मिट्टी की खुशबू और हम
जिस मिट्टी की तिलक लगाने
हम नीचे झुक जाते हैं
वह चंदन कण बन माथे पर
भारत का मान बढ़ाते हैं
बारिश की वह प्रथम बूंद है
जो मिट्टी को महकाती है
सोंधी सोंधी खुशबू देकर
पकौडों को ललचाती है
मन मयूर बन जाता है
सतरंगी पँखो को खोले
विविध-भारती गाते हैं
मन सावन जब बने बसंती
दिख जाते हैं कृष्ण-राधिका
ब्रज-माटी पर बसी प्रीत से
दर्शन की प्यासी बनी साधिका
मिट्टी की खुशबू जब उड़ती
यमुना तट के कदम्ब पेड़
मुरली के राग सुनाते हैं।
मन ही मोहन, मन ही राधा
मन ही गोपियाँ मन अभिलाषा
मिट्टी की खुशबू मन जब मोहे
मीरा की बनती परिभाषा
मिट्टी से ही है जनजीवन
मिट्टी पर उगकर नवरातों में
अन्न खुशी बरसाते हैं।
माटी घट के शीतल जल में
खुशबू उसकी घुल जाती है
मन वृंदावन हो जाता है
तृषित को तृप्ति मिल जाती है
खुशबू से हो प्रेम अपरिमित
जब तक मिट्टी न बन जायें
फिर तो सागर इसे बहाकर
दूर देश ले जाते हैं।
ऋता शेखर 'मधु'
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