मकर संक्रंति—हरिगीतिका में
पावन मकर संक्रांति आया, सूर्य उत्तरायण हुए|
उष्मा भरी अरु, ऊर्जा समायी, सब सरस सावन हुए||
खाते दही चूड़ा गजक हम, आज यह आहार है|
सब देव जागे हैं जमीं पर, मन रहा त्योहार है|१|
पंजाब में यह ‘लोहड़ी’ है, बंग में ‘संक्रांति’ है|
‘पोंगल’ तमिलनाडू मनाए, ‘बिहु’ असम के संग है||
प्यारी पतंगें सज चुकी हैं, यह बना परवाज़ है|
लिपटे लटाई मंझ धागे, जीत का आगाज़ है|२|
ऋता शेखर ‘मधु’