हे श्रीराम
हे मर्यादापुरुषोत्तम
तुम तो रोम रोम में बसे हो
पर कभी कभी
तुम पर बहुत गुस्सा आता है
बेतुकी लगी न यह बात!
क्योंकि तुम प्रभु हो
प्रातः स्मरणीय हो
आराध्य देव हो
देव से गुस्सा कैसा!!
शिकायत कैसी!!!
पर गुस्सा तब आता है
जब सोचती हूँ
सीता के बारे में|
आदर्श पुत्र बनकर के
तुमने वनवास स्वीकार किया
चौदह वर्ष के विकट काल में
तुम अकेले वन में न भटको
तुम्हे साथ देने की खातिर उसने
सब सुखों का त्याग किया था
हे राम,
आखिर क्यों उस अनुगामिनी का
तुमने यूँ परित्याग किया था?
अशोक वाटिका में बैठी बैठी वह
नजरें नीची कर अड़ी रही
तुम्हारा नाम ही जपती जपती
दिन- रात वह पड़ी रही थी
हे राम,
आखिर क्यों बेकसूर होकर भी वह
अग्नि के बीच खड़ी हुई थी ??
तुम तो सीता को जीत लाए थे
सहगामिनी को फिर से पाकर
मन में खूब हरषाए थे
जानकी ने तुम्हारे शौर्य को
सदा ही नमस्कार किया था
हे राम,
किस मर्यादा की खातिर तुमने
फिर उसका तिरस्कार किया था ???
तुम्हारा कुलदीपक संजोए
जननी बनने को वह तत्पर थी
जब तुम्हारा साथ पाने का
उसको पूर्ण अधिकार था
हे राम,
किसे प्रसन्न करने की खातिर तुमने
उस ममतामयी का बहिष्कार किया था ????
नन्हे पुत्रों की किलकारी सुनने को
क्या कभी तुम्हारा मन नहीं ललचाया
लघु पादप को सींचने में
सीता ने बहुत सितम उठाया
हे राम,
क्यूँ पिता बन कर भी तुमने
जिम्मेदारियों को नहीं निभाया ?????
हे राम,
तुम अन्तर्र्यामी थे
तुम्हें मालूम था
सीता के साथ अन्याय हुआ था
तुमने और सीता ने तो
सिर्फ मानव स्वभाव चित्रित किया था
सीता ने भारतीय नारी के अनुगामिनी स्वभाव को
और तुमने.................................???
ऋता शेखर ‘मधु’