ऋतुराज को आना पड़ा है – हरिगीतिका छंद
फिर वाटिका चहकी खुशी से,खिल उठे परिजात
हैं।
मदहोशियाँ फैलीं फ़िजाँ में, शोखियाँ दिन रात हैं।।
मदहोशियाँ फैलीं फ़िजाँ में, शोखियाँ दिन रात हैं।।
मीठी बयारों की छुअन से, पल्लवित हर पात
है ।
ना शीत है ना ही तपन है, बौर की शुरुआत है।।
ना शीत है ना ही तपन है, बौर की शुरुआत है।।
मौसम सुहाना कह रहा है, कोकिलों, चहको जरा।
परिधान फूलों के पहनकर, ऐ धरा! महको ज़रा।२।
परिधान फूलों के पहनकर, ऐ धरा! महको ज़रा।२।
हुड़दंग गलियों में मचा है, टोलियों के शोर
हैं।
क्या खूब होली का समाँ है, मस्तियाँ हर ओर हैं।।
क्या खूब होली का समाँ है, मस्तियाँ हर ओर हैं।।
पकवान थालों में सजे हैं, मालपूए संग
हैं।
नव वर्ष का स्वागत करें हम,फागुनी रस रंग है।३।
नव वर्ष का स्वागत करें हम,फागुनी रस रंग है।३।
:- ऋता शेखर 'मधु'