मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

मिट्टी की खुशबू

 मिट्टी की खुशबू और हम


जिस मिट्टी की तिलक लगाने

हम नीचे झुक जाते हैं

वह चंदन कण बन माथे पर

भारत  का मान बढ़ाते हैं


बारिश की वह प्रथम बूंद है

जो मिट्टी को महकाती है

सोंधी सोंधी खुशबू देकर

पकौडों को ललचाती है

मन मयूर बन जाता है

सतरंगी पँखो को खोले

विविध-भारती गाते हैं


मन सावन जब बने बसंती

दिख जाते हैं कृष्ण-राधिका 

ब्रज-माटी पर बसी प्रीत से

दर्शन की प्यासी बनी साधिका

मिट्टी की खुशबू जब उड़ती 

यमुना तट के कदम्ब पेड़ 

मुरली के राग सुनाते हैं।


मन ही मोहन, मन ही राधा

मन ही गोपियाँ मन अभिलाषा

मिट्टी की खुशबू मन जब मोहे

मीरा की बनती परिभाषा

मिट्टी से ही है जनजीवन 

मिट्टी पर उगकर नवरातों में

अन्न खुशी बरसाते हैं।


माटी घट के शीतल जल में

खुशबू उसकी घुल जाती है

मन वृंदावन हो जाता है

तृषित को तृप्ति मिल जाती है

खुशबू से हो प्रेम अपरिमित

जब तक मिट्टी न बन जायें

 फिर तो सागर इसे बहाकर 

दूर देश ले जाते हैं।


ऋता शेखर 'मधु'

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