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गुरुवार, 12 जून 2025

परिधान

 परिधान

सभ्यता उन्नत हुई, तब आया परिधान।

पहनावा भी है  नियत, है इनका भी स्थान।।


लहँगा चुन्नी साड़ियाँ, दुल्हन का परिधान।

मंडप पर होता नहीं, जींस टॉप में दान।।


पूजाघर में सोच लो, बिकनी का क्या काम।

सूट साड़ी ओढ़नी, लेती उसको थाम।।


 स्वीमिंग पूल में कहाँ, साड़ी बाँधें आप।

सोचो ट्रैक सूट बिना, छोड़ें कैसे छाप।।


सेना वर्दी में रहें, तब होती पहचान।

स्कूल ड्रेस जब से बनी, बच्चे हुए एक समान।।


धोतियाँ शेरवानियाँ, लड़के पहनें सूट।

कश्मीरी जूता सहित, भाते उनको बूट।।


वस्त्रों से माहौल भी, पा जाता है भेद।

मातम में अक्सर मनुज, भाता रहा सफेद।।

ऋता शेखर


क्यों दिखलाते अंग को, कैसी है अब सोच।

गरिमा तन की भूलकर, दिखलाते हैं लोच।।


कितनी फूहड़ सी लगें, आधे वस्त्रों में नार।

उल्टे सीधे तर्क में, छोड़ें सद्व्यवहार।।

बुधवार, 10 अगस्त 2022

दोहा में नटराज


विषय- नटराज
============
शिव  ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में
चित्र गूगल से साभार



















1

चोल वंश ने कांस्य से, सृजित किया नवरूप।
तांडव मुद्रा में ढले, शिवजी लगे अनूप।।

2

शिव नर्तक के रूप में, कहलाये नटराज।
बस एक बार प्रेम से, दें उनको आवाज।

3

नृत्य करें नटराज जब, स्पंदित हो आकाश।
महायोगी महेश वह, उनसे है कैलाश।।

4

नटराजन के नृत्य से, कण कण भरे प्रमोद।
जग सारा गतिशील है, डमरू करे विनोद ।।

5

घूम रहे ब्रह्मांड में, नीलकंठ नटराज।
अंतरिक्ष की ओम ध्वनि, खोल रही यह राज।।

6

शर्व: हरो मृडो शिवः, या कह लें नटराज।
एक नाम है तारकः, डमरू जिनका साज़।।

7

शिव वेदांगों शाश्वतः, उनकी कृपा अपार ।
करने जग-कल्याण वह, आते बारम्बार ।।

8

चार भुजाओं से सजे, कदम उठे ज्यों ताल |
हर मुद्रा को सीखकर, नर्तक हैं मालामाल||

9

प्रीत भरा संसार हो, सद्भावी हो ठाँव |
बौनारूपी द्वेष पर, थिरके शिव के पाँव ||

10

एक हाथ में दिख रहा, डमरू जैसा साज| 
दूजे से जग को अभय, देते हैं नटराज ||

11

अनल घेर में हैं घिरे, लेकर ऊर्जा स्रोत |
आभामंडित शिव धरे,नृत्य पक्ष प्रद्योत||( नृत्य की एक मुद्रा)

@ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 12 दिसंबर 2021

दोहे



दोहे
1.
सुदामा संग कृष्ण ने, खींचा ऐसा चित्र |
बिना बोले समझ सके, वह है सच्चा मित्र ||
2.
एक ही खान में रहें, कोयला- कोहिनूर |
एक जलकर राख हुआ, एक न खोए नूर ||
3.
भवसागर में जब कभी, मिल जाए मझधार |
हर मा़ँझी को चाहिए, हिम्मत की पतवार ||
4.
प्राची में हो लालिमा , खग चहके चहुँ ओर |
वेद ऋचाओं से भरे, वह सिन्दूरी भोर ||
5.
आँखों में सपने भरे, पंखों में विस्तार |
सबके मन को जीतकर, जाती खुद को हार ||
6.
होता है हर बात में , समझ- समझ का फेर |
समझ सके न प्रीत लखन | राम चख लिये बेर ||
7.
मन पूरा ब्रह्मांड है, मन है विस्तृत व्योम |
बस थोड़ा सा ध्यान हो, गूँज उठेगा ओम ||
8.
मन मंदिर में जब बसे, रघुनंदन श्रीराम |
सारी चिंता त्याग कर, मन पाता विश्राम ||
9.
अंतर-आत्मा से सदा, निकले सच्ची बात |
मिलावट है दिमाग में, करे घात-प्रतिघात ||
10.
कड़े दन्त से जो भ्रमर, करे काष्ठ में छेद|
शतदल में कैदी बने, कैसा है यह भेद ||
--ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

चाँद-चाँदनी

 चाँद- चाँदनी...


चंदा की तुम चाँदनी, झरती सारी रात।

गगन अनोखा दे रहा, धरती को सौगात।।1


देख अमा की रात को, नहीं मनाना शोक।

घट-बढ़ ही है जिन्दगी, सीखे तुमसे लोक।।2


रूप रुपहला है मिला, लगते वृत्ताकार।

सूरज से रौशन रहे, लेकर किरण उधार।।3


तुमसे मनता चौथ है, तुम करवा त्योहार।

जग को तुम आशीष दो, मिले सभी को प्यार।।4


व्यथित हुई है चाँदनी, जाओ उसके पास।

क्यों छुपे अमा की रात में, क्यों करते परिहास।।5


जिस सूरज की रश्मियाँ, रखते अपने पास।

ग्रहण बने कृतघ्न तुम , देते हो संत्रास।।6


चन्द्र सलोने कृष्ण के, शायर के महबूब।

माँ की लोरी तुम बने, भाते सबको खूब।।7


बुढ़िया काते सूत जब, कट जाती है रात।

तन्हाई को बाँटकर, करते हो तुम बात।8


कहीं स्वप्न के पृष्ठ हो, कहीं किसी के राज।

गुड़िया के मामा बने, प्यारा हर अंदाज।।9

....ऋता शेखर

स्वप्न

तुम जब तक दूर हो

आँखों का नूर हो

तुम्हारे पूरा होते ही

तुम हकीकत हो जाओगे

तब फिर से उगेगा एक स्वप्न

फिर से परियों को पँख मिलेंगे

फिर से एक सफर का आगाज होगा

तब हकीकत बन गए स्वप्न तुम

सम्भाल लेना वह कहानी

जिसमें बिता दी हमने ज़िन्दगानी।

कल्पना का घोड़ा 

सपनों के तांगे में बैठ

गया है चाँद के पास

नटखट चाँदनी

झूला झुलाती हुई

उसे बहला रही ।

तारे भी आ गए 

सब हो गए हैं मगन 

स्वप्नों के आसपास

सब के नए स्वप्न हैं

सबका है नया आकाश।

*****

चाँद रोता है

धरती भी भीगती है

कभी भोर होते ही

हरे घास की कालीन पर

चलकर तो देखना

कभी 

हरसिंगार की पंखुड़ियों को

सहलाकर देखना

@ ऋता शेखर मधु


शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

हंस एवं गयंद दोहा

9
हंस दोहा

14 गुरु और 20 लघु वर्ण
112 112 2 12 11 22 1121
211 11 2 21 2 112 11 2 21

बगिया इतराती फिरी, चहकी आज उमंग।
भावन लगते हैं सभी, जब हों अपने संग।।

इहलौकिक होने लगे, परिजाती मकरंद।
आखर पुखराजी हुए, रचते ग़ज़लें छंद।।

पद पाकर जो नम्र हैं, उन सा कौन महान।
लो अनुभव की खान से, मनु, कंचन सा ज्ञान।।
10
गयंद दोहा

13 गुरु और 22 लघु वर्ण
2121 112 12, 2121 11 21
11 1111 2 21 2, 2 121 11 21

प्रेम से हृदय जो भरे , बाँट दो सरस बात।
महक सहज ही दे रहे, स्वर्ग -पुष्प परिजात।।

बेटियाँ सफल हो रहीं, गर्व से पँख पसार।
धरम भरम से मुक्त हैं, सोच लेख सुविचार।।

रौंदते पग सहे सदा, की न दर्द पर आह।
गणपति उसको धार लें, दूब की सरल चाह।।

लोभ मोह पद से परे, हो विनम्र व्यवहार।
सरल सहज मुस्कान से, जीत लें हृदय हार।।

झूमते हरित पात हैं, हो बयार जब मंद।
सुमन सुरभि निःस्वार्थ है, स्वार्थ में मनुज फंद।।




गयंद दोहा में शिव 🙏
देख मौन शिव ने दिया, शब्द एक ध्वनि ओम|
डमडम डमरू जो बजे, गूँजता सकल व्योम ||

ओम ओम धरती कहे, ओम है अथक नाद|
प्रमुदित शिव आशीष दें, दुग्ध धार कलनाद||

अर्ध अंग शिव -शक्ति का, है विवाह शुभ रात|
चिर परिणय की ये कथा, गौर गंग अहिवात||
-ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

दोहों के प्रकार - 8 - नर दोहा।

दोहों के प्रकार - 8 - नर दोहा।
दोहों के तेईस प्रकार होते है।

वैसे 13-11के शिल्प से दोहों की रचना हो जाती है जिनमें प्रथम और तृतीय चरण का अंत लघु गुरु(12) से तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण का अंत गुरु लघु(21) से होता है।दोहे में कुल 48 मात्राएँ होती हैं।

आंतरिक शिल्प की बात करें तो दोहे 23 प्रकार के होते हैं ।
८...नर दोहा-
15 गुरु 18 लघु=48
222112111,11221121
112221112,2221121

स्याही में नव प्रीत भर, लिख दो आज उमंग।
नव गीतों में उड़ चली, प्यारी पीत पतंग।।1

जो देखो लिख दो मनुज, सच होता इतिहास।
उसकी है कीमत बड़ी, त्यागे जो उपहास।।2

प्रीती प्रेम गुलाब बन, बिखरा है चहुँ ओर।
खुशबू फैली उर खिले, पाए आज न छोर।।3
-ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

दोहों के प्रकार-४ श्येन,५ मण्डूक,६ मर्कट,७ करभ दोहे

दोहे तेइस प्रकार के होते हैं...पिछले पोस्ट में तीन प्रकार के दोहे प्रकाशित हैं|
4- श्येन दोहा
19 गुरु और 10 लघु वर्ण

22 2 11 2 12 ,22 2 2 21
2 2 12 121 2, 222 1121

भोले फूल समेटते, प्यारी- प्यारी गंध।
ज्यों ही हवा चली वहाँ, टूटे हैं अनुबंध।।1

यादों की परछाइयाँ, यादों की है धूप।
चाहे रहे स्वरूप जो, भाते हैं हर रूप।।2

अच्छे राजन का सदा, होता है सम्मान।
साथी रही प्रजा जहाँ,होता देश महान।।3

दोनों ही उलझे रहे, लम्बाई को तान।
क्यों एक से लगे हमें, धागे और जुबान।।4

चारों ओर चली हवा, बागों में है शोर।
देखो उन्हें लुभा रही, जो जागे अति भोर।।5


टूटे पात जुड़ें नहीं, ऐसी ही है रीत।
साथी कभी न तोड़ना, रिश्तों वाली प्रीत।।6
--ऋता शेखर मधु

5.मण्डूक दोहा-

18 गुरु 12 लघु=48

112112212,1212221
22112212, 222221

जग में अपना कौन है, हुआ पराया कौन।
काँधे रख दे हाथ जो, या हो जाए मौन।।

मन निश्छल निष्पाप हो, तभी झुकाओ शीश।
जैसी जिसकी सोच हो, वैसा देते ईश।।

गुलमोहर के फूल ने, सदा सिखाई बात।
जो भी सह ले धूप को, संजोता औकात।।

--ऋता शेखर 'मधु'

6.मर्कट दोहा

17 गुरु 14 लघु=48

112211212,222221
112121212,2221121

जल ही जीवन का सदा, होता है आधार।
हर बूँद जो सहेज लें, लौटेगी जलधार।।1

मन को भावन से लगे, बंजारों के गीत।
लगता उन्हें पुकारते, जो खोए घर मीत।।2

जग में सुन्दर नाम हैं, या कृष्णा या राम।
दृग ढूँढते रहे उन्हें, घूमे थे जब धाम।।3

रवि डूबे जब झील में, सोये सारी रात।
मिलती हमें निशा सखी, होती जी भर बात।।4

बगिया में कलियाँ खिलीं, बासंती है राग।
मन बावरा उड़ा फिरे, ढूँढे ढोलक फाग।।5

-ऋता शेखर 'मधु'

7.करभ दोहा-

16 गुरु 16 लघु=48

112211212,21121121
12122212,1212221

पथ आसान मिले किसे, कौन रहे निष्पात।
इसे लिखा है ईश ने, हमें कहाँ है ज्ञात।।

पुरवाई चलने लगी, शीतल है अहसास।
छुईमुई सी पाँखुड़ी, भरे अनोखी आस।।

मत काटो उस पंख को, जो लिखते अरमान।
जहाँ पली हैं बेटियाँ, वहाँ बढ़ी है शान।।

घर आये ऋतुराज हैं, लेकर पुष्प हजार।
रचो सदा माँ शारदे, सुज्ञान का संसार।।

तन पीले परिधान से, आज सजा लो मीत।
उड़े परागी रंग हैं, रिझा रही है प्रीत।।

-ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 22 दिसंबर 2019

दोहों के प्रकार3- शरभ छंद

दोहों का सामान्य शिल्प 13-11 का होता है।
आंतरिक शिल्प के आधार पर दोहे 23 प्रकार के होते है।
यह है तीसरा प्रकार...छंद विशेषज्ञ नवीन सी चतुर्वेदी जी के दोहे उदाहरणस्वरूप दिए गए हैं।
उसी आधार पर मैंने भी कोशिश की है।
शरभ दोहा
20 गुरु और 8 लघु वर्ण
22 2 11 2 12, 22 2 2 21
2 2 2 221 2, 222 11 21
रम्मा को सुधि आ गयी, अम्मा की वो बात।
जी में हो आनन्द तो, दीवाली दिन-रात।।
-- नवीन सी चतुर्वेदी

पानी भोजन श्वास में, है प्राणों का सार
पौधों पेड़ों ने रचे, ऊर्जा स्रोत अपार।।

माया कंचन कामना, हैं दुःखों के मूल।
माँगी थीं सारंग को, वैदेही छल भूल।।

पैसों को धन मानते, रिश्तों को व्यापार।
ऐसे लोगों में कहाँ, होता प्यार -दुलार।।

खेतों में सरसों खिली, जाड़े की है धूप।
भोली भाली कामना, माँगे रूप अनूप।।

पौधे और नदी मिले, बासंती है गान।
कान्हा ने जो भी दिया, मानो है वरदान।।
--ऋता शेखर 'मधु
सौजन्य: साहित्यम ब्लॉग से साभार

दोहों के प्रकार 2- सुभ्रमर दोहा

दोहों के प्रकार पर कार्यशाला 2 - सुभ्रमर दोहा
दोहों के तेईस प्रकार होते है।
वैसे 13-11के शिल्प से दोहों की रचना हो जाती है जिनमें प्रथम और तृतीय चरण का अंत लघु गुरु(12) से तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण का अंत गुरु लघु(21) से होता है।दोहे में कुल 48 मात्राएँ होती हैं।
आंतरिक शिल्प की बात करें तो दोहे 23 प्रकार के होते हैं । हर शिल्प के लिए दोहों के अलग-अलग नाम हैं। ये सज्जा एवं नाम गुरु वर्णों के अवरोह क्रम में रखे गए हैं।मेरी कोशिश है कि हर प्रकार के कुछ दोहे लिख सकूँ तथा मित्रों को भी बता सकूँ। इसी कोशिश में दूसरा प्रकार आप सभी के अवलोकनार्थ प्रस्तुत है।इन दोहों की समीक्षा प्रार्थित है। पिछली कार्यशाला में प्रकाशित भ्रमर दोहों का थोड़ा रूपांतरण करके सुभ्रमर बनाया है जिससे समझने में आसानी हो।यहाँ प्रथम चरण में चौथे गुरु को दो लघु किया गया है, बाकी सारे यथास्थान हैं।
सुभ्रमर दोहा-
21 गुरु 6 लघु=48
22211212,222221
2222212,222221

पानी भोजन श्वास में, है प्राणी का सार।
पौधों पेड़ों ने रचे, जीवन का आधार।।

काया दौलत के बिना, सूना है संसार।
वाणी योगी साधना, ले जाएँगे पार।।

झूमी गाकर जिंदगी, ले फूलों का साथ।
माथे माथे हों सजे, कान्हा जी के हाथ।।

ऊर्जा से भरपूर हैं, खाते-पीते लोग।
हीरे को हीरा मिले, हो ऐसा संजोग।।

फूलों से खुशबू मिली, खानों से सौगात।
चंदा से है चाँदनी, पेड़ों से हैं पात।।

--ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 21 दिसंबर 2019

दोहों के प्रकार 1- भ्रमर दोहा

दोहों के प्रकार पर आज की कार्यशाला 1-
भ्रमर दोहा
दोहों के तेईस प्रकार होते है।
वैसे 13-11के शिल्प से दोहों की रचना हो जाती है जिनमें प्रथम और तृतीय चरण का अंत लघु गुरु से तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण का अंत गुरु लघु से होता है।कुल 48 मात्राएँ होती हैं।
किंतु आंतरिक शिल्प की बात करें तो दोहे 23 प्रकार के होते हैं । हर शिल्प के लिए दोहों के अलग-अलग नाम हैं। ये सज्जा एवं नाम गुरु वर्णों के अवरोह क्रम में सजाए गए हैं।मेरी कोशिश है कि हर प्रकार के कुछ दोहे लिख सकूँ तथा मित्रों को भी बता सकूँ। इसी कोशिश में प्रथम प्रकार आप सभी के अवलोकनार्थ प्रस्तुत है। यहाँ 22 गुरु वर्ण तथा 4 लघु वर्णों का प्रयोग किया गया है।
1
भ्रमर दोहा-
22 गुरु 4लघु=48
2222212,222221
2222212,222221
खाना पानी श्वास में, है प्राणी का सार।
पौधों पेड़ों ने रचे, जीने का आधार।।

माया काया के बिना, सूना है संसार।
वाणी योगी साधना, ले जाएँगे पार।।

झूमे गाये जिंदगी, हो फूलों का साथ।
माथे माथे हों सजे, कान्हा जी के हाथ।।

आती जाती जिंदगी, खोते पाते लोग।
हीरे को हीरा मिले, हो ऐसा संजोग।।

चंदा से है चाँदनी, पेड़ों से हैं पात।
फूलों से खुश्बू मिली, खानों में सौगात।।
--ऋता शेखर 'मधु'
सौजन्य- साहित्यम ब्लॉग से साभार

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

आखिर ऐसा क्यों हुआ,समझाओ श्रीमान


गुलमोहर खिलता गया, जितना पाया ताप |
रे मन! नहीं निराश हो, पाकर के संताप |।१

उसने रौंदा था कभी, जिसको चींटी जान।
वही सामने है खड़ी, लेकर अपना मान।।२

रटते रटते कृष्ण को, राधा हुई उदास।
चातक के मन में रही, चन्द्र मिलन की आस।।३

रघुनन्दन के जन्म पर, सब पूजें हनुमान।
आखिर ऐसा क्यों हुआ,समझाओ श्रीमान।।४

आलस को अब त्याग कर, करो कर्म से प्यार।
घिस-घिस कर तलवार भी, पा जाती है धार।।५

जीवन है बहती नदी, जन्म मृत्यु दो कूल।
धारा को कम आँक कर, पाथर करता भूल।।६

ऋता




मंगलवार, 1 मई 2018

प्रेम लिखो पाषाण पर, मन को कर लो नीर।

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प्रेम लिखो पाषाण पर, मन को कर लो नीर।
बह जाएगी पीर सब, देकर दिल को धीर।।1

मन दर्पण जब स्वच्छ हो, दिखते सुन्दर चित्र।
धब्बे कलुषित सोच के, धूमिल करें चरित्र।।2

मन के तरकश में भरे, बोली के लख बाण।
छूटें तो लौटें नहीं, ज्यों शरीर के प्राण।।3

अवसादों की आँधियाँ, दरकाती हैं भीत।
गठरी खोलो प्रीत की, जाए समय न बीत।।4

अमरबेल सा बढ़ गयी, मनु की ओछी बात।
शनै शनै होने लगा,मधुर सोच का पात।।5

उम्र बनी हैं पादुका, पल बन जाता चाल।
तन बचपन को छोड़कर, उजले करता बाल।।6

समय पर अधिकार नहीं, वश में रहती याद।
भूलें उनमें नीम को, आम रखें आबाद।।7

कौन सफल कितना कहो, कैसे हो यह माप।
यश, वैभव या विद्वता, खुद ही जानो आप।।8

तेज भागती जिंदगी, ब्रेकर की है नीड।
उतार चढ़ाव दुःख सुख, कंट्रोल करे स्पीड।।9

मन यायावर बावरा, करे जगत की सैर।
अपनी जूती ढूँढते, सिंड्रेला के पैर ।।10

जो एसी में बैठकर, दिनभर रहते मस्त।
गर्मी के अहसास से, कब होते हैं त्रस्त।।11

गर्मी के अहसास को, शीतल करती छाँव।
तरु को अब मत काट मनु, बिलख रहा है गाँव।12
-ऋता

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

आत्मबोध जागृत रहे, कर में हो संघर्ष--दोहे

जब छाए मन व्योम पर, पीर घटा घनघोर|
समझो लेखन बढ़ चला, इंद्रधनुष की ओर||

दिशा हवा की मोड़ते, हिम से भरे पहाड़।
हिम्मत की तलवार से, कटते बाधा बाड़।।

खुशी शोक की रागिनी, खूब दिखाते प्रीत।
जीवन के सुर ताल पर, गाये जा तू गीत।।

शब्द शब्द के मोल हैं, शब्द शब्द के बोल।
मधुरिम बात विचार से, शब्द हुए अनमोल||

नफऱत कभी न कीजिये, ना कीजे अभिमान।
घुन समान खोखल करे, मन के सारे ज्ञान।।

हरे भरे मन खेत पर, उगे ज्ञान का धान।
छल के खरपतवार से, कुंठित होता मान।।

जग के माया मोह में, आते खाली हाथ।
सखा बना लो पुण्य को, वही चलेंगे साथ।।

आत्मबोध जागृत रहे, कर में हो संघर्ष|
आत्मशक्ति लिखती रही, जीवन का उत्कर्ष||

भाई है इक छोर पर, बहना दूजी ओर|
ये मीलों की दूरियाँ, पाटें रेशम डोर||

लिखने को तो सब लिखें, रचते हैं कुछ चंद।
छोड़े गहरी छाप जो, वही है प्रेमचंद।।

ज्ञानी ध्यानी नम्र हो, फिर भी करना शोध।
छीने आधी बुद्धि को, तेरा अपना क्रोध ।।

बात बात पर दे रहे, फूलों की सौगंध।
बगिया मुरझाने लगी, खोकर अपनी गंध।

बहु रंगों को धारता, कृष्ण मयूरी पंख।
श्याम दरस की आस से , विकल बजावे शंख।।

अफ़रातफ़री से कहाँ,होते अच्छे काम।
सही समय पर ही लगे,मीठे मीठे आम||
--ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 19 जुलाई 2017

दोहे की दुनिया

दोहे

1
बहन रेशमी डोर को, खुद देना आकार |
चीनी राखी त्याग कर, पूर्ण करो त्योहार||
2
महकी जूही की कली, देखन को शुभ भोर
खग मनुष्य पादप सभी, किलक रहे चहुँ ओर
3
मन के भीतर आग है, ऊपर दिखता बर्फ़।
अपने अपनों के लिए, तरल हुए हैं हर्फ़।।
4
ज्ञान, दान, मुस्कान धन, दिल को रखे करीब।
भौतिक धन ज्यों ज्यों बढ़े, होने लगे गरीब।।
5
जब जब भी उठने लगा, तुझपर से विश्वास|
दूर कहीं लहरा गई, दीप किरण सी आस||
6
इधर उधर क्या ढूँढता, सब तेरे ही पास|
नारिकेल के बीच है, मीठी मीठी आस||
7
अफ़रातफ़री से कहाँ,होते अच्छे काम।
सही समय पर ही लगे,मीठे मीठे आम||
8
बिन काँटों के ना मिले, खुश्बूदार गुलाब|
सब कुछ दामन में लिए, बनो तुम आफ़ताब||
9
पावन श्रावण मास की, महिमा अपरम्पार।
बूँद बूँद है शिवमयी, भीगा है संसार।।.
10
जब जब पढ़ते लिस्ट में, लम्बी चौड़ी माँग|
नीलकंठ भगवान को,तब भाते हैं भाँग||
11
फूल खिलें सद्भाव के, खुश्बू मिले अपार।
कटुक वचन है दलदली, रिश्तों को दे मार।।

--ऋता

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

दोहे



1.
फूल शूल से है भरा दुनिया का यह पन्थ
चक्षु सीप में रच रहा बूँदों का इक ग्रन्थ
2.
ज्ञान डोर को थाम कर तैरे सागर बीच
तंतु पर है कमल टिका छोड़ घनेरी कीच
3.
पहन सुनहरा घाघरा, आई स्वर्णिम भोर
देशवासियो अब उठो, सरहद पर है चोर
4.
तपी धरा वैशाख की आया सावन याद
मन की पीर कौन गहे गुलमोहर के बाद
5.
शब्द चयन में हो रही जबसे भारीभूल
राई से पर्वत बने उड़े बात के धूल
6.
बेचैनी से घूमते हवाजनित ये रोग
राजनीति के पेंच में उलझे उलझे लोग
7.
क्या देना क्या पावना जब तन त्यागे प्राण
तड़प तड़प के हो गई याद मीन निष्प्राण

--ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 2 मार्च 2017

ये मिजाज़ है वक़्त का



अपने गम को खुद सहो, खुशियाँ देना बाँट
अर्पित करते फूल जब, कंटक देते छाँट

ये मिजाज़ है वक़्त का, गहरे इसके काज
राजा रंक फ़कीर सब, किस विधि जाने राज

दुख सुख की हर भावना, खो दे जब आकार
वो मनुष्य ही संत है, रहे जो निर्विकार

दरिया हो जब दर्द का, रह रह भरते नैन
हल्की सी इक ठेस भी, लूटे दिल का चैन

उड़ती हुई सोन चिड़ी, जा उलझी इक झाड़
ज्यों फड़काती पंख वो, बढ़ती जाती बाड़

गर्म तवे पर गिर गया, एक बूँद जो नीर
नाच नाच विलुप्त हुआ, कह ना पाया पीर

तितली भँवरे ने किया, फूल फूल से प्यार
हुलस हुलस कहती फ़िजा, सुन्दर है संसार

न दिख रही हैं तितलियाँ, न है भ्रमर का शोर
सिमट रही है वाटिका, घर है चारो ओर

सौ सौ हों बीमार जब, का करि एक अनार
सौ कामों के बोझ से, दबा रहा इतवार
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सब सुनाने लगे दास्ताँ अपनी अपनी
रफ़्ता रफ़्ता मैं चाँद हो गया

वक्त हमारा इंतजार नहीं करता
हम वक्त का क्यों करे
जो ख्वाब अधूरे हैं
पूरा करने में जुट जाएँ
आगे ये न कहें -"वक्त ही नहीं मिला "
तब वही वक्त कहेगा-"मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ था"

काँटे मिलें या चाँटे
हमने तो बस
गुलाब ही बाँटे
मुक्तक

अंतस में हों भाव सुनहरे मुखड़े तभी सजा करते हैं
खिले गुलाबी रौनक से ही नैनन पात पढ़ा करते हैं
उबड़ खाबड़ रस्तो पर मनुज धैर्य से चलते जाना
बुलंद इरादों वाले ही चेहरों पर दृढ़ता गढ़ा करते हैं

गर गुलाब से जीवन की चाहत हो
दोस्ती काँटों से भी करना होगा
हुनर की खुश्बू फिजाओं में होगी
धैर्य की नदिया में भी बहना होगा
शे'र
बशर की हुनर में है पहचान उसकी
वो मिटकर भी दुनिया में आता रहेगा

किसे ये पता है किसे ये ख़बर है
वो किस किस को मरकर रुलाता रहेगा

रविवार, 20 नवंबर 2016

मूक बनोगे आज जब, हो जाएगी चूक

दो पहलू हर बात के, सहमति और विरोध
कह दो मन के भाव को,नहीं कहीं अवरोध


मूक बनोगे आज जब, हो जाएगी चूक
होंगे कल के बोल तब, वीराने की कूक


चुप रहने से जिंदगी, बदले अपनी चाल
क्यों पूछे उस वक्त में, कोई तुम्हारा हाल


नित नित लिखते मित्र जो, बनते थे चर्वाक
चुप रहकर के वो बने, बड़े चतुर चालाक


रुक जाए जो लेखनी, कौन बने आवाज
खंगालो इतिहास को, कवि बदलो अंदाज


--ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 26 सितंबर 2016

हम भारत की बेटियाँ, देंगे अरि को मात

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वीरों को नमन...

हँसते हँसते देश पर, जो होते कुर्बान
भारत को आज भी, उनपर है अभिमान

शोकाकुल सरिता थमी, थमे पवन के पाँव
गम में डूबा है नगर, ठिठक रही है छाँव

लोहित होता है गगन, सिसक रहे हैं प्राण
इधर बजी है शोक धुन, उधर मचलते बाण

होती है खामोश जब, चूड़ी की झनकार
विधवा सूनी माथ पर, लिखती है ललकार

सिर से साया उठ गया, छूट गया है साथ
आज सलामी दे रहे, नन्हे नन्हे हाथ

लिखें शहीद समर सफर, परिणीता के नाम
पग पग पर हैं ठोकरें, लेना खुद को थाम

वीर पिता की राख से, कहतीं मन की बात
हम भारत की बेटियाँ, देंगे अरि को मात

आततायियों से कहो, कब तक रहें विनीत
भरना है हुँकार अब, निभा युद्ध की रीत
--ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 4 जून 2016

सुप्रभाती दोहे - 4

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आनत लतिका गुच्छ से, छनकर आती घूप
ज्यों पातें हैं डोलतीं, छाँह बदलती रूप 40

खग मानस अरु पौध को, खुशियाँ बाँटे नित्य
कर ले मेघ लाख जतन, चमकेगा आदित्य

दुग्ध दन्त की ओट से, आई है मुस्कान
प्राची ने झट रच दिया, लाली भरा विहान

लेकर गठरी आग की, वह चलता दिन रात
बदले में नभ दे रहा, तारों की सौगात

नित दिन ही चलता रहे, नियमित जीवन चक्र
बोली में जब व्यंग्य हो, ग्रहण सूर्य हो वक्र

सौरमंडल बना रहा, इक कर्मठ सरकार
सूरज तो सिरमौर है, मेघ खा रहे खार

ब्रम्हांड में गूँज रहा, कपालभाति का ओम्
बड़ी अनोखी है ख़ुशी, झूम रहा है व्योम

जब जब ये सूरज करे, तपते दिन का ज़िक्र
तब तब होती चाँद को, शीतलता की फ़िक्र

सूरज की हर इक किरण, रच देती है गीत
नारंगी में वीर रस, नील श्याम की प्रीत 

लेखन में लेकर चलें, सूरज जैसा ओज
शीतल मन की चाँदनी, पूर्ण करे हर खोज
-----ऋता....

शनिवार, 14 मई 2016

सुप्रभाती दोहे-3









हरी दूब की ओस पर, बिछा स्वर्ण कालीन

कोमल तलवों ने छुआ, नयन हुए शालीन 30

छँट जाती है कालिमा, जम जाता विश्वास
जब आती है लालिमा, पूरी करने आस

ज्यों ज्यों बढ़ता सूर्य का, धरती से अनुराग
झरता हरसिंगार है, उड़ते पीत पराग

पहन लालिमा भोर की, अरुण हुआ है लाल
चार पहर को नापकर, होता रहा निहाल 

सूर्य कभी न चाँद बना, चाँद न बनता सूर्य
निज गुण के सब हैं धनी, बंसी हो या तूर्य

पर अवलम्बन स्वार्थ की, कभी न थामो डोर
निष्ठा निश्चय अरु लगन, चले गगन की ओर

सुबह धूप सहला गई, चुप से मेरे बाल
जाने क्यों ऐसा लगा, माँ ने पूछा हाल

हवा लुटाती है महक, मगर फूल है मौन
श्रम सूर्य के साथ चला, उससे जीता कौन

प्रेमी तारा भोर का, गाता स्वागत गान
उतरीं रथ से रश्मियाँ, लिए मृदुल मुस्कान

शुष्क दरारों से सुनी, मन की करुण पुकार
रवि नीरद की ओट से, देने लगे फुहार