंहटाएं
  10. बेहतरीन भाव !

    ओ री सखी
    थोडे़ से नहीं पूरे
    बच्चे बन जायें
    बडे़ होने का लोभ
    यहीं छोड़ जायें
    बस खिलखिलायें !!

    जवाब देंहटाएं
  11. 'भूल जाएँ दुनियादारी, भूल के सारे ग़म...
    आओ चलो! फिर से एक बार...बच्चे बन जाएँ हम..."~
    बहुत सही कहा आपने ! काश! ऐसा गर हो जाए...
    तो दुनिया की आधी बीमारी यूँ ही हो जाए ख़त्म...!
    सादर !!!

    जवाब देंहटाएं
  12. सहमत ... अगर बच्चे बन जाएँ तो आधी बाते तो अपने आप ही खत्म हो जाये ... जीवन आनंदित हो जाए ..

    जवाब देंहटाएं
  13. ओ री सखी
    वेदना के शूल को
    उनकी हर भूल को
    आँखों की धूल को
    हवा में उड़ाएँ, बस
    थोड़े से बच्चे बन जाएँ|
    भावमय करता यह प्रयास ... अनुपम प्रस्‍तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  14. आपने सही कहा.............थोड़े से बच्चे बन जाएँ|

    जवाब देंहटाएं

आपकी टिप्पणियाँ उत्साहवर्धन करती है...कृपया इससे वंचित न करें...आभार !!!