027. बाबुल का अंतर्द्वन्द (कविता) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
027. बाबुल का अंतर्द्वन्द (कविता) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

बाबुल का अंतर्द्वन्द



बाबुल का अंतर्द्वन्द
बिटिया खड़ी दुल्हन बनी
मन का जाने न कोई राज
बाबुल खड़ा सोचे बड़ा
अजीब रस्म है आज
सौंपना है जिगर के टुकड़े को
बजा बजा के साज
मन है व्याकुल, ले जाने वाला
बन पाएगा क्या उसका रखवाला
नयन नीर बने, होठों पर मुस्कान
मन विह्वल होता जाता है
दिल भी बैठा जाता है
पर साथ ही सुकून है
बाबुल खुद पर है हैरान|
बिटिया इस घर की रानी थी
क्या वहाँ करेगी राज!
बाबुल की बाहें बनी थीं झूला
मिल पाएगा क्या वहाँ हिंडोला!
माँ की गुड़िया प्यारी-प्यारी
बन पाएगी क्या वहाँ दुलारी!
भाई की आँखों का तारा
जीवनसाथी की क्या बनेगी बहारा!
बहनों की वह प्यारी बहना
बन पाएगी क्या वहाँ की गहना!
दादी-नानी की नन्हीं मुनिया
उड़ पाएगी क्या बन चिड़िया!
बूआ-मासी की है वह लाडली
पाएगी क्या फूलों की डाली!
सवाल रह गए सारे मन में
बिटिया चली, बैठ पालकी में
आँगन बजती रही शहनाई
बिटिया की हो गई विदाई|

अब जो बिटिया हुई पराई
याद में आँखें भर आईं|
बाबुल, तुम रोना नहीं
दिल में है सिर्फ वही समाई|
अब जब भी वह घर आए
प्यार से झोली भर देना
एक अनुरोध इतना सा है
अपने घर को 
उसका भी रहने देना||

ऋता शेखर ‘मधु’