कभी सोचा है...
न चाँद होता
न होते तारे
फिर हम क्या करते
चंदा को मामा बना
बच्चों को कैसे फुसलाते
कभी तन्हा रातों में
चाँद को साथी कैसे बनाते
नींद न आती
टकटकी लगा
तारों को कैसे गिनते
होते न तारे
न ही वे टूटते
फिर अपनी विश किसे बताते
चाँदनी रात न होती
मधुर सी कोई बात न होती
पूनम का चाँद न होता
पथ हमारे अँधियारे रह जाते
अपने प्रिय
दूर देस जब जाते
बताओ,तारों में उनको
कैसे ढूँढ पाते
काले बादल कोई क्यूँ देखे
चाँद की छुपा छुपी
कैसे हमें लुभाते
टिमटिम करते तारे न होते
‘ट्विंकल ट्विंकल’किसे सुनाते
चाँद न होता
चाँद-सी महबूबा न होती
कभी सोचा है...
काली स्याह भयानक रातें
कितना हमें डरातीं!!!
ऋता शेखर ‘मधु’