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रविवार, 30 जून 2019

जिन्दगी को सार देना-गीतिका

मनोरम छंद
मापनी-2122.2122
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गीतिका
पदांत - देना
समांत- आर
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जिन्दगी को सार देना
नेह को विस्तार देना

फूल की चाहत सभी को
शूल को भी प्यार देना

राह में फिसलन बहुत है
चाल को आधार देना

स्वप्न होते अनगढ़े से
कर्म से आकार देना

बोल मीठे भाव निश्छल
जाँचकर उद्गार देना

पेड़ पौधे हैं धरोहर
प्रेम से उपहार देना

जो करे कर्तव्य अपना
बिनकहे अधिकार देना

स्वरचित, अप्रकाशित
--ऋता शेखर 'मधु'

इस छंद के लिए मुझे फेसबुक समूह 'मुक्तक लोक' से सम्मान पत्र मिला है|

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सोमवार, 26 सितंबर 2016

हम भारत की बेटियाँ, देंगे अरि को मात

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वीरों को नमन...

हँसते हँसते देश पर, जो होते कुर्बान
भारत को आज भी, उनपर है अभिमान

शोकाकुल सरिता थमी, थमे पवन के पाँव
गम में डूबा है नगर, ठिठक रही है छाँव

लोहित होता है गगन, सिसक रहे हैं प्राण
इधर बजी है शोक धुन, उधर मचलते बाण

होती है खामोश जब, चूड़ी की झनकार
विधवा सूनी माथ पर, लिखती है ललकार

सिर से साया उठ गया, छूट गया है साथ
आज सलामी दे रहे, नन्हे नन्हे हाथ

लिखें शहीद समर सफर, परिणीता के नाम
पग पग पर हैं ठोकरें, लेना खुद को थाम

वीर पिता की राख से, कहतीं मन की बात
हम भारत की बेटियाँ, देंगे अरि को मात

आततायियों से कहो, कब तक रहें विनीत
भरना है हुँकार अब, निभा युद्ध की रीत
--ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 14 अगस्त 2016

एक शपथ-स्वतंत्रता दिवस के लिए

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जन कल्याण की लिए मशाल
हम सबको बढ़ते जाना है
जन हित हो जीवन का मकसद
दुनिया में अलख जगाना है

साफ सुलभ रस्तों पर चलकर
बन्धु बान्धव घर को जाएँ
कहीं मिले न कूड़ा कचरा
प्रयत्न सदा यहीं कर आएँ
गली मुहल्ले मह मह महकें
फूलों के बीज लगाना है

जन कल्याण की लिए मशाल
हम सबको बढ़ते जाना है

अंधियारों में पथ रौशन हो
पोल पोल पर बल्ब जले
ठोकर खाकर गिरे न कोई
गढ्ढे सड़कों के भरे मिलें
समवेत प्रयासों से सबको
ऐसा ही नगर बसाना है

जन कल्याण की लिए मशाल
हम सबको बढ़ते जाना है

सड़कों पर नारी निडर रहे
बच्चों को मिल जाये पोषण
अमीर गरीब का भेद मिटे
मजदूरों का हो न शोषण
छोटे छोटे डग भर भर कर
हमे हिमालय पाना है

जन कल्याण की लिए मशाल
हम सबको बढ़ते जाना है
-ऋता शेखर मधु

सोमवार, 19 जनवरी 2015

पल का पंछी


पल का पंछी
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याद रखना नौनिहालों
बीता समय आता नहीं

पल का पंछी
भाग रहा है
सजग हमेशा
जाग रहा है

बिना परिश्रम कोई भी
सेव मीठे खाता नहीं

घडी के काँटे
डोल रहे हैं
कर लो उपयोग
बोल रहे हैं

धरा को तप्त हुए बिना
मेघ नभ में छाता नहीं

तन में ऊर्जा
भरी पड़ी है
विजयमाल ले
राह खड़ी है

ढीले तारों से कभी भी
संतूर राग गाता नहीं

याद रखना नौनिहालों
बीता समय आता नहीं
*ऋता शेखर मधु*

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

अभिवंचित...


अभिवंचित...

कुछ उनके दिल की सुनें
कुछ उनके मन को गुनें
त्रुटिपूर्ण तन मन से हम
चलकर कोई ख्वाब चुनें|

बन्द हैं दृगों के द्वार
स्याह है जिनका संसार
उनके अंतस-ज्योति में
संग चलें पग दो चार|

ब्रम्हा ने जिह्वा दी नहीं
दे देते पर नजर अपार
अभिव्यक्ति की अकुलाहट में
भर दें हम तो शब्द हजार|

भूलवश जो बधिर बने
देखें बोलें पर ना सुनें
इशारों ही इशारों में हम
अधरों पर हँसी भर दें|

किन्नर भी माँ की संतान
फिर क्यूँ ले आते मुस्कान
बोझिल मन को लें हम तोल
उनसे मीठे बोलें बोल|

बौनापन जो झेल रहे
उपहासों में खेल रहे
तन लघु मन के निर्मल
कभी उनसे न करना छल|

काया की अपूर्णता को
कभी समझना  अभिशाप
वामन अवतार ले विष्णु ने
गर्वित बलि को दिया संताप|

पीछे जो लौटे भूचक्र
वहाँ दिखेंगे अष्टावक्र
चारो वेदों के ज्ञाता रचते
गीता का अध्यात्म चक्र|

ईश्वर ने भरी जिनमे पूर्णता
क्यों भर जाती उनमे हीनता
नैन कद कंठ चक्षु के स्वामी
भाव भरे हैं मतलबी बेमानी

लम्बी काया सोच में बौने
नजर वाले करते औने पौने
पाई जिह्वा मीठा न बोलें
सुनने वाले मुँह न खोलें

ईश्वर जिनमें देते कमियाँ
भरते आत्मबल की कलियाँ
कभी देखकर मुँह न मोड़ो
दे कर प्रेम आशिष को जोड़ो
.........ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 30 जुलाई 2014

मधुर गुंजन ब्लॉग की तीसरी वर्षगाँठ पर प्रस्तुति -- संज्ञा हूँ मैं


नारी हूँ मैं , संज्ञा हूँ मैं
जब जब लेखनी उठाती हूँ
तड़प उठती हूँ देखकर
समाज में फैली कुव्यवस्था
दर्द दुख द्वेष छल अत्याचार
व्यक्त करना चाहती हूँ
उन सभी के अंतस को
जो मौन रह सह जाते हैं वह भी
जो नहीं सहना चाहिए
उस वक्त मैं जातिवाचक हूँ

संज्ञा हूँ मैं
एक नागरिक की तरह
देशभक्ति के गीत लिखती हूँ
सरहद पर सैनिकों की
भावना व्यथा महसूस करती हूँ
प्रान्तीय झगड़ों में
निर्दोष रक्त-धार देखती हूँ
देश हित से अधिक
निज हित में लिप्त
इंसानों की कतार देखती हूँ
कर्तव्य से अधिक
अधिकार के नारे सुनती हूँ
अपने वतन के लिए स्थानवाचक हूँ

संज्ञा हूँ मैं
नारी के कई किरदार हूँ
उम्र के हर मोड़ पर
मेरी सोच, मेरे निर्णय पर
दूसरों के अधिकार हैं
टूटे सपनों के किरचें चुनती
मुस्कुराती रहती हूँ सबके लिए
आहत मर्म जब बनते मेघ
नयन सावन बन जाते हैं
चाहतों की कश्ती सजाती
शब्दों के साहिल पर
अनुभूतियों का भाववाचक हूँ

संज्ञा हूँ मैं
महीने भर की रसोई के लिए
सूचि बनाती हूँ
दूध धोबी के हिसाब लिखती हूँ
दुकानों में सेल देख ठिठकती हूँ
सब्जियों के मोलभाव करती
भिंडी टमाटर चुनती हूँ
‘जागो ग्राहक जागो’याद करके
खराब सामान वापस कर देती हूँ
बैंकिंग से ए टी एम तक
इन्कम टैक्स से लेकर रिटर्न तक
बखूबी लेखनी चलती है
तब खुद को द्रव्यवाचक पाती हूँ

संज्ञा हूँ मैं
नारी होने पर गर्व है
अपनी परम्पराएँ संस्कार
जी जान से निभाती हूँ
सहन शक्ति तो बला की है
पर नियम विरुद्ध चलने वालों को
अच्छा खासा पाठ भी पढ़ाती हूँ
किसी की हजार बातें सह लूँ
पर मान पर आघात करने वाले
असभ्य अपशब्द बिल्कुल नहीं
उस वक्त स्वाभिमानी बनी
व्यक्तिवाचक में ढल जाती हूँ
मैं पूर्ण संज्ञा बन जाती हूँ||

ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 10 जून 2014

कभी बैठ भी जाया करो

कभी बैठ भी जाया करो... 
सहेलियो, आज बस तुमसे बातें करने की इच्छा हो गई|
घर के कामकाज में उलझे रहते हैं हम हमेशा, कभी साथ बैठकर बोल बतिया भी लिया करो|
अच्छा, ये बताओ कि आज कामवाली आई या नहीं| अ र र नहीं आई, च्च्च् तब तो सारे काम ही तुम्हें करने पड़े होंगे| खाना बनाने के अलावा झाड़ू पोछा, कपड़े धोना, बरतन धोना वगैरह वगैरह| क्या कहा, तुम रोज ही करती हो| तब तो सही है|
सखियो, काम तो करती हो पर कभी यह ध्यान दिया है कि पूरे काम के दौरान तुम जमीन में कितनी बार बैठती हो| जमीन में पलथी मारकर नहीं, चुक्को मुक्को बैठ पाती या नहीं| उम्र के साथ कमर के बढ़ते घेरे कहीं बाधा तो नहीं पहुँचा रहे | एक जमाना वह हुआ करता था कि महिलाएँ सारा काम जमीन में बैठकर ही किया करती थीं| झाड़ू लगाना हो तो बैठकर पूरे घर के कोने कोने से धूल निकालने का काम स्वयं बड़े मन से करती थीं| अब क्या है, महरी नहीं आई तो बस कामचलाऊ झाड़ू दे दिया गया बिल्कुल नगरनिगम की ओर से तैनात सड़क के झाड़ूवाले की तरह| पोछा के लिए बाल्टी में पानी लेकर कपड़े निचोड़ निचोड़ कर पौंछा करती हो या वो लम्बे से डंडे में स्पंज वाला पोछा खड़े खड़े मार लेती हो| मसाला भी तो सिल बट्टे पर नहीं पीसे जाते| मिक्सर, या नहीं तो बाजार के मिलावटी पाउडर वाले मसाले| अब बताओ, यह काम भी खड़े खड़े हो गया कि नहीं| कपड़े बैठकर धोए होंगे तो ठीक है या वाशिंग मशीन में डाला और सिर्फ कपड़े फैलाने में जो मेहनत करनी पड़ी हो| फिर तुम बैठी कब ? बरतन धोने के लिए भी सिंक का ही इस्तेमाल कर लेती हो| खड़े खड़े बरतन भी धुल जाते हैं| मेरी एक सहेली है वह पूजा भी खड़े खड़े ही करती है, पूरी चालीसा पढ़ लेती है| अब रसोई में चलते हैं| कोई आधुनिक फुड प्रोसेसर है तो कहने ही क्या, नहीं भी है तो स्लैब पर फटाफट सब्जी काटा और सब्जी भूँजने की जहमत भी कौन उठाए| सारे मसाले डालो और सीटी मार दो| पेट तो भर ही जाएगा चाहे सब्जी में सोंधापन आए या नहीं| बच्चों ने नाश्ते की फ़रमाइश की तो मैगी-पास्ता जिन्दाबाद!! कुछ बदलने की फरमाइश हो तो ब्रेड के बीच खीरा प्याज भर दो| बैठने की गुंजाइश यहाँ भी नहीं| खाना ठंडा हो जाए तो गैस के पास जाने की ज़हमत भी कौन उठाए| अरे भाई, माइक्रोवेव है तो वारे न्यारे| बचपन में जब हम संयुक्त परिवार में रहते थे तो परीक्षा के बाद जो डेढ़ महीने की छुट्टी होती थी तो पूरे परिवार की रोटियाँ बनानी पड़ती थीं| दादा दादी,मम्मी पापा, चाचा चाची, बुआ, अतिथि के रूप में विराजमान कुछ लोग और भाई बहन, अर्थात पचास साठ रोटियाँ- अब पहले के लोग रोटियाँ गिनकर थोड़े ही खाते थे| कोई अच्छी सब्जी बनी तो थोड़ी ज्यादा भी खा लेते थे| उतनी रोटियाँ चाहे कोई भी बनाए वह बैठकर आँच वाले चुल्हे पर ही बनेंगे| पीढ़े पर बैठकर रोटियाँ बेलते हुए पेट भी बेचारा चिपका रहता घुटनों के बीच में, अब सोचती हूँ कितना सेहतमन्द काम था ये| अब सोचो सखियों, अपने नन्हे से परिवार में तुम कितनी रोटियाँ सेंकती हो ? सेंकती भी तो खड़े खड़े ही न|
सारे काम खड़े होकर करने की आदत भारी पड़ रही है| हर दिन कोई भी एक काम घुटने मोड़कर बैठकर करो| यदि पाँच मिनट से ज्यादा नहीं बैठ पाती तो राम बचाए, स्थिति थोड़ी विकट है| पर घबराने की कोई बात नहीं| साफ घर मे ही किसी एक कमरे में बैठकर पोछा मार लो घुटने को जमीन पर रखे बिना| जितना समय जिम में व्यतीत करती हो उतने में घर का ही काम करो| शरीर तो मशीन है, चलाते रहने से जंग नहीं लगता और स्लिम भी दिखोगी| ठीक है सखियो, अब हम चलते हैं| पन्द्रह दिन बाद बताना पेट कुछ कम हुआ या नहीं |

............................ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 31 मई 2014

पलकों तले ख्वाब सजाए रखना

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पलकों तले ख्वाब सजाए रखना
कोमल जज्बात जगाए रखना
यथार्थ का धरातल है बड़ा कठोर
अशकों के मोती छुपाए रखना
सबकुछ ही मिले मुमकिन तो नहीं
जो मिल गया वो बचाए रखना
समुन्दर में लहरें आती ही रहेंगी
मजबूती से साहिल टिकाए रखना
आँधियों ने किसी को भी छोड़ा नहीं
दीपक की लौ को जलाए रखना
......ऋता

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