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सोमवार, 8 मार्च 2021

महिला दिवस की क्षणिकाएँ

महिला दिवस की क्षणिकाएँ शुभकामनाओं के साथ 🌹🌹

1
जो तन मन से रहे
हरदम घर में रत
तभी तो  संसार में
नाम पड़ा औ-रत।
2
चकरघिन्नी देखने को
इधर उधर न झाँको
दिख जाएगी घर में ही
नजर खोलकर ताको।
3
भोर की लालिमा में
पूजा का आलोक है
महिला के जाप में
गायत्री का श्लोक है।
4
छोड़ रहा छाप है
पाँव का आलता
बिछड़न का दुःख
बेटी को सालता।
5
महिला की महिमा
ईश्वर भी जानते
शक्ति के रूप में
दुर्गा को मानते।
6
जब जब पड़ा है
त्याग का काम
पुरुषों ने कर दिए
महिलाओं के नाम।
7
जिसके आँचल पर टिकी
इस सृष्टि की आशा
लिख  सका है कौन
नारी की परिभाषा।
8
जिसके आँचल में बँधी
दो दो कुल की मर्यादा
माप सका न धीर कोई
राजा हो या प्यादा।
9
नारी को स्वीकार नहीं
बनना चरणों की रज
वक्त की पुकार पर वह
मुट्ठी में बाँध रही सूरज।
10
शीतल छाँव को खोजने
दुनिया सारी घूम आया
खुद को अज्ञानी समझा
जब आँचल माँ का पाया।
11
जिससे घर, घर लगता है
रखते उससे गिला
महिला को भी चाहिए
काम का सिला।
🙏🙏🌹🌹
ऋता शेखर 'मधु'




बुधवार, 25 नवंबर 2020

क्षणिकाएँ

क्षणिकाएँ

------------- 

१.

आँधियाँ चलीं

दो पँखुरी गुलाब की

बिखर गईं टूटकर

मन पूरे गुलाब की जगह

उन पँखुरियों पर 

अटका रहा|

2

रेगिस्तान में

आँधियों ने मस्ती की

रेत से भर गई थीं आँखें

आँखों पर 

होने चाहिये थे

चश्मे


3

हवा स्थिर थी

जब रौशन किया था 

एक दीया

मचल गई ईर्ष्यालु आँधी

और 

लौ को हाथों की ओट

दे दिया हमने 

--ऋता

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

शरद पूर्णिमा

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1
चाँदनी युक्त
गर्वीला रूप तेरा
सम्पूर्ण तुम
आज की रात
तीन रंग की चुन्नी
ओढ़ ली मैंने
चन्दा, बता दे जरा
कहाँ है मीत मेरा।


2
खिलखिलाता
चन्द्रमा रुपहला
मुग्धा नायिका
पी के आलिंगन में
घूँट घूँट पी रही
अमृत धारा।

3
तुम्हे सताने
छुप जाती चाँदनी
तड़पे तुम
अमा में सारी रात
ऐ चाँद
कभी तुम भी तो कहो
अपने दिल की बात
4
शरद पूर्णिमा
चन्दा मामा की
सज धज निराली
लपका मुन्ना
खिलखिल कर
माँ ने बुलाया
आओ बेटा
चांदी की कटोरी में
खीर भरें हम सब
आएगी चाँदनी मामी
रूप और मिठास लिए
अंजुरी भर आस लिए।
--ऋता शेखर मधु

मुक्तक

बाँटना हो गर तुम्हें कुछ, बाँट दो शुभ ज्ञान को|
त्यागना हो गर तुम्हें कुछ, त्याग दो अभिमान को|
जिंदगी में हर कदम पर शुभ्रता शुचिता रहे,
वक्त देकर जब सहेजो वृद्ध की मुस्कान को|

-ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 2 मार्च 2017

ये मिजाज़ है वक़्त का



अपने गम को खुद सहो, खुशियाँ देना बाँट
अर्पित करते फूल जब, कंटक देते छाँट

ये मिजाज़ है वक़्त का, गहरे इसके काज
राजा रंक फ़कीर सब, किस विधि जाने राज

दुख सुख की हर भावना, खो दे जब आकार
वो मनुष्य ही संत है, रहे जो निर्विकार

दरिया हो जब दर्द का, रह रह भरते नैन
हल्की सी इक ठेस भी, लूटे दिल का चैन

उड़ती हुई सोन चिड़ी, जा उलझी इक झाड़
ज्यों फड़काती पंख वो, बढ़ती जाती बाड़

गर्म तवे पर गिर गया, एक बूँद जो नीर
नाच नाच विलुप्त हुआ, कह ना पाया पीर

तितली भँवरे ने किया, फूल फूल से प्यार
हुलस हुलस कहती फ़िजा, सुन्दर है संसार

न दिख रही हैं तितलियाँ, न है भ्रमर का शोर
सिमट रही है वाटिका, घर है चारो ओर

सौ सौ हों बीमार जब, का करि एक अनार
सौ कामों के बोझ से, दबा रहा इतवार
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सब सुनाने लगे दास्ताँ अपनी अपनी
रफ़्ता रफ़्ता मैं चाँद हो गया

वक्त हमारा इंतजार नहीं करता
हम वक्त का क्यों करे
जो ख्वाब अधूरे हैं
पूरा करने में जुट जाएँ
आगे ये न कहें -"वक्त ही नहीं मिला "
तब वही वक्त कहेगा-"मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ था"

काँटे मिलें या चाँटे
हमने तो बस
गुलाब ही बाँटे
मुक्तक

अंतस में हों भाव सुनहरे मुखड़े तभी सजा करते हैं
खिले गुलाबी रौनक से ही नैनन पात पढ़ा करते हैं
उबड़ खाबड़ रस्तो पर मनुज धैर्य से चलते जाना
बुलंद इरादों वाले ही चेहरों पर दृढ़ता गढ़ा करते हैं

गर गुलाब से जीवन की चाहत हो
दोस्ती काँटों से भी करना होगा
हुनर की खुश्बू फिजाओं में होगी
धैर्य की नदिया में भी बहना होगा
शे'र
बशर की हुनर में है पहचान उसकी
वो मिटकर भी दुनिया में आता रहेगा

किसे ये पता है किसे ये ख़बर है
वो किस किस को मरकर रुलाता रहेगा

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

क्षणिकाएँ



१.
सदा निभाए साथ तुम्हारा
खाकर अनगिन ठोकर
संस्कार की जड़ गहरी थी
रहे तुम्हारे होकर|
२.
डैने कमजोर थे
निरीह था फाख्ता
मन का मजबूत था
उड़ा बे-साख्ता|
३.
नन्ही अँगुली थामकर
सिखाया आखर-घट खोलना
वही सिखाता शिद्दत से अब
‘मम्मा, तुम ऐसे बोलना|”
४.
बात सच्ची थी
बात अच्छी थी
झूठ की दहलीज पर
गिर पड़ी भरभराकर
पक्की बात की
प्रस्तुति शायद कच्ची थी|
५.
झनके कँगना
मेहदी भी न छूटी
लीप रही अँगना
६.
सरल व्यक्तित्व
मोहक मुस्कान
सात वचन के घेरे में
भरती सिसकी
खोता अस्तित्व|
७.
निष्कंप थी लौ
दृढ़ विश्वास संग
कुछ यूँ जली
आँधियों की कोशिश
नाकाम कर गई।
८.
क्यूँ कभी-कभी
निर्दोष होकर भी
खुद को पाते
कटघरे में स्तब्ध
बन जाते निःशब्द|
९.
वो मुहब्बत थी
या हृदय की पीर
शब्दों के साँचे में
ग़ज़ल बन गई
कवि-दिल की ‘आह’
पाठकों की ‘वाह’ बन गई|
१०.
मेरी बात उसकी बात
गप्प में रहती सबकी बात
वो झूठा मैं सच्चा हूँ
इसी में होती दिन से रात
--ऋता शेखर 'मधु'