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शनिवार, 4 जून 2016

सुप्रभाती दोहे - 4

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आनत लतिका गुच्छ से, छनकर आती घूप
ज्यों पातें हैं डोलतीं, छाँह बदलती रूप 40

खग मानस अरु पौध को, खुशियाँ बाँटे नित्य
कर ले मेघ लाख जतन, चमकेगा आदित्य

दुग्ध दन्त की ओट से, आई है मुस्कान
प्राची ने झट रच दिया, लाली भरा विहान

लेकर गठरी आग की, वह चलता दिन रात
बदले में नभ दे रहा, तारों की सौगात

नित दिन ही चलता रहे, नियमित जीवन चक्र
बोली में जब व्यंग्य हो, ग्रहण सूर्य हो वक्र

सौरमंडल बना रहा, इक कर्मठ सरकार
सूरज तो सिरमौर है, मेघ खा रहे खार

ब्रम्हांड में गूँज रहा, कपालभाति का ओम्
बड़ी अनोखी है ख़ुशी, झूम रहा है व्योम

जब जब ये सूरज करे, तपते दिन का ज़िक्र
तब तब होती चाँद को, शीतलता की फ़िक्र

सूरज की हर इक किरण, रच देती है गीत
नारंगी में वीर रस, नील श्याम की प्रीत 

लेखन में लेकर चलें, सूरज जैसा ओज
शीतल मन की चाँदनी, पूर्ण करे हर खोज
-----ऋता....

शनिवार, 14 मई 2016

सुप्रभाती दोहे-3









हरी दूब की ओस पर, बिछा स्वर्ण कालीन

कोमल तलवों ने छुआ, नयन हुए शालीन 30

छँट जाती है कालिमा, जम जाता विश्वास
जब आती है लालिमा, पूरी करने आस

ज्यों ज्यों बढ़ता सूर्य का, धरती से अनुराग
झरता हरसिंगार है, उड़ते पीत पराग

पहन लालिमा भोर की, अरुण हुआ है लाल
चार पहर को नापकर, होता रहा निहाल 

सूर्य कभी न चाँद बना, चाँद न बनता सूर्य
निज गुण के सब हैं धनी, बंसी हो या तूर्य

पर अवलम्बन स्वार्थ की, कभी न थामो डोर
निष्ठा निश्चय अरु लगन, चले गगन की ओर

सुबह धूप सहला गई, चुप से मेरे बाल
जाने क्यों ऐसा लगा, माँ ने पूछा हाल

हवा लुटाती है महक, मगर फूल है मौन
श्रम सूर्य के साथ चला, उससे जीता कौन

प्रेमी तारा भोर का, गाता स्वागत गान
उतरीं रथ से रश्मियाँ, लिए मृदुल मुस्कान

शुष्क दरारों से सुनी, मन की करुण पुकार
रवि नीरद की ओट से, देने लगे फुहार

मंगलवार, 3 मई 2016

सुप्रभाती दोहे-2










प्रतिपल स्वर्णिम रश्मियाँ, छेड़ रहीं खग गान
आकुल व्याकुल सी धरा, झटपट करे विहान२०

ध्यानमग्न प्राची रचे, अरुणाचल में श्लोक
मन की खिड़की खोल मनु, फैलेगा आलोक१९

सूरज भइया आज तो, कर लो तुम आराम
मई दिवस है मन रहा, फिर क्यों करना काम१८


तीखी तीखी धूप जब,पहुँचाए आघात
तब मेघो के नृत्य की, होती है शुरुआत१७


नित नवल शक्ति भक्ति का, दे जाता आयाम
उस ऊर्जा के स्रोत को, शत शत करें प्रणाम१६

ये भूमण्डल गोल है, सूरज भी है गोल
होंतीं बातें गोल जब, बज जाती है ढोल१५

ज्यों सूरज सजने लगा, आसमान के भाल
चलती कलछी देखकर, हँसे बाल गोपाल14

शनै शनै होने लगा, अर्द्धवृत्त से गोल
दिनकर जी को देखकर, अब तो आँखें खोल13

नव प्रभात की नव किरण, करे अँधेरा दूर
गहरी काली रात का, दर्प हुआ है चूर12

सप्त अशव की पीठ पर, सूर्य लगाता पंख
द्रुतगति से रश्मियाँ, चलीं बजाती शंख11
-ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

सुप्रभाती दोहे - 1











समभाव से बाँट रहा, सूरज सबको धूप|
ऊर्जापोषित हम मनुज, खोलें मन का कूप||१०

स्वर्ण रथ पर सूर्य पथिक, आया मेरे देश|
मंजर उत्साहित हुए, मुदित बने परिवेश||९

एक गेंद लुढ़का दिया, रवि ने भोरम भोर|
उसके पीछे चल दिए, मनु पंछी अरु ढोर||८

सूरज का रस्ता कभी, ना होता है जाम|
रुकावटों का सिलसिला, मानव में है आम||7

सिन्दूरी आँचल धरे, उषा हुई अहिवात|
जग है उसका मायका, नभ धरती पितु मात ||6

बैजंती परिजात को , नहलाती है धूप|
श्रृंगारित शिव कृष्ण का, निखरा स्वर्गिक रूप||५

खिल रही अपराजिता, खिल रहे हैं गुलाब|
रथ पर रखे स्वर्ण कलश, सूरज बना नवाब||४

उगती जाती  रौशनी, नित प्राची की ओर|
तम पर पा लेती विजय, बिना मचाए शोर||३

सुबह सुनहरी रश्मियाँ, बनी चंद्रिका रात|
छुप कर रहती धूप में, शीतलता की बात||२

आया है परदेस से, सूरज अपने देश|
पश्चिम को भेजो जरा, गरिमा का संदेश||१
ऋता शेखर 'मधु'